पुराना नियम · 2 राजा · अध्याय 6 / 25
2 राजा 6
1नबियों के चेलों ने एलीशा से कहा, “देख यह स्थान जहां हम तेरे सम्मुख रहते हैं, हमारे लिए बहुत छोटा है।
2हमें यर्दन तक जाने की अनुमति दे कि हममें से प्रत्येक एक-एक बल्ली लाए और हम वहां अपना निवास-स्थान बनाएं जहां हम रह सके।” उसने कहा, “जाओ।”
3तब किसी ने कहा, “कृपया, अपने दासों के संग चल।” उसने कहा, “मैं चलूंगा।”
4अतः वह उनके साथ गया। जब वे यर्दन के किनारे पहुंचे तो लकड़ी काटने लगे।
5जब एक जन बल्ली काट रहा था तो कुल्हाड़ी बेंट से निकलकर जल में गिर गई; अतः वह पुकार कर बोला, “हाय, मेरे स्वामी! वह तो मांगी हुई थी।”
6तब यहोवा के जन ने पूछा, “वह कहां गिरी?” जब उसने वह स्थान दिखाया, तब एलीशा ने एक लकड़ी काटकर वहां डाल दी; और लोहा तैरने लगा।
7तब उसने कहा, “उसे उठा ले,” अतः उस व्यक्ति ने हाथ बढ़ा कर उसे उठा लिया।
8सीरिया का राजा इस्राएल से युद्ध कर रहा था। उसने अपने कर्मचारियों से सलाह लेकर कहा, “मेरी छावनी अमुक स्थान में होगी।”
9तब परमेश्वर के जन ने इस्राएल के राजा को यह कहकर सन्देश भेजा, “सावधान! इस स्थान से होकर न जाना, क्योंकि सीरियाई इसी मार्ग से होकर आ रहे है।”
10अतः इस्राएल के राजा ने उस स्थान को जिसके विषय में परमेश्वर के जन ने कहा था, दूत भेजा। इसी प्रकार वह उसे चेतावनी देता रहा जिससे राजा अनेक बार वहां अपनी रक्षा कर सका।
11इस बात से सीरिया का राजा क्रोधित हुआ। उसने अपने कर्मचारियों को बुलाकर पूछा, “क्या तुम मुझे बताओगे, हममें से कौन इस्राएल के राजा की ओर है?”
12तब उसके कर्मचारियों में से एक ने उससे कहा, “हे मेरे स्वामी, राजा, हममें से कोई नही। एलीशा जो इस्राएल में नबी है, इस्राएल के राजा को वे बातें भी बतलाता है जो तू अपने शयन-कक्ष में कहता है।”
13अतः उसने कहा, “जाओ, देखो कि वह कहां है ताकि मैं सिपाही भेजकर उसे पकड़ सकूँ।” तब उसे बतलाया गया, “देख, वह दोतान में है।”
14तब उसने घोड़े, रथ और एक बड़ी सेना वहां भेजी और उन्होंने वहां रात में पहुंचकर नगर को घेर लिया।
15भोर को जब परमेश्वर के जन का सेवक उठकर बाहर गया तो देखो, घोड़ों और रथों सहित सेना नगर को घेरे हुई थी। तब उसके सेवक ने उससे कहा, “हाय मेरे स्वामी, हम क्या करें?”
