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पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 2 / 31

1 शमूएल 2

1तब हन्ना ने प्रार्थना करके कहाः “मेरा हृदय यहोवा में मग्न है। यहोवा के कारण मेरा सींग ऊंचा हुआ है, मेरा मुंह मेरे शत्रुओं के विरुद्ध खुल गया है, क्योंकि मैं तेरे उद्धार से आनन्दित हू।

2यहोवा के समान कोई पवित्र नहीं है, निश्चय, तेरे सिवाय कोई है ही नहीं, और न हमारे परमेश्वर के समान कोई चट्टान है।

3अहंकार से भरकर घमण्ड की बातें और मत बोलो, और अपने मुंह से ढिठाई की बातें निकलने न दो, क्योंकि यहोवा सर्वज्ञ परमेश्वर है, और वह कार्यों को तौलता है।

4शूरवीरों के धनुष टूट गए, परन्तु निर्बल मनुष्य सामर्थ्य का कमरबंध बांधते है।

5जो भरपूर थे वे रोटी के लिए मज़दूरी करते हैं, परन्तु जो भूखे रहते थे वे अब भूखे नहीं रहते। बांझ भी सात को जन्म देती, परन्तु जिसके बहुत बच्चे हैं वह मुर्झाती जाती है।

6यहोवा मारता और जिलाता है, वही अधोलोक में पहुंचाता और ऊपर उठाता भी है।

7यहोवा ही निर्धन करता और धनी बनाता है, वह नीचा करता और वही ऊंचा भी उठाता है।

8वह निर्धन को धूल से उठाता, और वही दरिद्र को राख के ढेर से ऊपर उठाता है कि उनको प्रतिष्ठितों के साथ बिठाए और महिमा के आसन का वारिस बनाए, क्योंकि पृथ्वी के खम्भे यहोवा के हैं और उसी ने जगत को उनपर स्थिर किया है।

9वह अपने भक्तों के पैरों को तो संभालता, परन्तु दुष्ट अन्धकार में चुपकर दिए जाते हैं, क्योंकि मनुष्य सामर्थ्य से प्रबल नहीं होगा।

10जो यहोवा से लड़ते हैं वे चकनाचूर कर दिए जाएंगे। उनके विरुद्ध वह आकाश में गरजेगा। यहोवा पृथ्वी की ओर-छोर का न्याय करेगा। वह अपने राजा को सामर्थ्य प्रदान करेगा और अपने अभिषिक्त का सींग ऊंचा करेगा।”

11तब एल्काना अपने घर रामा को गया। परन्तु बालक वही एली याजक के सामने यहोवा की सेवा करने लगा।

12एली के पुत्र तो लुच्छे थे। वे न तो यहोवा को जानते थे

13और न ही लोगों के प्रति याजकों की रीति विधि को। जब कोई व्यक्ति बलि चढ़ाता था तब याजक का सेवक हाथ में तीन नोक वाला कांटा लेकर उबलते मांस के पास आ जाता था।

14वह उसे कड़ाही, या डेगची, या हण्डे, या हाण्डी में घुसाता था, और जितना मांस उस कांटे में आ जाता उसे याजक अपने लिए ले लेता था। शीलों में जितने इस्राएल आते थे उन सबके साथ वे इसी प्रकार किया करते थे।

15चर्बी को जलाने के पूर्व भी याजक का सेवक बलिदान करने वाले पुरुष के पास आकर कहता था, “भूनने के लिए याजक को मांस दे, क्योंकि वह तुझसे उबला मांस नहीं, कच्चा ही लेगा।”

16यदि वह पुरुष उसको उत्तर देता, “पहले चर्बी आग में अर्पित कर लेने दो, उसके बाद तुम जितना मन चाहे ले लेना,” तब सेवक कहता, “नहीं, तुझे अभी देना पड़ेगा, अन्यथा मैं उसे बलपूर्वक ले लूंगा।”

17इस प्रकार यहोवा के सामने उन जवानों का पाप बहुत बड़ा था, क्योंकि वे यहोवा के बलिदान का तिरस्कार करते थे।

18परन्तु शमूएल बालक ही था। वह महीन मलमल का बना हुआ एपोद पहनकर यहोवा के सामने सेवा करता था।

19जब उसकी मां वर्ष-प्रतिवर्ष अपने पति के साथ वार्षिक बलिदान चढ़ाने आती तब उसके लिए एक छोटा चोगा बनाकर लाती थी।

20तब एल्काना और उसकी पत्नी को एली आशीर्वाद देकर कहता, “यहोवा तुझको उस बालक के बदले जिसको उसने यहोवा को अर्पित कर दिया है, इस स्त्री से सन्तान दे।” तब वे अपने घर चले जाते।

21यहोवा ने हन्ना की सुधि ली। और वह गर्भवती होती रही, और उसने तीन पुत्रों तथा दो पुत्रियों को जन्म दिया। शमूएल बालक तो यहोवा के सामने बढ़ता गया।

22अब एली तो बहुत बूढ़ा हो गया था। उसने वह सब सुना जो उसके पुत्र सब इस्राएलियों के साथ करते थे, और यह भी कि वे मिलाप वाले तम्बू के द्वार पर सेवा करने वाली स्त्रियों के साथ कुकर्म करते थे।

23तब उसने उनसे कहा, “मैं इन सब लोगों से तुम्हारे दुष्कर्मों के विषय में सुनता हू। ये सब तुम क्या करते हो?

