पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 34 / 36
2 इतिहास 34
1जब योशिय्याह आठ वर्ष का था तब वह राजा बना। और उसने यरूशलेम में इकतीस वर्ष तक राज्य किया।
2और उसने वही किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है, और वह अपने मूल पिता दाऊद के मार्ग पर चला और उससे न तो दाहिने मुड़ा और न बाए।
3अपने राज्य के आठवें वर्ष में जब वह युवा ही था तो अपने मूल पुरफ़ष दाऊद के परमेश्वर की खोज करने लगा, और बारहवें वर्ष में उसने ऊंचे स्थान, अशेराओं और नक्काशीदार और ढली हुई मूर्तियों को हटाकर यहूदा और यरूशलेम को शुद्ध करना आरम्भ किया।
4उसके सामने ही बाअल की वेदियां तोड़ डाली गईं और उसने धूप की वेदियां जो ऊंचे पर थीं काट डाली; और अशेराओं और नक्काशीदार तथा ढली हुई मूर्तियों को उसने तोड़ कर बुकनी बना दिया और उसे उन लोगों की कब्रों पर छितरा दिया जिन्होंने उनके लिए बलिदान चढ़ाए थे।
5फिर उसने पुजारियों की हड्डियां उन्हीं की वेदियों पर जला दीं और यहूदा तथा यरूशलेम को शुद्ध किया।
6तब उसने मनश्शे, एप्रैम, शिमोन और नप्ताली तक के नगरों तथा आसपास के खंडहरों की,
7वेदियों को तोड़ डाला और उसने अशेराओं और नक्काशीदार मूर्तियों को कूट-कूटकर बुकनी बना दिया, और समस्त इस्राएल देश में की धूप-वेदियों को काट डाला। तब वह यरूशलेम को लौट गया।
8अपने राज्य के अठारहवें वर्ष में जब वह देश और भवन दोनों को शुद्ध कर चुका तो उसने असल्याह के पुत्र शापान, नगर के एक अधिकारी मासेयाह, और योआहाज के पुत्र इतिहासकार योआह को अपने परमेश्वर यहोवा के भवन की मरम्मत करने के लिए भेजा।
9और उन्होंने हिलकिय्याह महायाजक के पास आकर वह पैसा दे दिया जो परमेश्वर के भवन में लाया गया था अर्थात् जिसे लेवीय द्वारपालों ने मनश्शियों, एप्रैमियों और शेष रह गए इस्राएलियों से और सब यहूदावंशियों और बिन्यामीनियों से, और यरूशलेम के निवासियों से एकत्र किया था।
10तब उन्होंने उसे उन कारीगरों के हाथों में सौंप दिया जो यहोवा के भवन के काम के निरीक्षक थे, और यहोवा के भवन में उन काम करने वालों ने उसे भवन की मरम्मत करने और सुधारने में लगाया।
11अर्थात् उन्होंने उसे बढ़इयों और राजगीरों को सौंप दिया कि वे गढ़े हुए पत्थर और जोड़ों के लिए लकड़ी खरीद लें तथा उन घरों के लिए कड़ियां बनाएं जिन्हें यहूदा के राजाओं ने नष्ट होने दिया था।
12और इन लोगों ने निरीक्षकों के निर्देशन में विश्वसनीयता से काम किया। अर्थात् यहत, और ओबघाह, मरारी-वंशीय लेवीय, कहात-वंशीय जकर्याह और मशुल्लाम, और लेवीय, ये सब तो साज बजाने में निपुण थे।
13वे बोझ उठाने वालों के ऊपर भी थे और हर एक काम करने वाले का निरीक्षण करते थे। और कुछ लेवीय तो शास्री और अधिकारी और द्वारपाल थे।
14जब वे उस पैसे को जो यहोवा के भवन में लाया गया था निकाल रहे थे, तब हिलकिय्याह याजक को मूसा द्वारा दी गई यहोवा की व्यवस्था की पुस्तक मिली।
15और हिलकिय्याह ने शापान शास्त्री से कहा, “मुझे यहोवा के भवन में व्यवस्था की पुस्तक मिली है।” और हिलकिय्याह ने वह पुस्तक शापान को दे दी।
16तब शापान उस पुस्तक को राजा के पास ले आया और उसने यह कहकर राजा को विवरण दियाः “जो-जो काम तेरे सेवकों को सौंपा गया था वे उसे कर रहे है।
17और जो पैसा यहोवा के भवन में मिला वह सब-का-सब उन्होंने निरीक्षकों और कारीगरों के हाथों में सौंप दिया है।”
18फिर शापान शास्री ने राजा को यह भी बताया, “हिलकिय्याह याजक ने मुझे एक पुस्तक दी है।” और शापान ने राजा को उसमें से पढ़कर सुनाया।
