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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 28 / 34

व्यवस्थाविवरण 28

1“यदि तू ध्यान से अपने परमेश्वर यहोवा की सुने तथा उसकी जो आज्ञाएं आज मैं तुझे सुना रहा हूं उन सबका पालन करने की चौकसी करे तो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे पृथ्वी की समस्त जातियों से अधिक उन्नत करेगा।

2और यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा माने, तो ये सब आशीषें तुझ पर आ बरसेंगी।

3धन्य हो तू नगर में, और धन्य हो तू गाँव मे।

4धन्य हो तेरी सन्तान, और तेरी भूमि की उपज, तेरे पशुओं के बच्चे, तेरे मवेशियों की बढ़ती, तेरे रेवड़ के मेमने।

5धन्य हो तेरी टोकरी और तेरी कठौती।

6धन्य हो तू भीतर आते समय, और धन्य हो तू बाहर जाते समय।

7“जो शत्रु तुझ पर आक्रमण करेंगे उनको यहोवा तेरे सामने पराजित करवा देगा। वे एक मार्ग से तुझ पर आक्रमण करेंगे तथा तेरे सामने से सात मार्गों से होकर भाग निकलेंगे।

8तेरे खत्तों में तथा जिन-जिन कार्यों में तू हाथ लगाए, उन सबमें यहोवा तुझ पर आशीष देगा, और वह उस देश में जिसे तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे दे रहा है आशीष देगा।

9यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं का पालन करे तथा उसके मार्गों पर चले तो यहोवा अपनी शपथ के अनुसार तुझे अपने लिए एक पवित्र प्रजा करके सुदृढ़ करेगा।

10अतः पृथ्वी की समस्त जातियां देख लेंगी कि तू यहोवा का कहलाता है, और वे तुझसे डरेंगी।

11जिस देश को तुझे देने के लिए यहोवा ने तेरे पूर्वजों से शपथ खाई थी उस देश में यहोवा तेरी सन्तान में, तेरे पशुओं के बच्चों में तथा तेरी भूमि की उपज में तुझे समृद्ध करेगा।

12यहोवा तेरी भूमि को उसकी ट्टतु में वर्षा देने के लिए तथा तेरे हाथ के सब कामों पर आशीष देने के लिए आकाशरूपी अपने भले भंडार को खोल देगा, तब तू अनेक जातियों को ट्टण देगा, परन्तु स्वयंं ट्टण नहीं लेगा।

13यहोवा तुझको पूँछ नहीं, सिर ही बनाएगा, तू नीचे नहीं, ऊपर ही रहेगा-यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की उन आज्ञाओं को जिनका आदेश मैं आज दे रहा हूं सुनकर ध्यान से उनका पालन करे

14तथा जिन वचनों की मैं आज तुझे आज्ञा दे रहा हूं उनमें से किसी से भी दाहिने या बाएं मुड़कर अन्य देवताओं की उपासना न करने लग जाए।

15“यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की न सुने और जिन नियमों और विधियों की आज्ञा मैं आज तुझे दे रहा हूं उन सब को मानने में चौकसी न करे तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।

16शापित हो तू नगर में , और शापित हो तू गांव मे।

17शापित हो तेरी टोकरी तथा तेरी कठौती।

18शापित हो तेरी सन्तान तथा तेरी भूमि की उपज, तेरे मवेशियों की बढ़ती तथा तेरे रेवड़ के बच्चे।

19शापित हो तू भीतर आते समय और शापित हो तू बाहर जाते समय।

20“मुझ यहोवा को त्याग देने और बुरे कार्यों का प्रतिफल यह होगा कि तू जो-जो काम हाथ में ले उन सब पर यहोवा तब तक शाप, घबराहट और फटकार भेजेगा, जब तक तू नष्ट होकर शीघ्र मिट न जाए।

21यहोवा तुझ पर तब तक मरी फैलाए रहेगा जब तक वह तुझे उस देश से जिसे तू अधिकार में करने के लिए उसमें प्रवेश करने पर है, मिटा न डाले।

