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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 9 / 34

व्यवस्थाविवरण 9

1“हे इस्राएल, सुन! आज तू इसलिए यरदन पार करने वाला है कि तू वहां प्रवेश करके अपने से बड़ी तथा सामर्थी जातियों पर और उनके बड़े-बड़े नगरों पर अधिकार करे जिनकी शहरपनाह आकाश को स्पर्श करती है,

2ऐसी जाति जिसके लोग बड़े-बड़े और लम्बे-लम्बे अर्थात् अनाक-वंशी हैं जिनको तुम जानते हो तथा जिनके विषय में कहा जाता है कि अनाक-वंशियों के सामने कौन ठहर सकता है?

3अतः आज जान ले कि यह तेरा परमेश्वर यहोवा ही है जो भस्म करने वाली आग के समान तेरे आगे पार हो रहा है। वही उनको तेरे सामने से नष्ट करेगा तथा उनको तेरे अधीन कर देगा जिससे कि तू यहोवा के वचन के अनुसार उनको खदेड़ कर शीघ्र नष्ट कर दे।

4जब तेरा परमेश्वर यहोवा उनको तेरे सामने से खदेड़ चुके तब अपने मन में यह न कहना कि यहोवा ने मेरी धार्मिकता के कारण इस देश को अधिकार मेें करने के लिए मुझे यहां पहुंचाया है। परन्तु इन जातियों की दुष्टता के कारण ही यहोवा तेरे सामने से उन्हें निकाल बाहर कर रहा है।

5तू अपनी धार्मिकता अथवा अपने मन की खराई के कारण उनके देश पर अधिकार करने नहीं जा रहा है, परन्तु इन जातियों की दुष्टता के कारण ही तेरा परमेश्वर यहोवा उनको तेरे सामने से खदेड़ रहा है कि वह अपने उस वचन को पूरा करे जिसकी शपथ यहोवा ने तेरे पूर्वजों अर्थात् इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब से खाई थी।

6तू अब यह जान ले कि यह उत्तम देश जो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे अधिकार में करने के लिए दे रहा है, यह तेरी धार्मिकता के कारण नहीं है, क्योंकि तू तो एक हठीली जाति है।

7“याद रख, और मत भूल कि तूने किस प्रकार जंगल में अपने परमेश्वर यहोवा के क्रोध को भड़काया था। जिस दिन तुम मिस्र देश से निकले उसी दिन से लेकर यहां पहुंचने तक तुम यहोवा से विद्रोह करते आए हो।

8होरेब में भी तुमने यहोवा के क्रोध को भड़काया था, तथा यहोवा तुमसे इतना क्रोधित हुआ कि तुम्हें नष्ट कर ही डालता।

9जब मैं पत्थर की दोनों पटियाओं को अर्थात् उस वाचा की पटियाओं को जो यहोवा ने तुम्हारे साथ बांधी थी प्राप्त करने को पर्वत पर चढ़ गया, तब मैं चालीस दिन और चालीस रात पर्वत पर ही रहा, जहां मैंने न तो रोटी खाई न पानी पीया।

10तब यहोवा ने मुझे पत्थर की दोनों पटियाएं दीं जिन पर उसने अपनी ही उंगली से लिखा था। उन पर वे सब वचन थे जो यहोवा ने तुमसे सभा के दिन पर्वत पर अग्नि के मध्य से कहे थे।

11और चालीस दिन तथा चालीस रात के पश्चात् ऐसा हुआ कि यहोवा ने पत्थर की दोनों पटियाएं, अर्थात् वाचा की पटियाएं मुझे दी।

12तब यहोवा ने मुझसे कहा, ‘उठ, यहां से शीघ्र नीचे उतर जा, क्योंकि तेरे वे लोग जिनको तू मिस्र से निकाल लाया है, बिगड़ गए है। वे तो उस मार्ग से जिस पर चलने की आज्ञा मैंने उन्हें दी थी; शीघ्र ही भटक गए हैं; उन्होंने अपने लिए ढालकर मूर्ति बना ली है।

13यहोवा ने मुझसे यह भी कहा, ‘मैंने इस जाति को देख लिया है, और निःसंदेह, यह हठीली जाति है।

