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पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 7 / 42

अय्यूब 7

1“क्या मनुष्य को पृथ्वी पर श्रम नही करना पड़ता? क्या उसके दिन मजदूर के से नहीं होते?

2जैसे कोई दास छाया की अभिलाषा करे, और कोई मज़दूर उत्सुकता से अपनी मजदूरी की प्रतीक्षा करे।

3वैसे ही मुझे व्यर्थ प्रतीक्षा के महीने दिए गए हैं, और मेरे लिए दुख भरी रातें नियुक्त की गई है।

4जब मैं लेटता हूं तो कहता हूं, ‘मैं कब उठूंगा?’ परन्तु रात लम्बी होती जाती है, और मैं भोर तक करवटें बदलता रहता हू।

5मेरी देह कीड़ों तथा मिट्टी की परत से ढकी हुई है, मेरी चमड़ी कड़ी होकर रिसने लगी है।

6मेरे दिन जुलाहे की ढरकी से भी तीव्र हैं, और वे आशारहित व्यतीत हो जाते है।

7“स्मरण कर कि मेरा जीवन श्वासमात्र है, मेरी आंख भलाई को फिर न देखेगी।

8जो मुझे देखता है उसकी आंख मुझे फिर न देखेगी; तेरी आंखें तो मेरी ओर होंगी, पर मैं नहीं होऊंगा।

9जैसे बादल लुप्त होकर रहता ही नहीं, वैसे ही जो अधोलोक में उतर जाता है वह फिर ऊपर नहीं आता।

10वह फिर अपने घर को नहीं लौटेगा, न उसका स्थान उसे कभी पहचानेगा।

11“इसलिए मैं अपना मुंह बन्द न रखूंगा, मैं अपनी आत्मा की व्यथा में बोलूंगा मैं अपने प्राण की कड़ुवाहट में दुखड़ा रोता रहूंगा।

12क्या मैं समुद्र हूं, या मगरमच्छ हूं, कि तू मुझ पर पहरा बिठाता है?

13जब-जब मैं कहता हूं, ‘मेरा बिस्तर मुझे विश्राम देगा, मेरा बिछौना मेरे दुख को हलका करेगा,’

14तब-तब तू मुझको स्वप्नों से आंतकित करता और दर्शनों से मुझे भयभीत करता है,

15जिससे मेरा प्राण फांसी को, और इन हडिóयों से अधिक मृत्यु को पसन्द करता है।

16मैं घुला जाता हूं, मैं सदा जीता न रहूंगा, मुझे छोड़ दे क्योंकि मेरे दिन श्वास मात्र है।

17“मनुष्य क्या है कि तू उसे महत्त्व दे, और उस पर अपना मन लगाए,

18और प्रति भोर उसकी सुधि ले और प्रति पल उसको जांचता रहे?

19तू कब तक अपनी टकटकी मुझ पर लगाए रखेगा, और इतनी देर के लिए भी न छोड़ेगा कि मैं थूक निगल सकूं?

20हे मनुष्यों के पहरेदार क्या मैंने पाप किया है? मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है, तूने मुझे अपना निशाना क्यों बना लिया है जिससे मैं स्वयं अपने लिए बोझ बन गया हूं?

21तू क्यों मेरा अपराध क्षमा नहीं करता और मेरे अधर्म दूर नहीं करता? अब तो मैं मिट्टी में मिल जाऊंगा; तू मुझे खोजेगा, पर मैं रहूंगा ही नही।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)