22यहोवा तुझको क्षय, ज्वर, जलन, भयंकर ताप, तलवार, झुलस तथा गेरफ़ई से मारेगा, और वे तब तक तेरे पीछे लगे रहेंगे जब तक तेरा पूर्णतः विनाश न हो जाए।

23और तेरे सिर के ऊपर आकाश कांसा तथा तेरे पांव तले धरती लोहा बन जाएगी।

24यहोवा तेरे देश में वर्षा के बदले रेत और धूल बरसाएगा। वे आकाश से तब तक बरसती रहेंगी जब तक कि तू धूल में मिल न जाए।

25यहोवा तुझको तेरे शत्रुओं से पराजित करवाएगा। तू एक मार्ग से तो उन पर चढ़ाई करेगा, परन्तु सात मार्गों से होकर उनके सामने से भागेगा, तथा तू पृथ्वी के सब राज्यों के लिए भयंकर उजाड़ का उदाहरण बन जाएगा।

26और तेरे शव आकाश के सब पक्षियों तथा पृथ्वी के पशुओं का आहार बन जाएंगे, और उनको भगाने वाला कोई नहीं रहेगा।

27“फिर यहोवा तुझे मिस्र के-से फोड़ों, बवासीर, दाद और खुजली से ऐसा पीड़ित करेगा कि तू उनसे चंगा नहीं हो सकेगा।

28यहोवा तुझे पागलपन, अन्धेपन तथा मन की घबराहट से पीड़ित करेगा।

29जैसा अन्धा अन्धकार में वैसा ही तू दिन-दुपहरी में टटोलेगा, और तू अपने कार्यों में सफल नहीं होगा, परन्तु निरन्तर सताया और लूटा जाएगा, और तुझे छुड़ाने वाला कोई नहीं रहेगा।

30तू स्री से सगाई तो करेगा, परन्तु दूसरा पुरफ़ष उसे भ्रष्ट करेगा। तू घर तो बनाएगा, परन्तु उसमें रहने नहीं पाएगा। तू दाख की बारी तो लगाएगा, परन्तु उसका फल चखने भी नहीं पाएगा।

31तेरा बैल तेरी आंखों के सामने काटा जाएगा, परन्तु तू उसमें से खाने न पाएगा। तेरा गदहा तुझसे छीन लिया जाएगा, परन्तु तुझे लौटाया नहीं जाएगा, तेरी भेड़ें तेरे शत्रुओं को दे दी जाएंगी और तेरा छुड़ाने वाला कोई न होगा।

32तेरे पुत्र-पुत्रियां दूसरे देश के लोगों को दे दी जाएंगी, और तेरी आँखें निरन्तर उनकी प्रतीक्षा में तरसती रहेंगी, परन्तु तू कुछ नहीं कर सकेगा।

33तेरी भूमि की उपज तथा तेरे सारे परिश्रम का फल एक अनजाने देश के लोग खा जाएंगे। परन्तु तू निरन्तर अंधेर सहता और पीसा जाता रहेगा।

34तू अपनी आँखों से जो दृश्य देखेगा, उनसे पागल हो जाएगा।

35यहोवा तुझे नख से शिख तक वरन् तेरे घुटनों तथा टांगों को ऐसे बुरे फोडा़ें से पीड़ित करेगा कि तू चंगा नहीं हो सकेगा।

36यहोवा तुझको तथा जिस राजा को तू अपने ऊपर प्रतिष्ठित करेगा उसको एक ऐसी जाति के मध्य ले जाएगा जिसे न तो तूने और न तेरे पूर्वजो ने जाना था। वहां तू काठ और पत्थर से बने देवताओं की पूजा करेगा।

37जिन सब जातियों के मध्य यहोवा तुझे खदेड़ेगा उनमें तू एक भयानक विनाश, कहावत तथा निन्दा का पात्र बनेगा।

