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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 33 / 34

व्यवस्थाविवरण 33

1जो आशीर्वाद परमेश्वर के जन मूसा ने अपनी मृत्यु से पहले इस्राएलियों को दिया वह यह है।

2उसने कहा “यहोवा सीनै से आया तथा उसके लिए सेईर से उदय हुआ, वह पारान पर्वत से चमक उठा, और करोड़ों पवित्रों के मध्य में से आया। उसके दाहिने हाथ में उनके लिए चमकती हुई बिजली थी।

3निःसंदेह, वह अपनी प्रजा से प्रेम करता है। उसके सब पवित्र लोग उसके हाथ में हैं, वे तेरे पद-चिह्नों पर चलते है। प्रत्येक को तेरे वचन में से मिलता है।

4मूसा ने हमें व्यवस्था से आज्ञा दी, याकूब की मंडली को उत्तराधिकार दिया।

5और वह यशूरून में राजा था, जब प्रजा के प्रधान और इस्राएल के सब गोत्र एकत्रित हुए।

6“रूबेन जीवित रहे और न मरे, और न उसके लोग थोड़े हो।”

7और यहूदा के विषय में उसने यह कहा, “हे यहोवा, यहूदा की वाणी सुन, और उसे उसके लोगों में पहुँचा, वह अपने हाथों से उसके लिए लड़ा; तू ही उसके विरोधियों के विरफ़द्ध उसका सहायक हो।”

8लेवी के विषय में उसने कहा, “तेरे तुम्मीम और तेरे ऊरीम तेरे भक्त के पास रहें जिसको तूने मस्सा में परखा और जिसके साथ तूने मरीबा के सोते पर विवाद किया था।

9उसने अपने माता-पिता के विषय में कहा, ‘मैं उनको नहीं जानता।’ उसने अपने भाइयों को अपना नहीं माना, न उसने अपने निज पुत्रों का सम्मान किया, उन्होंने तो तेरे वचन का पालन किया और तेरी वाचा को माना है।

10वे याकूब को तेरे नियम सिखाएंगे। तथा इस्राएल को तेरी व्यवस्था। वे तेरे आगे धूप जलाएंगे तथा तेरी वेदी पर सर्वांग पशु की होमबलि चढ़ाएंगे

11हे यहोवा, उसकी सम्पत्ति पर आशीष दे, और उसके हाथों के काम को ग्रहण कर। उसके विरोधियों तथा बैरियों की कमर ऐसी तोड़ कि वे फिर न उठने पाए।”

12बिन्यामीन के विषय में उसने कहा, “यहोवा का प्रिय जन उसके समीप सुरक्षा में रहे, जो दिन भर उसकी ढाल बना रहता है तथा वह यहोवा के कंधों के बीच निवास करता है।”

13और यूसुफ के विषय में उसने कहा, “उसका देश यहोवा के द्वारा आशीषित हो, स्वर्ग की सर्वोत्तम चीजों से, और ओस तथा गहराई के जल से,

14और सूर्य के सर्वोत्तम उत्पादन से, तथा मौसम की सर्वोत्तम उपज से।

15प्राचीन पर्वतों की सर्वश्रेष्ठ वस्तुओं से, तथा सनातन पहाड़ियों की सर्वोत्तम वस्तुओं से,

16पृथ्वी की सर्वोत्तम वस्तुओं तथा उसकी भरपूरी से, और जो झाड़ियों में निवास करता है उसके अनुग्रह से उसे यूसुफ के सिर अर्थात् उसके सिर के चांद पर, जो अपने भाइयों में न्यारा ठहरा, आशीष ही आशीष बरसे।

17उसका प्रताप पहलौठे सांड़-का-सा है उसके सींग मानो जंगली सांड के सींग हैं; उनसे वह देश-देश के लोगों को एक साथ पृथ्वी के छोर तक ढकेल देगा। ऐसे हैं एप्रैम के लाखों-लाख, और ऐसे हैं मनश्शे के हजारों-हजार।”

18जबूलून के विषय में उसने कहा, “हे जबूलून, अपने प्रस्थान करने में, और हे इस्साकार, तू अपने तम्बू में आनन्द मना।

19वे जाति-जाति को पर्वत पर बुलाएंगे; वहां वे धर्ममय बलिदान चढ़ाएंगे। वे समुद्रों की बहुतायत को तथा बालू में छिपे धन को खोज निकालेंगे।”

20और गाद के विषय में उसने कहा, “धन्य है वह जो गाद को बढ़ाता है; वह सिंहनी के समान दुबक कर रहता है, तथा भुजा और सिर के चांद दोनों को फाड़ डालता है।

21तब उसने पहला भाग तो अपने लिए चुन लिया, क्योंकि वहां शासक का भाग सुरक्षित था; और वह प्रजा के प्रधानों के साथ मिला और उसने यहोवा के न्याय तथा नियमों को इस्राएल पर लागू किया।”

22दान के विषय में उसने कहा, “दान तो सिंह का बच्चा है, वह बाशान से टूट पड़ता है।”

23फिर नप्ताली के विषय में उसने कहा, “हे नप्ताली, तू जो यहोवा की अनुकम्पा से तृप्त और आशीषों से भरपूर है, सागर और दक्षिण पर अधिकार कर ले।”

24और आशेर के विषय में उसने कहा, “आशेर अन्य पुत्रों से अधिक आशीषित हो, उस पर अपने भाइयों की अनुकम्पा हो और वह अपना पांव तेल में डुबोए।

25तेरे बेंड़ें लोहे और कांसे के हों, तथा तेरे अन्तिम दिनों के अनुसार तुझे सुख-चैन मिले।

26“यशूरून के परमेश्वर के तुल्य और कोई नहीं है! वह तो तेरी सहायता के लिए आकाश पर तथा अपने प्रताप में बादलों पर सवारी करता है

27अनन्त परमेश्वर शरणस्थान है, और नीचे सनातन भुजाएं है। वह शत्रुओं को तेरे सामने से भगा देता है, और कहता है, ‘सर्वनाश कर दो!’

28अतः अन्न और नए दाखरस के देश में, इस्राएल निडर, वरन् याकूब का स्रोत सुरक्षित रहता है। और उसके ऊपर के आकाश से ओस गिरा करती है।

29हे इस्राएल, तू धन्य है। हे यहोवा से उद्धार पाई हुई प्रजा, तेरे तुल्य कौन है? वह तो तेरी सहायता के लिए ढाल, तथा तेरे प्रताप की तलवार है! अतः तेरे शत्रु तुझे सराहेंगे और तू उनके ऊँचे स्थानों को रौंदेगा।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)