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नया नियम · यूहन्ना · अध्याय 12 / 21

यूहन्ना 12

1फिर फसह के छः दिन पहले यीशु बैतनिय्याह में आया जहाँ लाज़र था, जिसे यीशु ने मृतकों में से पुनर्जीवित किया था।

2इसलिए उन्होंने वहाँ उसके लिए भोजन तैयार किया, और मार्था सेवा कर रही थी। उसके साथ जो भोजन के लिए बैठे थे, उनमें से लाज़र एक था।

3तब मरियम ने जटामासी का आधा किलो बहुमूल्य और असली इत्र लेकर यीशु के पैरों पर मला और अपने बालों से उसके पैर पोंछे; और इत्र की सुगन्ध से घर सुगन्धित हो उठा।

4परन्तु उसके चेलों में से यहूदा इस्करियोती ने, जो उसे धोखे से पकड़वाना चाहता था, कहा,

5“इस इत्र को तीन सौ दीनार में बेचकर कंगालों को क्यों नहीं दे दिया गया?”

6उसने यह इसलिए नहीं कहा कि उसे कंगालों की चिन्ता थी, परन्तु इसलिए कि वह चोर था, और उसके पास रुपयों की थैली रहती थी, और जो कुछ उसमें डाला जाता था वह उसे चुरा लिया करता था।

7इसलिए यीशु ने कहा, “उसे छोड़ दो कि वह इसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिए कर सके।

8क्योंकि कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदा न रहूँगा।”

9जब यहूदियों की बड़ी भीड़ ने जाना कि यीशु वहाँ है, तो वे यीशु के कारण ही नहीं, परन्तु इसलिए भी आए कि लाज़र को देखें जिसे उसने मृतकों में से जिलाया था।

10परन्तु मुख्य याजकों ने लाज़र को भी मार डालने की योजना बनाई,

11क्योंकि उसके कारण बहुत-से यहूदी अलग होकर यीशु पर विश्वास करने लगे थे।

12दूसरे दिन पर्व में आई हुई बड़ी भीड़ ने जब यह सुना कि यीशु यरूशलेम आ रहा है,

13तब लोग खजूर की डालियां लेकर उससे भेंट करने निकले और पुकारने लगे, “होशन्ना! धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है, अर्थात् इस्राएल का राजा।”

14और गधे का एक बच्चा पाकर यीशु उसपर बैठ गया, जैसा लिखा है,

15“हे सिय्योन की बेटी मत डर! देख, तेरा राजा गधे के बच्चे पर बैठा हुआ चला आता है।”

16उसके चेले पहले तो ये बातें न समझे, परन्तु यीशु के महिमान्वित होने के पश्चात् उन्हें स्मरण हुआ कि ये बातें उसके विजय में लिखी गई थीं और लोगों ने उसके साथ ऐसा ही किया था।

17लाज़र को कब्र से बाहर बुलाने और मृतकों में से पुनर्जीवित करने के समय जो भीड़ यीशु के साथ थी, वह उसकी साक्षी दे रही थी।

18इस कारण भीड़ उससे भेंट करने को निकल आई क्योंकि लोगों ने सुना कि उसने यह चिह्न दिखाया था।

19इसलिए फरीसियों ने एक दूसरे से कहा, “सोचो तो सही कि तुमसे कुछ नहीं बन पड़ता। देखो, संसार उसके पीछे चल पड़ा है।”

20जो लोग पर्व में आराधना करने जा रहे थे, उनमें कुछ यूनानी थे।

21ये लोग फिलिप्पुस जो गलील के बैतसैदा का था, के पास आकर उससे पूछने लगे, “महोदय, हम यीशु से भेंट करना चाहते है।”

22फिलिप्पुस ने अन्द्रियास से कहा, तब अन्द्रियास और फिलिप्पुस ने जाकर यीशु को बताया।

23और यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, “समय आ पहुंचा है कि मनुष्य का पुत्र महिमान्वित हो।

24मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि जब तक गेहूं का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है; परन्तु यदि मर जाता है तो बहुत फल लाता है।

25जो अपने प्राण को प्रिय जानता है वह उसे खो देता है और जो अपने प्राण को इस जगत में अप्रिय जानता है वह उसे अनन्त जीवन तक बचाए रखेगा।

26यदि कोई मेरी सेवा करना चाहे तो वह मेरा अनुकरण कर; और जहाँ मैं हूँ वहां मेरा सेवक भी होगा। यदि कोई मेरी सेवा करे तो पिता उसका सम्मान करेगा।