14अतः अब तू मुझे उन्हें नष्ट करने से मत रोक जिससे मैं उनके नाम पृथ्वी पर से मिटा डालू। फिर मैं तुझसे एक ऐसी जाति उत्पन्न करूंगा जो इनसे अधिक सामर्थी तथा महान होगी।’

15अतः मैं मुड़कर पर्वत पर से नीचे उतरा। उस समय तो पर्वत आग से धधक रहा था, तथा मेरे दोनों हाथों में वाचा की दोनों पटियाएं थी।

16मैंने देखा कि तुमने अपने परमेश्वर यहोवा के विरफ़द्ध सचमुच पाप किया था। तुमने अपने लिए ढालकर एक बछड़ा बना लिया था, तुम शीघ्र ही उस मार्ग से भटक गए थे जिस पर चलने की आज्ञा यहोवा ने तुम्हें दी थी।

17तब मैंने उन दोनों पटियाओं को लेकर अपने हाथों से पटक दिया, तथा तुम्हारी आंखों के सामने उन्हें चकनाचूर कर दिया।

18तुम्हारे उस महापाप के कारण जिसे करके तुमने यहोवा की दृष्टि में बुरा किया और उसे क्रोधित किया, मैं पहले के समान यहोवा के सामने मुंह के बल गिरकर चालीस दिन-चालीस रात पड़ा रहा और न तो मैंने रोटी खाई और न पानी पीया।

19मैं तो तुम्हारे प्रति यहोवा के क्रोध तथा जलजलाहट से भयभीत था कि कहीं वह अत्यधिक अप्रसन्न होकर तुम्हें नष्ट न कर डाले,परन्तु यहोवा ने उस समय भी मेरी सुन ली।

20यहोवा तो हारून से भी इतना क्रोधित था कि उसको नष्ट कर डालता। अतः उसी समय मैंने हारून के लिए भी प्रार्थना की।

21फिर मैंने तुम्हारे पाप को अर्थात् तुम्हारे बनाए हुए बछड़े को लेकर आग में जला दिया और चूर-चूर कर डाला और पीस-पीसकर चूर्ण के समान कर दिया; और मैंने उसके चूर्ण को उस नाले में फेंक दिया जो पर्वत पर से बहता था।

22“फिर तुमने तबेरा, मस्सा तथा किब्रोत-हत्तावा में भी यहोवा का क्रोध भड़काया था।

23जब यहोवा ने तुमको कादेश-बर्ने से यह कहकर भेजा कि जो देश मैंने तुम्हें दिया है उस पर आक्रमण करके उसे अधिकार में कर लो, तब भी तुमने अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा का उल्लंघन किया। तुमने न तो उस पर विश्वास किया और न उसकी सुनी।

24जिस दिन से मैंने तुम्हें जाना है तब से तुम यहोवा से विद्रोह ही करते आए हो।

25“यहोवा ने कहा था कि वह तुम्हें नष्ट कर देगा। अतः यहोवा के सामने मैं चालीस दिन और चालीस रात मुंह के बल पड़ा रहा।

26और मैंने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, ‘हे परमेश्वर यहोवा, तू अपनी प्रजा अर्थात् अपने उत्तराधिकार को नष्ट मत कर। जिसे तू ने अपनी महानता के द्वारा छुटकारा दिया तथा जिसको अपने सामर्थी हाथ के द्वारा मिस्र से निकाला है।

27अपने दास इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब को स्मरण कर; इस जाति के हठीलेपन, या इसकी दुष्टता या इसके पाप पर दृष्टि न कर।

28अन्यथा जिस देश से तू हमें निकाल लाया वहां के लोग यह कहेंगे, कि यहोवा उनको उस प्रतिज्ञा के देश में पहुंचाने में असमर्थ था, और कि वह उनसे घृणा करता था, और इसीलिए वह उन्हें जंगल में मार डालने के लिए निकाल ले आया।

29फिर भी वे तेरी प्रजा के लोग, हां, तेरा निज भाग हैं जिन्हें तू अपने बड़े सामर्थ्य तथा अपनी बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा निकाल लाया है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)