Loading account

पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 14 / 31

1 शमूएल 14

1एक दिन शाऊल के पुत्र योनातान ने अपने हथियार ढोने वाले जवान से कहा, “आ, हम पार जाकर दूर स्थित पलिश्ती चौकी की ओर निकल चले।” परन्तु उसने अपने पिता को नहीं बताया।

2शाऊल तोे गिबा की सीमा पर उस अनार के वृक्ष के नीचे जो मिग्रोन के पास है ठहरा था। उसके साथ लगभग छः सौ पुरुष थे,

3और शीलों में यहोवा के याजक एली के पुत्र पीनहास का पोता, और ईकाबोद का भाई अहीतूब का पुत्र अहिय्याह भी एपोद धारण किए हुए था। और लोग नहीं जानते थे कि योनातान चला गया है।

4जिन दर्रों के बीच से पार होकर योनातान पलिश्ती चौकी पर पहुँचना चाहता था उनके दोनों तरफ एक-एक नुकीली चट्टान थी। एक चट्टान का नाम बोसेस और दूसरी का नाम सेने था।

5एक चट्टान तो उत्तर में मिकमाश के सामने, और दूसरी दक्षिण में गेबा के सामने खड़ी थी।

6तब योनातान ने अपने हथियार ढोने वाले जवान से कहा, “आ, हम पार जाकर इन ख़तनारहित लोगों की चौकी तक पहुँच जाए। सम्भव है यहोवा हमारे लिए कार्य करेे क्योंकि यहोवा के लिए कोई रुकावट नहीं कि बहुत लोगों अथवा कम लोगों के द्वारा हमें बचाए।”

7उसके हथियार ढोने वाले ने उससे कहा, “जो कुछ तेरे हृदय में है वहीं कर। तू आगे बढ़, और मैं तेरी इच्छा के अनुसार तेरे साथ हूँ।”

8तब योनातान ने कहा, “सुन, हम उस पार जाकर उन मनुष्यों के सामने अपने को प्रकट करे।

9यदि वे हमसे कहें, ‘हमारे आने तक ठहरो’ तो हम अपनी जगह पर खड़े रहेंगे और उनके पास नहीं जाएंगे।

10परन्तु यदि वे कहें, ‘हमारे पास चढ़ आओ,’ तो हम चढ़ जाएंगे क्योंकि यहोवा ने उनको हमारे हाथ कर दिया है। यही हमारे लिए चिह्न होगा।”

11जब उन दोनों ने पलिश्ती चौकी पर अपने को प्रकट कर दिया तब पलिश्तियों ने कहा, “देखों, इब्री अपने उन बिलों से निकले आते हैं जिनमें वे छिपे थे।”

12फिर चौकी के लोगों ने योनातान और उसके हथियार ढोने वाले से कहा, “हमारे पास चढ़ आओ। हम तुम्हें कुछ बताएंगे।” तब योनातान ने अपने हथियार ढोने वाले से कहा, “मेरे पीछे आ क्योंकि यहोवा ने उनको इस्राएल के हाथ कर दिया है।”

13फिर योनातान अपने हाथों और पांवों के बल ऊपर चढ़ गया। उसका हथियार ढोने वाला भी उसके पीछे-पीछे चढ़ा। वे योनातान के सामने गिरते गए, और उसके हथियार ढोने वाले ने भी उसके बाद कुछ लोगों को मार गिराया।

14इस प्रथम नर-संहार में योनातान और उसके हथियार ढोने वाले ने प्रायः बीस पुरुषों को एक एकड़ भूमि के आधे बीघा जुते हुए खेत में मार गिराया।

15इससे छावनी में, मैदान में और सब लोगों के बीच थरथराहट छा गई, यहाँ तक कि चौकी के सैनिक तथा आक्रमणकारी भी थरथराने लगे। और पृथ्वी भी कांप उठी और भयंकर थरथराहट हुई।

16अब बिन्यामीन के गिबा में नियुक्त शाऊल के पहरेदारों ने दृष्टि करके देखा कि भीड़ छँट गई है, और लोग इधर-उधर चले जा रहे है।

17तब शाऊल ने अपने साथ के लोगों से कहा, “अब गिनती करके देखो कि हम में से कौन चला गया है।” जब उन्होंने गिनती की तो योनातान और उसका हथियार ढोनेवाला वहाँ नहीं था।