19और ऐसा हुआ कि जब राजा ने व्यवस्था के इन वचनों को सुना तो उसने अपने वस्त्र फाड़े।
20तब राजा ने हिलकिय्याह, शापान के पुत्र अहीकाम, मीका के पुत्र अब्दोन, शापान शास्री और राजा के असायाह नामक कर्मचारी को यह कहकर आज्ञा दी,
21“तुम जाकर मेरी ओर से और उनकी ओर से जो इस्राएल और यहूदा में शेष रह गए हैं इस पाई गई पुस्तक के वचनों के विषय में यहोवा से पूछो; क्योंकि यहोवा का कोप हम पर इसलिए अत्यधिक भड़का है कि हमारे पूर्वजों ने यहोवा का वचन नहीं माना जिससे इस पुस्तक में लिखी हुई सब आज्ञाओं के अनुसार करते।”
22अतः हिलकिय्याह तथा वे लोग जिनसे राजा ने कहा था उन्होंने हुल्दा नबिया के पास जाकर उससे उसी विषय में बातें की। वह तो उस शल्लूम की पत्नी थी जो तोख्त का पुत्र, हस्रा का पोता और वस्रालय का रखवाला था। वह यरूशलेम की नई बस्ती में रहती थी।
23तब उसने उनसे कहा, “इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, ‘जिस व्यक्ति ने तुम्हें मेरे पास भेजा है उससे जाकर कहो,
24यहोवा यों कहता हैः सुन, मैं इस स्थान और इसके निवासियों पर विपत्ति डालूंगा अर्थात् वे सब शाप जो इस पुस्तक में लिखे हैं और जो यहूदा के राजा की उपस्थिति में पढ़ी गई।
25क्योंकि उन्होंने मुझे त्याग दिया और पराए देवताओं के लिए धूप जलाई और अपनी बनाई हुई सब वस्तुओं के द्वारा मुझे क्रोध दिलाया है, इस कारण मेरा कोप इस स्थान पर भड़केगा और वह शान्त न होगा।”
26परन्तु यहूदा का राजा जिसने तुम्हें यहोवा से पूछने भेजा है उससे तुम यों कहो, ‘इन वचनों के विषय में जो तुमने सुने हैं, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है,
27“क्योंकि तेरा हृदय नम्र हुआ और इस स्थान तथा यहां के निवासियों के विषय में सुन कर तू परमेश्वर के सम्मुख दीन बना और तूने मेरे सामने दीन होकर अपने वस्र फाड़े और मेरे सामने रोया है, इसलिए सचमुच मैंने तेरी सुनी है,”यहोवा की यही वाणी है,
28“सुन, मैं तुझे तेरे पूर्वजों के साथ मिलाऊंगा और तू शान्तिपूर्वक अपनी कब्र को पहुंंचाया जाएगा जिससे कि तेरी आंखें उस विपत्ति को जो मैं इस स्थान और इसके लोगों पर डालने वाला हूं नहीं देखने पाएंगी’।” और लोगों ने लौट कर राजा को यह संदेश दिया।
29तब राजा ने यहूदा और यरूशलेम के सब प्राचीनों को बुलाकर एकत्र किया।
30तब राजा और यहूदा के सब लोग और यरूशलेम के सब निवासी, याजक, लेवीय, छोटे से लेकर बड़े तक, प्रजा के सब लोग यहोवा के भवन में गए। तब उसने उनको वाचा की उस पुस्तक के सब वचन पढ़ सुनाए जो उनको यहोवा के भवन में मिली थी।
31तब राजा अपने स्थान पर खड़ा हो गया और उसने यहोवा के पीछे चलने, और उसकी आज्ञाओं, चितौनियों और विधियों को अपने सम्पूर्ण मन और सम्पूर्ण प्राण से मानने तथा वाचा की इस पुस्तक में लिखी सब बातों को पूरा करने के लिए यहोवा से वाचा बांधी।
32फिर उसने उन सबसे जो यरूशलेम और बिन्यामीन में थे ऐसी ही वाचा बंधाई। अतः यरूशलेम के निवासियों ने अपने परमेश्वर अर्थात् अपने पूर्वजों के परमेश्वर की वाचा के अनुसार किया।
33और योशिय्याह ने इस्राएलियों के सब देशों में से सब घिनौनी वस्तुओं को दूर किया और जितने लोग इस्राएल में थे उन सबसे परमेश्वर यहोवा की उपासना करवाई उन्होंने उसके जीवन भर अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा के पीछे चलना न छोड़ा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)