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पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 41 / 42

अय्यूब 41

1“क्या तू लिब्यातान को बंसी के कांटे से खींचकर निकाल सकता है? अथवा डोर से उसकी जीभ को बांध सकता है?

2क्या तू उसकी नाक में नकेल लगा सकता है? या उसके जबड़े को कांटे से बेध सकता है?

3क्या वह तुझसे अनुनय-विनय करेगा? क्या वह तुझसे मधुर वचन बोलेगा?

4क्या वह तुझसे वाचा बांधेगा कि वह सदा तेरा दास रहे?

5क्या तू उससे ऐसे खेलेगा जैसे किसी पक्षी से? क्या तू उसे अपनी कुमारियों के लिए बांध रखेगा?

6क्या व्यापारी उसका मोल-भाव करेंगे? क्या वे उसे सौदागरों के बीच बांट देंगे?

7क्या तू उसकी खाल को भाले से, अथवा उसके सिर को बर्छी से बेध सकता है?

8तू इस पर केवल अपना हाथ रख, तो लड़ाई को न भूलेगा, और फिर ऐसा कभी नहीं करेगा।

9देख, उसे पकड़ने की आशा व्यर्थ है; क्या उस पर दृष्टि पड़ते ही मन कच्चा नहीं हो जाता?

10कोई इतना साहसी नहीं कि उसे छेड़े। फिर वह कौन है जो मेरा सामना कर सके?

11किसने मुझे दिया है कि मैं उसे लौटाऊं? सम्पूर्ण आकाश के नीचे जो कुछ है वह मेरा है।

12“न तो मैं उसके अंगों के विषय में चुप रहूंगा, न उसके बड़े बल और सुन्दर बनावट के विषय में

13कौन उसके बा“य कवच को उतार सकता है? कौन उसके दोहरे बख्तर को बेध सकता है?

14कौन उसके मुख के द्वार खोल सकता है? उसके दांतों के चारों ओर भय विघमान है।

15उसकी ढालों की पंक्तियों पर उसे गर्व है, वे ऐसे सटा कर जमाई गई हैं मानो मुहरबन्द हो।

16वे एक दूसरे से इतनी सटी हुई हैं कि उनके बीच हवा भी प्रवेश नहीं कर सकती।

17वे एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, वे एक दूसरे से जकड़ी हुई हैं और अलग नहीं की जा सकती।

18उसकी छींकों से बिजली चमक उठती है, उसकी आंखें भोर की पलकों के समान है।

19उसके मुंह से जलते पलीते निकलते, तथा अग्नि की चिंगारियां उड़ती है।

20उसके नथुनों से ऐसे धुआं निकलता है, जैसे खौलती हांडी तथा जलते नरकटों से।

21उसका श्वास कोयलों को दहका देता, तथा उसके मुंह से लौ निकलती है।

22उसकी गर्दन में सामर्थ्य बसता, तथा आंतक उसके आगे-आगे चलता है।

23उसके मांस की तहें, उस पर दृढ़ और अटल होकर जुड़ी हुई है।

24उसका दिल पत्थर के सामन कड़ा, वरन् चक्की के निचले पाट के समान दृढ़ है।

25जब वह उठ खड़ा होता है तब सामर्थी भी भयभीत हो उठते, उसकी हलचल से वे घबरा जाते है।

26जो तलवार उस पर चलती है उसका कोई प्रभाव नहीं होता है, और न भाले, तीर या बर्छी का।

27वह लोहे को तिनके के समान, और कांसे को सड़ी लकड़ी के समान समझता है।

28तीर उसको भगा नहीं सकता, गोफन के पत्थर उसके लिए भूसा ठहरते है।

29लाठियां भी भूसे के समान गिनी जातीं, वह बर्छी की खड़खड़ाहट पर हंसता है।

30उसके निचले अंग पैने ठीकरों के समान हैं, वह कीच पर दांवनी के पाटे के समान चलता है।

31वह गहरे सागर को हांडी के समान खौलाता है; वह समुद्र को मरहम के पात्र के समान बना देता है।

32वह जल में अपने पीछे चमकीली लीक बनाता जाता है मानो सागर के बाल पक गए हो।

33उसके समान निडर जीव, धरती पर कोई भी नही।

34वह प्रत्येक ऊंची वस्तु को नीचा देखता है, सब गर्व रखने वालों पर वह राजा है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)