नया नियम · लूका · अध्याय 14 / 24
लूका 14
1फिर ऐसा हुआ कि सब्त के दिन, जब वह फरीसियों के किसी अधिकारी के घर रोटी खाने गया तो वे उसकी घात में लगे थे।
2वहीं उसके सामने एक मनुष्य था जो जलन्धर रोग से पीड़ित था।
3यीशु ने व्यवस्थाविदों और फरीसियों से कहा, “सब्त के दिन चंगाई करना उचित है या नहीं?”
4पर वे चुपचाप रहे। उसने उसे हाथ से पकड़कर चंगा किया और जाने दिया।
5उसने कहा, “तुम्हारा बेटा या बैल कुएं में गिर जाए तो तुममें से ऐसा कौन है कि वह उसे सब्त के दिन ही तुरन्त बाहर निकाल न ले?”
6वे इस प्रशन का कोई उत्तर न दे सके।
7जब उसने देखा कि अतिथिगण किस प्रकार अपने लिए सम्मानित स्थान चुन रहे हैं तो वह उनसे एक दृष्टान्त कहने लगाः
8“जब कोई तुझे विवाह के भोज में बुलाए तो सम्मानित स्थान पर न बैठना, कहीं ऐसा न हो कि उसने तुझसे अधिक सम्मानित व्यक्ति को आमन्त्रित किया हो,
9और वह जिसने तुम दोनों को आमन्त्रित किया, आकर तुझसे कहे, ‘उसे बैठने दे,’ तब अपमानित होकर तुझे अन्तिम स्थान पर बैठना पड़े।
10पर जब तू आमन्त्रित किया जाए तो जाकर नीचे स्थान पर बैठना जिससे वह जिसने तुझे आमन्त्रित किया आकर तुझसे कहे, ‘मित्र, आगे बढ़कर बैठ।’ तब उन सबकी दृष्टि में जो तेरे साथ बैठे हों, तू सम्मानित होगा।
11क्योंकि प्रत्येक जो अपने आप को ऊंचा करता है, वह नीचा किया जाएगा; और वह जो अपने आप को दीन करेगा सम्मानित किया जाएगा।”
12तब उसने उससे जिसने उसे आमन्त्रित किया था, यह भी कहा, “जब तू किसी को दिन या रात का भोज दे तो अपने मित्रों, भाइयों, सम्बन्धियों अथवा धनी पड़ोसियों को न बुलाना, कहीं ऐसा न हो कि वे भी तुझे बदले में बुलाएं और तुझे बदला मिल जाए।
13परन्तु जब तू भोज करे तो कंगालों, विकलांगों, लंगड़ों और अंधों को आमन्त्रित करना।
14तब तू आशिशित होगा, क्योंकि उनके पास कोई ऐसा साधन नहीं कि वे तुझे बदला दें, परन्तु धर्मियों के जी उठने पर तुझे प्रतिफल मिलेगा।”
15तब उसके साथ भोजन करने वालों में से एक ने यह सुनकर उससे कहा, “धन्य है वह जो परमेश्वर के राज्य में रोटी खाएगा!”
16परन्तु उसने उससे कहा, “किसी व्यक्ति ने एक बड़ा भोज किया और उसने बहुत लोगों को आमन्त्रित किया।
17भोज तैयार होने पर उसने अपने दास को आमन्त्रित लोगों से यह कहने भेजाः ‘आओ सब कुछ तैयार हो गया है।’
18परन्तु वे सब-के-सब क्षमा मांगने लगे। पहले ने उससे कहा, ‘मैंने एक खेत मोल लिया है, अतः जाकर उसे देखना आवश्यक है; कृपा करके मुझे क्षमा कर दे।’
19दूसरे ने कहा, ‘मैंने पांच जोड़ी बैल मोल लिए हैं, मुझे उनको परखने जाना है; कृपा करके मुझे क्षमा कर दे।’
20फिर एक और ने कहा, ‘मैंने ब्याह किया है, अतः मैं नहीं जा सकता।’
21दास ने आकर अपने स्वामी को ये बातें बताई। तब गृह-स्वामी ने क्रुद्ध होकर दास से कहा, ‘शहर के गली-कूचों में जाकर शीघ्र कंगालों, विकलागों, अंधों और लंगड़ों को यहाँ ले आ।’
22दास ने फिर कहा, ‘स्वामी, तेरी आज्ञा के अनुसार किया गया, पर अभी भी स्थान बचा है।’
23तब स्वामी ने कहा, ‘राजमार्गोर्ं और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को आने के लिए विवश कर कि मेरा घर भर जाए।
24क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जो आमन्त्रित किए गए थे, उनमें से कोई भी मेरे भोज को नहीं चखने पाएगा’।”
25जब भीड़ की भीड़ उसके साथ जा रही थी, उसने मुड़कर लोगों से कहा,
26“यदि कोई मेरे पास आए और अपने पिता, माता, पत्नी, बच्चों, तथा भाई-बहनों को, यहां तक कि अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।
27जो कोई अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे नहीं चलता, वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।
28क्योंकि तुममें से कौन ऐसा है जो गढ़ बनाना चाहता हो परन्तु पहले बैठकर हिसाब न लगा ले कि उसके पास पूरा करने के लिए पर्याप्त है या नहीं?
29अन्यथा जब वह नींव डाल ले और उसे पूरा न कर सके तो वे जो उसे देख रहे हों उसे ठट्ठों में उड़ाने लगेंगे,
30और कहेंगे, ‘उस मनुष्य ने बनाना तो आरम्भ किया, परन्तु पूरा न कर सका।’
31अथवा कौन ऐसा राजा होगा जो दूसरे राजा से युद्ध करने जा रहा हो पर पहले बैठकर परामर्श न कर ले कि बीस हज़ार सैनिकों को लेकर जो राजा उस पर आक्रमण करने आ रहा है, उसका सामना वह दस हज़ार सैनिकों से कर सकता है या नहीं?
32अन्यथा उसके दूर रहते ही वह दूतों को भेजकर संधि की शर्तों के विषय में पूछेगा।
33इसी प्रकार तुममें से कोई मेरा चेला नहीं हो सकता जब तक कि वह अपनी सारी सम्पत्ति को त्याग न दे।
34नमक तो अच्छा है, परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए तो वह किस वस्तु से स्वादिष्ट किया जाएगा?
35न तो वह भूमि के और न ही खाद के काम में आता है, वरन् लोग उसे बाहर फेंक देते है। जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)