38“तू खेत में बीज तो बहुत-सा बोएगा, परन्तु उपज बहुत कम बटोरेगा, क्योंकि टिड्डियां उसे चट कर डालेंगी।

39तू दाख की बारियां लगाकर उनमें परिश्रम करेगा, परन्तु तू न तो उनका रस पी पाएगा और न अंगूर तोड़ सकेगा, क्योंकि कीड़े खा जाएंगे।

40तेरे सम्पूर्ण क्षेत्र में जैतून के पेड़ तो होंगे, परन्तु तू उनका तेल लगाने न पाएगा, क्योंकि उनके फल झड़ जाएंगे।

41तेरे पुत्र-पुत्रियां उत्पन्न तो होंगे, पर वे तेरे रहेंगे नहीं, क्योंकि वे बँधुवाई में चले जाएंगे।

42तेरे सब वृक्षों तथा तेरी भूमि की उपज को टिड्डियां खा जाएंगी।

43तेरे मध्य जो परदेशी वास करता है वह तुझसे बढ़ता जाएगा।

44वह तुझे ट्टण देगा, परन्तु तू उसे ट्टण नहीं दे सकेगा। वह तो सिर, और तू पूँछ ठहरेगा।

45अतः ये सब शाप तुझ पर आएंगे, और तेरा पीछा करेंगे, तथा तुझ पर तब तक छाए रहेंगे जब तक तू नष्ट न हो जाए, क्योंकि तू अपने परमेश्वर यहोवा की दी हुई आज्ञाओं और विधियों का पालन करके उसकी सुनना नही चाहता।

46वे तेरे तथा तेरी सन्तान के लिए सदा चिह्न और चमत्कार बने रहेंगे।

47तूने सब वस्तुओं की बहुतायत के कारण भी अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा आनन्दमय और प्रसन्न हृदय से नहीं की।

48इसलिए जिन शत्रुओं को यहोवा तेरे विरफ़द्ध भेजेगा, उनकी तू भूख, प्यास, नंगेपन तथा सब वस्तुओं की कमी में सेवा करेगा। वह तेरी गर्दन पर लोहे का जुआ तब तक डाले रखेगा, जब तक वह तुझे नष्ट न कर डाले।

49“जैसे उकाब वेग से झपटकर नीचे आता है वैसे ही यहोवा तेरे विरफ़द्ध दूर से वरन् पृथ्वी के छोर से एक ऐसी जाति को चढ़ा ले आएगा, जिसकी भाषा तू नहीं समझेगा।

50ऐसी जाति जिसका चेहरा भयंकर होगा, जिसमें न वृद्धों के लिए आदर, न बच्चों के लिए दया होगी।

51वह तेरे मवेशियों के बच्चों तथा तेरी भूमि की उपज को तब तक खाएगी जब तक तेरा सर्वनाश न कर डाले। वह न तो तेरे लिए अन्न, दाखरस या तेल छोड़ेगी, न तेरे मवेशियों की बढ़ती या तेरे रेवड़ के बच्चे छोड़ेगी जब तक तुझे नष्ट न कर डाले।

52वह तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे तब तक घेरे रखेगी जब तक तेरे सारे देश में ऊँची और दृढ़ शहरपनाह जिस पर तू भरोसा रखता था ढह न जाए। जो देश तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे दिया है, उस सारे देश के फाटकों के भीतर वह जाति तुझे घेरे रखेगी।

53जब तेरा शत्रु घेराबन्दी तथा संकट के द्वारा तुझे सताएगा, तब तू अपनी देह के फल अर्थात् अपने उन पुत्र तथा अपनी उन पुत्रियों का मांस खाएगा जो तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे दिए है।

54तब तेरे मध्य जो कोमल तथा अत्यधिक सुकुमार होगा, वह भी अपने भाई, अपनी प्राण-प्रिय पत्नी, तथा अपने शेष बच्चों को क्रूर दृष्टि से देखेगा,

