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नया नियम · 1 पतरस · अध्याय 4 / 5

1 पतरस 4

1इसलिए, जबकि मसीह ने शरीर में दुख उठाया तो तुम भी इसी अभिप्राय से हथियार धारण करो, क्योंकि जिसने शरीर में दुख उठाया है, वह पाप से छूट गया है।

2इसलिए शरीर में अपना शेज जीवन मनुष्यों की अभिलाजाओं में नहीं, वरन् परमेश्वर के इच्छानुसार व्यतीत करो।

3क्योंकि अतीत का जो समय तुमने विजय-भोग, कामुकता, पियक्कड़पन, रंगरलियों, मघपान-गोज्ठियों तथा घृणित मूर्तिपूजाओं में गंवाकर अन्य जातियों के इच्छानुसार कार्य किया, वही पर्याप्त है।

4इन सब बातों में उनको आशचर्य होता है कि तुम ऐसे भारी दुराचार में अब उनका साथ नहीं देते, अतः वे तुम्हारा अपमान करते है।

5परन्तु वे उसी को लेखा देंगे जो जीवितों और मृतकों का न्याय करने को तैयार है।

6इसलिए मरे हुओं को भी सुसमाचार इस अभिप्राय से सुनाया गया कि-यघपि शरीर में उनका न्याय मनुष्यों के अनुसार हो-वे आत्मा में परमेश्वर के इच्छानुसार जीवित रहे।

7सब बातों का अन्त निकट है। अतः समझदार होकर प्रार्थना के लिए तत्पर रहो।

8सब से बढ़कर, एक दूसरे के प्रति प्रेम में सरगर्म रहो, क्योंकि प्रेम असंख्य पापों को ढांप देता है।

9बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे की पहुनाई करो।

10जबकि प्रत्येक को एक विशेज वरदान मिला है, तो उसे परमेश्वर के विविध अनुग्रह के उत्तम भण्डारियों के समान एक दूसरे की सेवा में लगाओ।

11जो भी उपदेश दे, वह ऐसे दे मानो परमेश्वर ही का वचन देता हो। जो सेवा करे, उस सामर्थ्य से करे जो परमेश्वर देता है, जिस से सब बातों में यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की महिमा हो। महिमा और अधिकार युगानुयुग उसी का है। आमीन।

12हे प्रियो, यह दुखरूपी अग्नि-परीक्षा जो तुम्हारे मध्य इसलिए आई कि तुम्हारी परख हो-इसे यह समझकर अचम्भा न करना कि कोई अनोखी घटना तुम पर घट रही हैं

13परन्तु जैसे जैसे तुम मसीह के दुखों में सहभागी होते रहते हो, आनन्दित रहो, जिससे कि उसकी महिमा के प्रकट होते समय भी तुम आनन्द से उल्लसित हो जाओ।

14यदि मसीह के नाम के कारण तुम्हारी निन्दा की जाती है तो तुम धन्य हो, क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम में वास करता है।

15किसी भी प्रकार तुम में से कोई हत्यारा, चोर, दुष्टता का कार्य करने वाला, तथा दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप कर के तंग करने वाला होकर दुख न उठाए।

16पर यदि कोई मसीही होने के कारण दुख उठाता है, ताे वह लज्जित न हो, वरन् अपने इस नाम के लिए परमेश्वर की महिमा करे।

17क्योंकि समय आ गया है कि परमेश्वर के घराने से ही न्याय का आरम्भ हो। अतः यदि न्याय का आरम्भ हम से ही होगा तो उनका क्या परिणाम होगा जिन्होंने परमेश्वर के सुसमाचार का पालन नहीं किया?

18यदि धर्मी व्यक्ति कठिनाई से ही उद्धार प्राप्त करेगा, तो ईशवर-रहित और पापी मनुष्य की क्या दशा होगी?

19इसलिए वे भी जो परमेश्वर के इच्छानुसार दुख उठाते हैं, उचित कार्य करते हुए अपने अपने प्राण को विश्वासयोग्य सृष्टिकर्ता के हाथों में सौंप दे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)