पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 9 / 42
अय्यूब 9
1तब अय्यूब ने कहा,
2“मैं निश्चय जानता हूं कि यह सच है; परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य कैसे धर्मी ठहर सकता है?
3यदि कोई उससे विवाद करना चाहे तो हजारों में से उसकी एक बात का भी उत्तर न दे सकेगा।
4हृदय में बुद्धिमान तथा बल में शक्तिशाली, उसके विरोध में हठ करके कौन बच सका?
5वह पर्वतों को अन्यत्र हटा देता है, और लोगों को पता भी नहीं कि यह कैसे हुआ; वह उन्हें अपने क्रोध में पलट देता है;
6वह पृथ्वी को हिलाकर उसके स्थान से अलग कर देता है, और उसके खम्भे कांपने लगते हैं;
7उसके आदेश से सूर्य भी प्रकाश नहीं देता, तारों पर वह मुहर लगाता है
8वह आकाश को अकेले ही तानता, और समुद्र की लहरों को कुचल डालता है;
9वह सप्तर्षि, मृगशिरा और कचपचिया, तथा दक्षिण के नक्षत्रें को बनाता है;
10वह समझ से परे अद्भुत कार्य, और अनगिनत आश्चर्यकर्म करता है।
11यदि वह मेरे पास से होकर चले तो मैं उसे देख तक नहीं सकूंगा; और वह मेरे पास होकर आगे बढ़ जाए तो मुझे पता भी नहीं होगा।
12यदि वह छीनना चाहे, कौन उसे रोक सकेगा? कौन उससे पूछ सकेगा कि तू यह क्या करता है?
13“परमेश्वर अपना क्रोध ठंडा नहीं करता, राहाब के सहायक उसके सामने झुक जाते है।
14तो मैं उसको कैसे उत्तर दे सकता हूं, और किन-किन शब्दों में उससे विवाद कर सकता हूं?
15चाहे मैं निर्दोष भी होता, फिर भी मैं उसे उत्तर नहीं दे पाता; मुझे अपने न्यायी से दया की ही भीख मांगनी पड़ती।
16यदि मैं पुकारता और वह मुझे उत्तर भी देता, फिर भी मैं विश्वास नहीं करता कि वह मेरी सुनता है।
17क्योंकि वह अांधी से मुझे तोड़ डालता है, और अकारण मेरी चोट पर चोट करता है।
18वह मुझे श्वास भी लेने नहीं देता, वरन् मुझे कड़ुवाहट से भर देता है।
19यदि सामर्थ्य की बात हो, तो देखो, वही सामर्थी है। और यदि न्याय की बात हो तो उससे कौन मुकद्दमा लड़ेगा?
20यघपि मैं धर्मी क्यों न होऊं, फिर भी अपने ही मुंह से दोषी ठहरूंगा? मेरे निर्दोष होने पर भी वह मुझे दोषी ठहराएगा।
21“मैं निर्दोष तो हूं, पर अपने आपको कुछ नहीं समझता; मैं अपने जीवन को तुच्छ जानता हू।
22बात तो एक ही है, इसलिए मैं यह कहता हूं, ‘वह खरे और कुटिल दोनों का सर्वनाश करता है।’
23जब लोग विपत्ति से अचानक मरने लगते हैं तो वह निर्दोष के दुख पर हँसता है।
24पृथ्वी दुष्ट के हाथ सौंप दी गई है, वह इसके न्यायियों की आंखें ढक देता है। इसका करने वाला वही नहीं, तो और कौन है?
25“मेरे दिन हरकारों में भी अधिक तेज भागते जाते हैं, वे उड़े चले जाते हैं, वे कुछ भी भलाई देखने नहीं पाते।
26वे सरकंडे की डोंगियों के समान सरक जाते हैं, या शिकार पर झपटते हुए उकाब के समान।
27यदि मैं कहता कि, मैं अपनी शिकायत भूल जाऊंगा, मैं अपना उदास चेहरा उतार कर प्रफुल्लित हो जाऊंगा,
28फिर भी मैं अपनी सब पीड़ाओं से डरता और मैं जानता हूँ कि तू मुझे निर्दोष नहीं ठहराएगा।
29मैं तो दुष्ट गिना गया हूं, तो फिर मैं क्यों व्यर्थ परिश्रम करूं?
30चाहे मैं हिम के जल से स्नान करता और अपने हाथ सज्जीदार पानी से सापफ़ करता,
31फिर भी तू मुझे गड्ढे में ही डालता, और मेरे अपने ही वस्त्र मुझसे घृणा करते।
32क्योंकि वह तो मेरे समान मनुष्य नहीं, जिसके साथ मैं वाद-विवाद कर सकूं और हम दोनों का न्याय हो सके।
33हमारे बीच कोई निर्णायक नहीं, जो हम दोनों पर अपना हाथ रख सके।
34वह अपनी छड़ी मुझ पर से हटा ले, और उसका भय मुझे आतंकित न करे।
35तब मैं उससे कुछ कहने में नहीं डरता, परन्तु मैं उस स्थिति में नहीं हू।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)