16उसने उत्तर दिया, “मत डर, क्योंकि जो हमारे साथ हैं वे उनसे अधिक हैं जो उनके साथ है।”
17तब एलीशा ने प्रार्थना की, “हे यहोवा, मैं प्रार्थना करता हूं, इसकी आंखे खोल दे कि देख सके।” तब यहोवा ने सेवक की आंखे खोल दीं, और उसने देखाः और देखो, एलीशा के चारों ओर पर्वत तो घोड़ों और आग के रथों से भरा हुआ था।
18और जब वे उसकी ओर बढ़ेे, तो एलीशा ने यहोवा से प्रार्थना की, “इन लोगों को अंधा कर दे।” अतः एलीशा के वचन के अनुसार उसने उन्हें अंधा कर दिया।
19तब एलीशा ने उनसे कहा, मार्ग यह नहीं, और न यह वह नगर है। मेरे पीछे-पीछे आओ तो मैं तुम्हें उस मनुष्य तक पहुंचा दूंगा जिसे तुम ढूंढ रहे हो।” और वह उन्हें सामरिया ले गया।
20जब वे सामरिया में पहुंच गए तब एलीशा ने कहा, “हे यहोवा, इन लोगों की आंखें खोल दे कि देख सके।” अतः यहोवा ने उनकी आंखे खोल दीं, और उन्होंने देखा कि हम सामरिया के बीच में है।
21तब इस्राएल के राजा ने उन्हें देखकर एलीशा से पूछा, “हे मेेरे पिता, क्या मैं इन्हें मार डालूं? क्या मैं इन्हें मार डालूं?”
22उसने उत्तर दिया, “तू उन्हें न मार। क्या तू उन्हें मार डालता है जिन्हें तू अपनी तलवार और अपने धनुष के द्वारा बंदी बना लेता है? उनके आगे रोटी और जल रख कि वे खाएं और पिएं और अपने स्वामी के पास चले जाए।”
23अतः उसने उनके लिए बड़ा भोज तैयार किया, और जब वे खा-पी चुके तो उन्हें विदा किया, और वे अपने स्वामी के पास चले गए। और सीरिया के दल इस्राएली देश में फिर न आए।
24इसके पश्चात् ऐसा हुआ कि सीरिया के राजा बेनहदद ने अपनी सारी सेना को एकत्र किया और सामरिया पर आक्रमण करके उसको घेर लिया।
25तब सामरिया में बड़ा अकाल पड़ा। और देखो, वह ऐसा घिरा रहा कि गदहे का सिर चांदी के अस्सी शेकेल में, और कब की चौथाई भर कबूतर की बीट पांच शेकेल में बिकने लगी।
26अब इस्राएल का राजा तो शहरपनाह पर घूम रहा था कि एक स्त्री ने पुकार कर कहा, “हे मेरे प्रभु, हे राजा, बचा!”
27उसने कहा, “यदि यहोवा तुझे न बचाए तो मैं कहां से बचाऊं? क्या खलिहान से? क्या दाखरस कुंड से?”
28फिर राजा ने उससे पूछा, तुझे क्या हुआ?” उस स्त्री ने उत्तर दिया, “इस स्त्री ने मुझसेे कहा था, ‘अपना बेटा दे कि आज हम उसे खाएं, और मेरे बेटे को कल खाएंगी।’
29अतः मेरे बेटे को हमने पकाकर खा लिया। दूसरे दिन मैंने उससे कहा, ‘अपना बेटा दे कि हम खाएं’ परन्तु उसने अपने बेटे को छिपा दिया है।”
30और ऐसा हुआ कि जब उस स्त्री के वचन राजा ने सुने तो अपने वस्त्र फाड़े। वह तो शहरपनाह पर से जा रहा था, और लोगों ने देखा कि वह शरीर पर टाट ही धारण किए हुए है।
31तब उसने कहा, “यदि आज शापात के पुत्र एलीशा का सिर धड़ पर बना रहे तो यहोवा मुझसे ऐसा ही वरन् इससे भी अधिक करे।”
32एलीशा अपने घर के द्वार पर बैठा था तथा प्राचीन उसके साथ बैठे थे। तब राजा ने अपने पास से एक व्यक्ति को भेजा, परन्तु दूत के पहुंचने से पहले उसने प्राचीनों से कहा, “देखो, इस हत्यारे के पुत्र ने तो मेरा सिर लेने के लिए भेजा है? सुनो, जब दूत आए तो द्वार अच्छी तरह से बन्द रखकर उसे रोके रहना। क्या उसके पीछे उसके स्वामी के पैरों की आहट नहीं सुनाई देती?”
33जब वह बात कर ही रहा था तो देखो, दूत ने उसके पास पहुंचकर कहा, “देख, यह विपत्ति यहोवा की ओर से है। अब मैं यहोवा की प्रतीक्षा क्यों करता रहूं?”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)