18तब शाऊल ने अहिय्याह से कहा, “परमेश्वर के सन्दूक को यहाँ ला,” क्योंकि उस समय परमेश्वर का सन्दुक इस्राएलियों के साथ था।

19जब शाऊल याजक से बातें कर रहा था उसी समय पलिश्तियों की छावनी में हुल्लड़ और अधिक बढ़ गया। अतः शाऊल ने याजक से कहा, “अपना हाथ खींच ले।़

20तब शाऊल और उसके साथ के सब लोग संगठित होकर युद्ध में कूद पड़े, और उन्होंने देखा कि प्रत्येक पुरुष की तलवार अपने ही साथी के विरुद्ध चल रही है, तथा बड़ी गड़बड़ी मची हुई है।

21जो इब्री पहले पलिश्तियों के पक्ष में थे और उनके पक्ष में पलिश्तियों की छावनी में डेरा डाले थे, वे भी उन इस्राएलियो के पक्ष में हो गए जो शाऊल और योनातान के साथ थे।

22जब इस्राएल के उन पुरुषों ने जो एप्रैम के पहाड़ी क्षेत्रों में छिप गए थे, यह सुना कि पलिश्ती भाग रहे हैं तब उन्होंने भी युद्ध में डट कर शत्रुओं का पीछा किया।

23इस प्रकार, यहोवा ने उस दिन इस्राएल का छुटकारा किया, और युद्ध बेत-आवन के उस पार तक फैल गया।

24उस दिन इस्राएल पुरुष व्याकुल हो गए क्योंकि शाऊल ने लोगों को यह कहकर शपथ दिलाई थी कि, “संध्या तक अर्थात् जब तक मैं अपने शत्रुओं से बदला न ले लूं जो पुरुष भोजन करे वह शापित हो।” अतः किसी ने भोजन चखा तक नही।

25और देश के सब लोगों ने जंगल में प्रवेश किया जहाँ भूमि पर मधु था।

26जब लोगों ने जंगल में प्रवेश किया तो देखो, वहाँ मधु टपक रहा था। परन्तु किसी ने भी अपना हाथ मुँह में नहीं डाला क्योंकि वे शपथ के कारण भयभीत थे।

27परन्तु जब शाऊल ने लोगों को शपथ दिलाई, योनातान ने उसे नहीं सुना था। इसलिए उसने अपने हाथ की लाठी की नोक ऊपर बढ़ाकर मधु के छत्ते में घुसाई, और अपना हाथ मुँह में डाला और उसकी आँखें चमक उठी।

28तब लोगों में से एक व्यक्ति ने उससे कहा, “तेरे पिता ने लोगों को कठोर शपथ दिलाकर कहा है, ‘शापित हो वह पुरुष जो आज भोजन करे’।” और लोग थके हुए थे।

29तब योनातान ने कहा, “मेरे पिता ने देश को कष्ट दिया है। देखो तो, थोड़ा सा मधु चखने से मेरी आँखें कैसी चमक उठी है!

30यदि अपने शत्रुओं की लूट में पाए हुए भोजन में से लोगों ने आज मनमाना खाया होता तो कितना अच्छा होता! क्योंकि अभी तक पलिश्तियों का संहार बहुत अधिक नहीं हुआ है।”

31उस दिन उन्होंने मिकमाश से अय्यालोन तक पलिश्तियों को मारा। और लोग बहुत थक गए थे।

32वे लूट की वस्तुओं पर टूट पड़े, और भेड़, बैल और बछड़े लेकर उन्होंने भूमि पर मारा, और उन्हें लहू सहित खाने लगे।

33तब उन्होंने शाऊल को बताया, “देख, लोग लहू-सहित मांस खाकर यहोवा के विरुद्ध पाप कर रहे है।” उसने कहा, “तुमने विश्वासघात किया है। आज एक बड़ा पत्थर मेरे पास लुढ़का लाओ।”

34फिर शाऊल ने कहा, “लोगों के बीच फैल जाओ और उनसे कहो, ‘प्रत्येक अपना बैल और अपनी भेड़ यहाँ मेरे पास लाकर वध करे और खाए। लहू-सहित मांस खाकर यहोवा के विरुद्ध पाप मत करो’।” अतः उस रात सब लोग अपना-अपना बैल ले आए और उन्होंने उसे वहाँ वध किया।

35तब शाऊल ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई। यह तो उसकी पहली वेदी थी जिसे उसने यहोवा के लिए बनाई थी।

