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पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 41 / 48

यहेजकेल 41

1तब वह मुझे पवित्रस्थान में ले गया, और बाजू के खम्भों को नापा जो दोनों ओर से छः-छः हाथ चौड़े थे।

2और प्रवेशद्वार की चौड़ाई दस हाथ थी तथा प्रवेशद्वार के बाजू हर ओर पांच-पांच हाथ थी। तब उसने पवित्रस्थान को नापा जिसकी लम्बाई चालीस हाथ और चौड़ाई बीस हाथ थी।

3तब उसने भीतर जाकर द्वार के दोनों ओर के खम्भों को नापा जो दो-दो हाथ के थे, और द्वार को जो छः हाथ ऊंचा और सात हाथ चौड़ा था।

4और उसने पवित्रस्थान के सामने के भाग को नापा जिसकी लम्बाई और चौड़ाई बीस-बीस हाथ थी, और उसने मुझसे कहा, “यह परमपवित्र स्थान है।”

5तब उसने भवन की दीवार को जो छः हाथ की थी, तथा तीन ओर से लगी भवन की कोठरियों की चौड़ाई को जो चार-चार हाथ की थी नापा।

6इन कोठरियों की तीन मंजिलें एक के ऊपर एक थीं और प्रत्येक मंजिल में तीस कोठरियां थी। किनारे वाली कोठरियों की भीतरी दीवारें चारों ओर बाहरी दीवार से जुड़ी हुई थी जिससे कि वे भवन की दीवार से न जुड़ी हो।

7बाजू की कोठरियां जो भवन को घेरे थीं क्रमशः प्रत्येक ऊपरी मंजिल में अधिक चौड़ी होती जाती थी। क्योंकि भवन के आसपास की बनावट भवन के चारों ओर ऐसी थी कि ऊपर की ओर चौड़ी होती जाती थी, इसलिए मन्दिर ऊपर की ओर चौड़ा होता गया। इस प्रकार निचली मंजिल से ऊपर जाने वाला दूसरी मंजिल से होकर ही जाता था।

8मैंने यह भी देखा कि भवन के चारों ओर चबूतरा था। बाजू की कोठरियों की नींव बांस भर अर्थात् छः बड़े हाथ ऊंची थी।

9बाजू वाली कोठरियों की बाहरी दीवार पांच हाथ मोटी थी, परन्तु खुला स्थान जो मन्दिर की बाजू की कोठरियों

10और बाहरी कोठरियों के बीच में था वह मन्दिर के चारों ओर बीस हाथ चौड़ा था।

11बाजू की कोठरियों के द्वार जो खुले स्थान की ओर थे, उनमें से एक द्वार उत्तर की ओर, और दूसरा दक्षिण की ओर था, तथा जो खुला स्थान रह गया था उसकी चौड़ाई चारों ओर पांच हाथ थी।

12और जो भवन पश्चिम की ओर आंगन के सामने था, वह सत्तर हाथ चौड़ा था। भवन की दीवार चारों ओर पांच हाथ मोटी थी और उसकी लम्बाई नब्बे हाथ थी।

13तब उसने मन्दिर को नापा जो सौ हाथ लम्बा था; और भवन की दीवारों सहित आंगन भी सौ हाथ लम्बा था।

14भवन का पूर्वी सामना आंगन सहित सौ हाथ चौड़ा था।

15फिर उसने मन्दिर के पिछले आंगन के सामने वाले भवन की लम्बाई को उसके गलियारों सहित नापा जो सौ हाथ थी तब उसने पवित्रस्थान और आंगन के ओसारों को भी नापा।

16देहलियों, झंझरीदार खिड़कियों और तीनों मंजिलों को घेरने वाले गलियारों पर जो देहलियों के सामने थे, भूमि से खिड़कियों तक, यघपि खिड़कियां बन्द थीं,

17प्रवेशद्वार के ऊपर भीतरी भवन तक, और बाहर तथा घेरने वाली दीवार के भीतर-बाहर, नाप के अनुसार तख़्ते जड़े थे।

18और उस पर करूब और खजूर के पेड़ खुदे थे, और दो-दो करूबों के मध्य एक-एक खजूर का पेड़ था और करूबों के दो-दो मुख थे

19जो सामने खजूर के वृक्षों की ओर थे। उनमें से एक मनुष्य का और दूसरा जवान सिंह का मुख था। पूरे भवन में चारों ओर ऐसी ही आकृतियां खुदी हुई थी।

20प्रवेश-द्वार की दीवारों पर नीचे से लेकर ऊपर तक तथा पवित्रस्थान की दीवारों पर करूब और खजूर के वृक्ष खुदे हुए थे।

21पवित्रस्थान के द्वार के खम्भे चौकोर थे और परम पवित्रस्थान के सामने के द्वार के खम्भे भी पहले जैसे थे।

22वेदी लकड़ी की बनी थी जो तीन हाथ ऊंची और दो हाथ लम्बी थी। उसके कोने, आधार और बाजू लकड़ी के थे। फिर उसने मुझसे कहा, “यह तो यहोवा के सामने की मेज है।”

23और पवित्रस्थान और परम पवित्रस्थान में दो पल्लो वाला एक-एक दरवाजा था

24और प्रत्येक दरवाजे में दो-दो पल्ले वरन् झूलने वाले दो-दो पल्ले थे अर्थात् दो पल्ले एक दरवाजे के लिए तथा दो पल्ले दूसरे दरवाजे के लिए।

25और पवित्रस्थान के दरवाजों पर भी करूब और खजूर के पेड़ खुदे हुए थे जैसे कि दीवार पर खुदे हुए थे। और बाहर ओसारे के सामने लकड़ी की देहली थी।

26और ओसारे के दोनों ओर झंझरीदार खिड़कियां तथा खजूर के पेड़ थे, और इसी प्रकार भवन के बाजू की कोठरियों में भी देहलियां थी।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)