पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 25 / 36
2 इतिहास 25
1जब अमस्याह राजा बना, वह पच्चीस वर्ष का था। और उसने यरूशलेम में उनतीस वर्ष तक राज्य किया। उसकी माता का नाम यहोअद्दान था जो यरूशलेम की थी।
2उसने वह किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है परन्तु खरे मन से नही।
3और ऐसा हुआ कि जैसे ही राज्य उसके हाथ में स्थिर हो गया, उसने अपने उन कर्मचारियों को मरवा डाला जिन्होंने उसके पिता अर्थात् राजा को मार डाला था।
4फिर भी उसने उनके बाल-बच्चों को न मार डाला परन्तु यहोवा की आज्ञा के अनुसार ही किया जैसा कि मूसा की व्यवस्था की पुस्तक में लिखा है, “पुत्र के कारण पिता न मार डाला जाए और न पिता के कारण पुत्र, परन्तु जिसने पाप किया हो वही अपने उस पाप के कारण मार डाला जाए।”
5इसके अतिरिक्त अमस्याह ने समस्त लोगों को एकत्र करके उनको उनके पूर्वजों के घरानों के अनुसार सारे यहूदा और बिन्यामीन में सहस्रपतियों और शतपतियों के अधिकार में ठहराया। और जिनकी आयु बीस वर्ष या उससे अधिक थी उसने उनकी गणना की और उसे तीन लाख चुने हुए ऐसे पुरफ़ष मिले जो युद्ध में जाकर भाला चलाने तथा ढाल सम्भालने के योग्य थे।
6फिर उसने इस्राएल के एक लाख शूरवीरों को एक सौ किक्कार चांदी देकर वेतन पर रखा।
7परन्तु परमेश्वर के एक जन ने उसके पास आकर कहा, “हे राजा, इस्राएल की सेना को अपने साथ न जाने दे क्योंकि यहोवा तो इस्राएलियों अर्थात एप्रैमियों में से किसी के साथ नहीं है।
8परन्तु यदि तू जाना चाहे तो जा और युद्ध के लिए हिम्मत बांध; परन्तु परमेश्वर तुझे शत्रु के सामने गिराएगा क्योंकि परमेश्वर सहायता करने और गिरा देने, दोनों में सामर्थी है।”
9तब अमस्याह ने परमेश्वर के जन से पूछा, “परन्तु मैं जो सौ किक्कार चांदी इस्राएल दल कों दे चुका हूं उसका क्या करूं?” और परमेश्वर के जन ने कहा, “यहोवा तुझे इससे भी अधिक दे सकता है।”
10तब अमस्याह ने उस दल को जो उसके पास एप्रैम से आया था घर भेज दिया। अतः उनका क्रोध यहूदा पर भड़क उठा, और वे अत्यन्त क्रोधित होकर अपने घर लौट गए।
11तब अमस्याह साहस बांधकर अपने लोगों को युद्ध में ले गया और लवण घाटी में पहुंचकर उसने दस हजार सेईरियों को मार डाला।
12यहूदी लोग दस हजार लोगों को भी बन्दी बनाकर पहाड़ की चोटी पर ले गए, और उन्होंने उस पहाड़ की चोटी पर से उन्हें गिरा दिया जिससे वे सब नीचे गिरकर टुकड़े टुकड़े हो गए।
13परन्तु जिस दल को अमस्याह ने युद्ध में जाने से लौटा दिया था, उसने सामरिया से बेत-होरोन तक यहूदा के सब नगरों पर चढ़ाई करके तीन हजार लोगों को मार डाला और बहुत-सी लूट ले ली।
14फिर ऐसा हुआ कि जब अमस्याह ऐदोमियों का संहार करके लौटा तो वह सेईरियों के देवताओं को ले आया और उसने उन्हें अपने देवता मानकर प्रतिष्ठित किया और दण्डवत् करके उनके लिए धूप जलाई।
15तब यहोवा का क्रोध अमस्याह पर भड़क उठा और उसने उसके पास एक नबी को भेजा जिसने उससे कहा, “जो देवता अपने ही लोगाेंं को तेरे हाथ से न बचा सके, तू उनकी खोज में क्यों लगा है?”
16और ऐसा हुआ कि जब वह उससे यह कह ही रहा था तो राजा ने उससे कहा, “क्या हमने तुझे राजमंत्री ठहराया है? चुप रह! तू क्यों मार डाला जाए?” तब वह नबी यह कह कर चुप हो गया, “मैं जानता हूं कि परमेश्वर ने तेरा विनाश करना ठाना है, क्योंकि तूने ऐसा किया है और मेरी सम्मति नहीं मानी।”
17तब यहूदा के राजा अमस्याह ने सम्मति लेकर येहू के पोते, यहोआहाज के पुत्र इस्राएल के राजा योआश के पास यह कहला भेजा, “आ, हम एक दूसरे का सामना करे।”
18और इस्राएल के राजा योआश ने यहूदा के राजा अमस्याह के पास यों कहला भेजा, “लेबनोन पर की एक झड़बेरी ने लेबनोन के एक देवदार के पास कहला भेजा कि अपनी बेटी मेरे बेटे को ब्याह दे। इतने में लेबनोन के एक वन्य-पशु ने पास से निकलकर उस झड़बेरी को कुचल डाला।
19तूने कहा है कि देख, मैंने एदोम को हरा दिया। और तेरा मन फूल उठा और घमंड से डींग मारता है। अपने घर बैठ तू क्यों ऐसी विपत्ति मोल लेता है कि तू तो गिरे ही, और अपने साथ यहूदा को भी गिराए?”
20परन्तु अमस्याह ने एक न सुनी क्योंकि यह तो परमेश्वर की ओर से था कि वह उन्हें शत्रुओं के हाथ में कर दे क्योंकि वे एदोम के देवताओं की खोज में लग गए थे।
21अतः इस्राएल के राजा योआश ने चढ़ाई की और उसने तथा यहूदा के राजा अमस्याह ने यहूदा देश के बेत-शेमेश में एक दूसरे का सामना किया।
22और इस्राएल से यहूदा हार गया और उसका हर एक जन अपने-अपने डेरे को भाग गया।
23तब इस्राएल के राजा योआश ने यहूदा के राजा अमस्याह को जो यहोआहाज का पोता और योआश का पुत्र था, बेत-शेमेश में पकड़ा और यरूशलेम को ले गया और यरूशलेम की शहरपनाह को, एप्रैमी फाटक से कोने वाले फाटक तक, चार सौ हाथ गिरा दिया।
24और जितना सोना-चांदी और जितने पात्र उसे परमेश्वर के भवन में ओबेद-एदोम के पास मिले और राजभवन के खजाने और बन्दियों को भी लेकर वह सामरिया को लौट गया।
25यहोआहाज के पुत्र इस्राएल के राजा योआश की मृत्यु के पश्चात् यहूदा का राजा योआश का पुत्र अमस्याह पन्द्रह वर्ष तक जीवित रहा।
26आदि से अन्त तक अमस्याह के अन्य कार्य क्या यहूदा और इस्राएल के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में नहीं लिखे हैं?
27और जिस समय से अमस्याह ने यहोवा के पीछे चलना छोड़ दिया था तब से यरूशलेम में उसके विरफ़द्ध षड्यंत्र रचा जाने लगा, और वह लाकीश को भाग गया; परन्तु लाकीश तक उसका पीछा करके उसे मार डाला गया।
28फिर उसे घोड़ों पर रखकर यहूदा के नगर में लाया गया और उसे उसके पूर्वजों के मध्य वहीं मिट्टी दी गई।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)