27“अब मेरा प्राण व्याकुल हो उठा है। क्या मैं यह कहूँ, ‘हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा?’ परन्तु मैं इसी अभिप्राय से इस घड़ी तक पहुंचा हूँ।

28हे पिता, अपने नाम की महिमा कर।” तब यह आकाशवाणी हुई, “मैंने अपने नाम की महिमा की है, और फिर करूंगा।”

29तब भीड़ के लोग जो वहाँ खड़े सुन रहे थे कहने लगे कि बादल गरजा है। औरों ने कहा, “स्वर्गदूत ने उससे बातें की है।”

30यीशु ने उत्तर देते हुए कहा, “यह वाणी मेरे लिए नहीं परन्तु तुम्हारे लिए हुई है।

31अब इस संसार का न्याय हो रहा है, अब इस संसार का शासक निकाल दिया जाएगा।

32और मैं, यदि मैं पृथ्वी पर से ऊंचे पर चढ़ाया जाऊंगा, तो सब लोगों को अपने पास खींचूँगा,

33परन्तु ऐसा कहकर वह प्रकट कर रहा था कि वह कैसी मृत्यु से मरेगा।

34इसलिए भीड़ ने उसे उत्तर दिया, “हमने व्यवस्था में सुना है कि मसीह सर्वदा बना रहेगा, फिर तू कैसे कह सकता है, ‘मनुष्य के पुत्र को ऊँचे पर चढ़ाया जाना आवश्यक है?’ यह मनुष्य का पुत्र कौन है?”

35इसलिए यीशु ने उनसे कहा, “ज्योति तुम्हारे मध्य, और थोड़ी देर के लिए है। जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है, तब तक चलते चलो जिससे कि अंधकार तुम्हें न आ घेरे। जो अंधकार में चलता है वह नहीं जानता कि वह किधर जा रहा है।

36जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है, ज्योति पर विश्वास करो, जिससे कि तुम ज्योति की सन्तान बन सको।” इन बातों को कहकर यीशु वहाँ से चला गया और उनसे छिपा रहा।

37यघपि उसने उनके सामने बहुत-से चिह्न दिखाए थे, फिर भी वे उसपर विश्वास नहीं कर रहे थे,

38जिससे कि यशायाह नबी का वह वचन पूरा हो जो उसने कहाः प्रभु, किसने हमारे समाचार पर विश्वास किया है? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रकट हुआ है?

39इस कारण वे विश्वास नहीं कर सके, क्योंकि यशायाह ने फिर यह कहा,

40“उसने उनकी आँखें अंधी कर दी हैं, और उसने उनका हृदय कठोर कर दिया, कहीं ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें और हृदय से समझें और मन फिराएं, और मैं उन्हें चंगा करू।”

41यशायाह ने ये बातें इसलिए कहीं क्योंकि उसने उसकी महिमा देखी, और उसने उसके विजय में कहा।

42फिर भी अधिकारियों में से बहुतों ने उसपर विश्वास किया, परन्तु फरीसियों के कारण वे उसका अंगीकार नहीं कर रहे थे, कहीं ऐसा न हो कि वे आराधनालयों से निकाल दिए जाएं;

43क्योंकि उनको तो परमेश्वर की ओर से मिलने वाली प्रशंसा की अपेक्षा मनुष्यों की ओर से मिलने वाली प्रशंसा अधिक प्रिय लगती थी।

44फिर यीशु ने पुकारकर कहा, “जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मुझपर नहीं वरन् मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है।

45और जो मुझे देखता है, वह उसको देखता है जिसने मुझे भेजा है

46मैं ज्योति हूँ और जगत में आया हूँ कि जो कोई मुझपर विश्वास करता है वह अन्धकार में न रहे।

47यदि कोई मेरी बातें सुनकर उनका पालन न करे तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने नहीं, वरन् जगत का उद्धार करने आया हूँ।

48जो मेरा तिरस्कार करता है, और मेरे वचन को ग्रहण नहीं करता, उसको दोषी ठहराने वाला तो एक हैः मैंने जो वचन कहा है, वही अन्तिम दिनों में उसे दोषी ठहराएगा।

49मैंने अपने आप कुछ नहीं कहा, परन्तु पिता जिसने मुझे भेजा है उसी ने आज्ञा दी है कि मुझे क्या कहना और क्या बोलना है।

50और मैं जानता हूँ कि उसकी आज्ञा अनन्त जीवन है। इसलिए मैं जो कुछ बोलता हूँ, ठीक वैसे ही बोलता हूँ जैसा पिता ने मुझसे कहा है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)