36तब शाऊल ने कहा, “चलो, हम रात ही में पलिश्तियों का पीछा करें, और उन्हें प्रातःकाल तक लूटते रहें, और उनमें से किसी को भी जीवित न छोड़े।” उन्होंने उत्तर दिया, “जो तुझे अच्छा लगे वही कर।” पर याजक ने कहा, “हम यहीं पर परमेश्वर के पास आए।”

37तब शाऊल ने परमेश्वर से पूछा, “क्या मैं पलिश्तियों का पीछा करूँ? क्या तू उन्हें इस्राएल के हाथ में कर देगा?” परन्तु परमेश्वर ने उस दिन उसे उत्तर नहीं दिया।

38तब शाऊल ने कहा, “हे लोगों के प्रधानो, मेरे पास आओ, और जांच-पड़ताल करके पता लगाओ कि आज यह पाप कैसे हुआ है।

39क्योंकि इस्राएल के छुड़ाने वाले यहोवा के जीवन की शपथ, चाहे वह पाप मेरे पुत्र योनातान से ही क्यों न हुआ हो, फिर भी वह निश्चय मार डाला जाएगा।” परन्तु उन सब लोगों में से किसी ने भी उत्तर नहीं दिया।

40तब उसने सारे इस्राएल से कहा, “तुम सब एक ओर रहोगे, मैं तथा मेरा पुत्र योनातान दूसरी ओर रहेंगे। इस पर लोगों ने शाऊल से कहा, “जो तेरी दृष्टि में अच्छा लगे वही कर।”

41इसलिए शाऊल ने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा से कहा, “सत्य को प्रकट कर।” तब चिट्ठी शाऊल और योनातान के नाम पर निकली, और लोग बच गए।

42तब शाऊल ने कहा, “अब मेरे और मेरे पुत्र योनातान के नाम पर चिट्ठी डालो।” और योनातान पकड़ा गया।

43तब शाऊल ने योनातान से पूछा, “मुझे बता कि तू ने क्या किया है?” अतः योनातान ने बताया, “सचमुच, मैंने अपने हाथ की लाठी के सिरे से थोड़ा मधु चखा था। अब ठीक है कि मैं मरूँ।”

44और शाऊल ने कहा, “परमेश्वर मेरे साथ यही करे, वरन् इससे भी अधिक करे, क्योंकि योनातान, तू निश्चय मरेगा।”

45परन्तु लोगों ने शाऊल से कहा, “क्या योनातान का मरना अवश्य है जिसके द्वारा इस्राएल का ऐसा बड़ा छुटकारा किया गया है? ऐसा कभी न हो! यहोवा के जीवन की शपथ, उसके सिर का एक बाल भी भूमि पर गिरने न पाएगा क्योंकि आज उसने परमेश्वर के साथ काम किया है।” अतः लोगों ने योनातान को छुड़ा लिया और वह मारा न गया।

46तब शाऊल ने पलिश्तियों का पीछा करना छोड़ दिया, और पलिश्ती अपने-अपने स्थान को चले गए।

47जब शाऊल इस्राएल पर राज्य करने लगा तब उसने अपने चारों ओर के शत्रुओं से युद्ध किया अर्थात् मोआब, अम्मोनियों, एदोम, सोबा के राजाओं, और पलिश्तियों आदि के विरुद्ध, तथा जहाँ कहीं उसने चढ़ाई की वहीं उनको पराजित किया।

48उसने बड़ी वीरता के साथ अमालेकियों को पराजित किया और इस्राएल को उन सब के हाथ से छुटकारा दिया जो उनको लूटा करते थे।

49शाऊल के पुत्र योनातान, यिशवी और मल्कीशू थे। उसकी दो पुत्रियों के नाम ये थेः पहलौठी का मेरब, तथा छोटी का नाम मीकल था।

50और शाऊल की पत्नी का नाम अहीनोअाम था जो अहीमास की बेटी थी। उसकी सेना के सेनापति का नाम अब्नेर था जो शाऊल के चाचा नेर का पुत्र था।

51शाऊल का पिता तो कीश था, और अब्नेर का पिता नेर, अबीएल का पुत्र था।

52शाऊल को जीवन भर पलिश्तियों से घोर युद्ध करना पड़ा। जब कभी शाऊल किसी सामर्थी पुरुष अथवा किसी शूरवीर को देखता था तो उसे अपनी सेना में रख लेता था।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)