पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 28 / 42
अय्यूब 28
1“चांदी की खानि होती है, और सोने के ताए जाने का स्थान होता है।
2लोहा मिट्टी से निकाला जाता है, और तांबा पत्थर पिघला कर निकाला जाता है।
3मनुष्य अन्धेरे का अन्त कर देता है, वह अन्धकार वरन् घोर अन्धकार में से भी पत्थर खोज निकालता है।
4मनुष्य आबादी से दूर खानि खोदता है; जहां लोगों के पग भी नहीं पड़ते वे निर्जन स्थानों में लटकते और झूलते है।
5पृथ्वी, इससे तो भोजन आता है, परन्तु इसके भीतर आग भड़कती रहती है।
6इसकी चट्टानों में नीलमणि, और इसकी मिट्टी में सोना पाया जाता है।
7उस मार्ग को न तो कोई चील जानती, और न कभी बाज की दृष्टि उस पर पड़ी है।
8हिसंक पशुओं के पैर उस पर नहीं पड़े, न सिंह उस पर चला है।
9वह चकमक की चट्टान पर अपना हाथ लगाता; और पर्वतों को पूर्णतः पलट देता है।
10वह चट्टान में से नालियां काटता है; उसकी आंख प्रत्येक अनमोल वस्तु को देख लेती है।
11वह बहती हुई नदियों को भी रोक देता है। और जो गुप्त है उसे वह प्रकट कर देता है।
12“परन्तु बुद्धि कहां मिल सकती है? और समझ का स्थान कहां है?
13मनुष्य उसका मूल्य नहीं जानता, न वह जीवन लोक में मिलती है।
14अथाह सागर कहता है, यह मुझमें नहीं है,’ समुद्र कहता है, ‘यह मेरे पास नही।’
15चोखा सोना उसके बदले में नहीं दिया जा सकता, न चांदी तौलकर उसका मूल्य चुकाया जा सकता है।
16इसका मूल्य न ओपीर के कुन्दन से, और न अनमोल सुलैमानी पत्थर अथवा नीलम से आंका जा सकता है।
17सोना या कांच इसकी बराबरी नहीं कर सकते, न चोखे सोने की वस्तुओं के बदले में यह मिल सकती है।
18मूंगे और स्फटिक मणि की उसके आगे क्या चर्चा? बुद्धि की प्राप्ति मोतियों की प्राप्ति से भी बढ़कर है।
19इथियोपिया का पुखराज इसकी बराबरी नहीं कर सकता, न ही चोखे सोने से इसका मूल्य आंका जा सकता है।
20तो फिर बुद्धि कहां से आती है? और समझ का स्थान कहां है?
21इस प्रकार यह सब प्राणियों की आंखों से छिपी है, और आकाश के पक्षियों से गुप्त रखी गई है।
22विनाश और मृत्यु कहते हैं, ‘हमने अपने कानों से इसकी चर्चा सुनी है।’
23“परमेश्वर इसका मार्ग समझता है; और वह इसका स्थान जानता है।
24क्योंकि वह पृथ्वी के छोर तक दृष्टि करता, और आकाश के नीचे की प्रत्येक वस्तु को देखता है।
25जब उसने वायु के दबाव को ठहराया, और समुद्र को नपुए में नापा,
26जब उसने वर्षा के लिए सीमा ठहराई, और बिजली की चमक के लिए मार्ग निश्चित किया,
27तब उसने इसे देखा और यह घोषणा की, उसने इसे निश्चित किया, और इसे सिद्ध करके
28मनुष्य से कहा, ‘देख, प्रभु का भय मानना यही बुद्धि है; और बुराई से दूर रहना यही समझ है’।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)