24मेरे बेटो, नहीं, क्योंकि यह सब शिकायत अच्छी नहीं, जो मैं यहोवा की प्रजा में प्रचारित होते सुनता हू।

25यदि एक व्यक्ति दूसरे के विरुद्ध पाप करता है तो परमेश्व उसकी मध्यस्थता करेगा। परन्तु यदि कोई व्यक्ति यहोवा के विरुद्ध पाप करता है, उसके बचाव के लिए कौन विनती कर सकता है?” परन्तु उन्होंने अपने पिता की बातों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि यहोवा उनको मार डालना चाहता था।

26परन्तु शमूएल बालक बढ़ता गया और यहोवा तथा मनुष्य दोनों का कृपापात्र बना रहा।

27फिर परमेश्वर के एक भक्त ने एली के पास आकर कहा, “यहोवा यों कहता हैः जब तेरे पिता के घराने मिस्र में पि़फ़रौन के घराने की बंधुवाई में थे तब क्या मैंने अपने को उनपर सचमुच प्रकट नहीं किया था?

28और क्या मैंने उनको इस्राएल के सब कुलों में से अपने याजक होने के लिए नहीं चुना कि वे मेरी वेदी के पास जाएं, धूप जलाएं और मेरे सामने एपोद पहनकर उपस्थित हुआ करें; और क्या मैंने तेरे पिता के घराने के लिए इस्राएलियों द्वारा चढ़ाई गई समस्त अग्निबलि नहीं दी थी?

29तब तुम मेरे बलिदानों और मेरी भेंटों पर जिनको मैंने अपने निवासस्थान में चढ़ाने की आज्ञा दी है, क्यों लात मारते हो? और तू अपने पुत्रों को क्यों मुझसे बढ़कर आदर देता है? तुम मेरी प्रजा इस्राएल की प्रत्येक भेंट का सर्वोत्तम भाग खाकर क्यों मोटे होते जाते हो?

30इसलिए इस्राएल का यहोवा परमेश्वर यों कहता हैः मैंने कहा तो था कि तेरे और तेरे पिता के घराने सर्वदा मेरे सम्मुख चला करेंगे, परन्तु यहोवा अब यह कहता है, ‘यह मुझसे दूर हो, क्योंकि जो मेरा आदर करें मैं उनका आदर करुँगा, और जो मेरा तिरस्कार करते हैं वे छोटे समझे जाएंगे।

31देखो, वे दिन आ रहे हैं जब मैं तेरा और तेरे पिता के घराने का सामर्थ्य तोड़ डालूंगा जिससे तेरे घर में कोई बूढ़ा होने न पाएगा।

32इस्राएल का मैं कितना ही उपकार क्यों न करूँ उसपर भी तू मेरे निवासस्थान का दुख ही देखेगा; और तेरे घराने में कभी कोई बूढ़ा नहीं होने पाएगा।

33फिर भी मैं तेरे कुल के सभी मनुष्यों को अपनी वेदी की सेवा से न हटाऊंगा कि उनकी आंखें रोते-रोते धुंधला जाएं और मन शोकित हो। तेरे घराने के वंशज सब जवानी में ही मर मिटेंगे।

34तेरे लिए इस बात का चिह्न वह घटना होगी जो तेरे दोनों पुत्रों होप्नी और पीनहास पर घटेगी कि वे दोनों एक ही दिन मर जाएंगे।

35परन्तु मैं अपने लिए एक विश्वासयोग्य याजक खड़ा करूँगा जो मेरे हृदय और मेरे मन की इच्छा के अनुसार किया करेगा, और मैं उसके लिए चिरस्थायी घर बनाऊंगा और वह मेरे अभिषिक्त के सामने सदा चलता रहेगा।

36और ऐसा होगा कि तेरे परिवार में बचा हुआ प्रत्येक व्यक्ति चांदी का एक सिक्का या एक रोटी पाने के लिए उसके पास आ कर दण्डवत् करेगा और कहेगा, ‘कृपया मुझे याजक के किसी सेवा-कार्य में लगा ले कि मैं रोटी का एक टुकड़ा खा सकूं’।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)