पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 18 / 66
यशायाह 18
1हाय, पंखों की फड़फड़ाहट के देश! तू जो इथियोपिया की नदियों के पार है,
2तू जो समुद्र की सतह पर से नरकट की नावों द्वारा, हां, समुद्री मार्ग से राजदूतों को भेजता है! हे द्रुतगामी दूतो, उस जाति के पास जाओ जिसके लोग ऊंचे और सुन्दर हैं, जिनसे दूर और पास के लोग डरते हैं, जो एक सामर्थी और कठोर जाति के हैं, और जिनका देश नदियों से विभाजित है।
3हे जगत के सब रहने वालों और पृथ्वी के समस्त निवासियाें, जैसे ही ध्वजा पर्वतों पर फहराई जाएगी तुम उसे देखोगे और जैसे ही तुरही फूंकी जाएगी तुम उसे सुनोगे।
4क्योंकि यहोवा ने मुझ से यों कहाः “सूर्य की तेज धूप के समान, तथा कटनी की गर्मी में ओस-भरे बादल के सदृश, मैं अपने निवासस्थान से चुपचाप निहारूंगा।”
5क्योंकि फसल के पहले, जैसे ही कलियां खिल जाएं और अंगूर के गुच्छे पकने लगें, तब वह टहनियों को कतरनी से छांटेगा और फैली हुई शाखाओं को काटकर दूर फेंक देगा।
6पर्वतों के मांसाहारी पक्षियों और पृथ्वी के वन-पशुओं के लिए वे सबके सब छोड़ दिए जाएंगे; पक्षी तो ग्रीष्म-काल में उन्हें खाते रहेंगे और पृथ्वी के वन-पशु कटनी का समय उन्हीं पर बिताएंगे।
7उस समय उस जाति के लोग जो ऊंचे और सुन्दर हैं, जिनसे दूर और पास के लोग डरते हैं, जो एक सामर्थी और कठोर जाति के हैं, जिनका देश नदियों से विभाजित है-वे सेनाओं के यहोवा के नाम के स्थान पर अर्थात् सिय्योन पर्वत पर सम्मान की भेंट लाएंगे।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)