55यहां तक कि वह उनमें से किसी को अपने बच्चों के उस मांस में से टुकड़ा तक नहीं देगा जिसे वह स्वयं खाने पर हो। क्योंकि जिस घेरेबन्दी और संकट से तेरा शत्रु तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे सताएगा उसमें उसके पास और कुछ शेष नहीं रहेगा।

56तेरे मध्य जो कोमलांगी तथा सुकुमार स्री होगी और जो अपनी कोमलता एवं सुकुमारता के कारण अपने पांव भी भूमि पर रखने का साहस नहीं करती, वह भी अपने प्राण-प्रिय पति तथा अपने पुत्र और अपनी पुत्री को

57अपनी जांघों के बीच से निकली खेड़ी तथा अपने उत्पन्न होने वाले बच्चे देना नहीं चाहेगी, क्योंकि जिस घेरेबन्दी और संकट से तेरा शत्रु तेरे सब फाटकों की भीतर तुझे सताएगा, उस अवधि में वह उनको छिपकर खाएगी, क्योंकि उसके पास और कुछ नहीं रहेगा।

58“यदि तू इस व्यवस्था की पुस्तक में लिखे हुए सब वचनों को पालन करने, तथा इस आदरणीय और भययोग्य नाम अर्थात् अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानने की चौकसी न करे,

59तो यहोवा तुझे तथा तेरी सन्तान को अद्भुत मरी, हां, भयंकर और दीर्घकालिक रोग, वरन् दुखदाई और असाध्य रोगों से पीड़ित करेगा।

60वह मिस्र के उन सब रोगों को जिनसे तू डरता था, तुझ पर लौटा ले आएगा और वे तुझमें लगे रहेंगे।

61जितने रोगों और मरियों का उल्लेख इस व्यवस्था की पुस्तक में किया भी नहीें गया है, उन सब को यहोवा तुझ पर लगाए रखेगा जब तक कि तुम्हारा सर्वनाश न हो जाए।

62अभी तो तुम आकाश के तारों के समान अनगिनित हो, परन्तु उस समय अपने परमेश्वर यहोवा की न सुनने के कारण थोड़े ही रह जाओगे।

63और ऐसा होगा कि जैसे यहोवा को तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता था, वैसे ही तब उसको तुम्हारा विनाश वरन् सर्वनाश करने से हर्ष होगा, और जिस देश को तुम अधिकार में करने के लिए वहां प्रवेश करने पर हो उसमें से तुम उखाड़ फेंके जाओगे।

64फिर यहोवा तुझको पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सब जातियों के मध्य तितर-बितर कर देगा। वहां तू काठ और पत्थर के पराए देवताओं की पूजा करेगा जिनको न तो तूने और न तेरे पूर्वजों ने जाना है।

65उन जातियों के मध्य तुझे कोई विश्राम नहीं मिलेगा, तथा तेरे पैर के तलवे के लिए कोई ठिकाना नहीं मिलेगा। परन्तु वहां यहोवा तुझे कांपता हृदय, धुंधली आंखें, तथा व्याकुल मन देगा।

66अतः तेरे जीवन का कोई ठिकाना नहीं रहेगा और तेरे जीवन का कोई भरोसा नहीं रहेगा।

67जो भय तेरे मन में समाया है और जो दृश्य तेरी आँखों के सामने है उसके कारण तू प्रातःकाल कहेगा, ‘संध्या कब होगी,’ और संध्या समय तू कहेगा, ‘भोर कब होगा।’

68और यहोवा तुमको जहाजों पर चढ़ाकर उस मार्ग से मिस्र में लौटा ले आएगा जिसके विषय में मैंने तुमसे कहा था कि तुम इसको फिर कभी देखने न पाओगे। वहां तुम अपने-अपने शत्रुओं के सामने दास-दासी होने के लिए बिकने को खड़े हो जाओगे, परन्तु खरीदने वाला कोई नहीं होगा।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)