नया नियम · मत्ती · अध्याय 14 / 28
मत्ती 14
1उस समय देश के चौथाई भाग के राजा हेरोदेस ने यीशु की चर्चा सुनी,
2और अपने सेवकों से कहा, “यह तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला है। यह मृतकों में से जी उठा है, इसीलिए ये शक्तियां इसमें कार्य कर रही है।”
3क्योंकि हेरोदेस ने यूहन्ना को पकड़वा और बँधवाकर अपने भाई की पत्नी, हेरोदियास, के कारण उसे जेल में डलवा दिया था।
4क्योंकि यूहन्ना उससे कहा करता था, ‘उसे रखना तेरे लिए न्यायोचित नही।’,
5और यघपि वह उसे मरवा डालना चाहता था, फिर भी लोगों से डरता था, क्योंकि वे उसे नबी मानते थे।
6परन्तु जब हेरोदेस का जन्मदिन आया तो हेरोदियास की पुत्री ने उत्सव में नृत्य करके हेरोदेस को प्रसन्न कर दिया।
7इसपर शपथ खाकर उसने वचन दिया कि जो कुछ वह मांगे, वह देगा।
8और मां के द्वारा उकसाए जाने पर उसने कहा, “एक थाल में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर मुझे यहीं दे।”
9यघपि वह शोकित हुआ, फिर भी अपनी शपथ तथा भोज में बैठे अतिथियों के कारण, राजा ने आदेश दिया कि यह दे दिया जाए।
10उसने किसी को भेजकर जेल में यूहन्ना का सिर कटवा दिया।
11और उसका सिर एक थाल में लाया गया और लड़की को दे दिया गया जिसे वह अपनी मां के पास ले गई।
12फिर यूहन्ना के चेले आकर शव को ले गए और उन्होंने उसे दप़फ़ना दिया। तब उन्होंने जाकर यीशु को समाचार दिया।
13जब यीशु ने यह सुना, तो वह वहां से नाव पर चढ़कर अकेले किसी निर्जन स्थान को चला गया। यह सुनकर भीड़ के लोग नगरों से पैदल उसके पीछे चल दिये।
14जब वह नाव पर से उतरा तो उसने एक विशाल जनसमूह को देखा और लोगों पर तरस खाया और उनके बीमारों को चंगा किया।
15जब सन्ध्या हुई तो चेले उसके पास आकर कहने लगे, “यह स्थान सुनसान है और दिन ढल चुका है; इसलिए भीड़ को विदा कर कि लोग गांव में जाकर अपने लिए भेाजन मोल ले।”
16पर यीशु ने उनसे कहा, “उनको जाने की आवश्यकता नहीं: तुम्हीें उन्हें खाने को दो।”
17उन्होंने उससे कहा, “हमारे पास यहां केवल पांच रोटियां और दो मछलियां है।”
18उसने कहा, “उन्हें यहां मेरे पास ले आओ।”
19तब लोगों को घास पर बैठाकर उसने पांच रोटियों और दो मछलियों को लिया और स्वर्ग की ओर देखकर आशिज मांगी और रेाटियां तोड़-तोड़कर चेलों को दीं और चेलों ने लोगों को।
20सब खाकर तृप्त हुए। तब उन्होंगे बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई बारह टोकरियां उठाईं।
21खाने वालों में से, स्त्रियों और बच्चों को छोड़, पुरुषों की संख्या लगभग पांच हजार थी।
22तब उसने शीघ्र ही अपने चेलों को नाव पर चढ़ने के लिए विवश किया कि वे उससे पहले उस पार जाएं, जबकि वह स्वयं भीड़ को विदा करने लगा।
23भीड़ को विदा करने के पश्चात् वह पर्वत पर अकेले प्रार्थना करने के लिए चला गया। जब संध्या हुई तो वह वहां अकेला था।
24परन्तु नाव किनारे से कुछ किलोमीटर दूर लहरों में डगमगा रही थी, क्योंकि हवा विपरीत थी।
25सुबह के लगभग तीन बजे झील पर चलते हुए वह उनके पास आया।
26जब चेलों ने उसे झील पर चलते हुए देखा तो घबराकर कहने लगे, “यह तो कोई भूत है!” और डर के मारे चिल्ला उठे।
27परन्तु यीशु ने तुरन्त उनसे बातें कीं और कहा, “साहस रखो! मैं हूं। डरो मत!”
28तब पतरस ने उससे कहा, “प्रभु, यदि तू ही है तो मुझे पानी पर चलकर अपने पास आने की आज्ञा दे।”
29उसने कहा, “चला आ!” और पतरस नाव से उतरकर पानी पर चलता हुआ यीशु की ओर बढ़ा।
30परन्तु हवा को देखकर वह डर गया और डूबने लगा तो चिल्लाया, “प्रभु, मुझे बचा!”
31यीशु ने तुरन्त अपना हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया और उससे कहा, “हे अल्पविश्वासी, तूने क्यों सन्देह किया?”
32और जब वे नाव पर चढ़ गए तो हवा थम गई।
33और जो लोग नाव में थे, उन्होंने उसे दण्डवत् किया और कहा, “तू निश्चय ही परमेश्वर का पुत्र है!”
34वे पार होकर गन्नेसरत पहुंचे,
35और वहां केे लोगों ने जब उसे पहचाना तो उन्होंने आसपास के क्षेत्रों में समाचार भेजा, और लोग बीमारों को उसके पास लाए।
36वे उससे विनती करने लगे कि वह उन्हें अपने वस्त्र केे छोर को ही छू लेने दे और जितनों ने छुआ, वे चंगे हो गए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)