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नया नियम · मत्ती · अध्याय 23 / 28

मत्ती 23

1तब यीशु ने भीड़ से और अपने चेलों से कहा,

2“शास्त्री और फरीसी स्वयं मूसा की गद्दी पर बैठ गए है।

3इसलिए जो कुछ वे तुमसे कहें उसे करना और मानना, परन्तु उनके जैसे कार्य मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं, पर करते नही।

4वे भारी बोझों को बांधकर मनुष्यों के कांधों पर तो लाद देते हैं, परन्तु स्वयं उन्हें अपनी उंगली से भी छूना नहीं चाहते।

5वे अपने सब काम मनुष्यों को दिखाने के लिए करते है। वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते, और अपने वस्त्रों की झालरें लम्बी करते है।

6और भोजों में सम्मानित स्थान तथा आराधनालयों में मुख्य आसन,

7और बाज़ारों में आदर-सत्कार पाना तथा लोगों से ‘रब्बी’ कहलाना उन्हें प्रिय लगता है।

8परन्तु तुम ‘रब्बी’ न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही गुरु है और तुम सब भाई हो।

9पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है जो स्वर्ग में है।

10तुम अगुवे न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही अगुवा है, अर्थात् मसीह।

11परन्तु जो तुममें सबसे बड़ा है वह तुम्हारा सेवक होगा।

12जो कोई अपनेआप को बड़ा बनाएगा वह नीचा किया जाएगा, और जो स्वयं को नीचा बनाएगा वह बड़ा किया जाएगा।

13“हे पाखण्डी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! क्योंकि तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द कर देते हो। तुम न तो स्वयं प्रवेश करते हो और न ही प्रवेश करने वालों को भीतर जाने देते हो।

14हे पाखण्डी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! क्योंकि दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते हुए भी तुम विधवाओं के घरों को निगल जाते हो, इसलिए तुम्हें भारी दण्ड मिलेगा।ह्

15“हे पाखण्डी शास्त्रियों और फरीसियों, तुमपर हाय! तुम एक मनुष्य को अपने मत में लाने के लिए जल-थल में फिरते हो, और जब वह आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

16“हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो, ‘यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए, तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की शपथ खाए तो वह बँध जाएगा।”

17हे मूर्खो और अंधो, क्या महत्वपूर्ण है, सोना या वह मन्दिर जो सोने को पवित्र करता है?

18फिर कहते हो, ‘यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो इसपर चढ़ाई गई भेंट की शपथ खाएगा तो वह बँध जाएगा।’

19हे अंधो, क्या महत्वपूर्ण है, भेंट या वह वेदी जो भेंट को पवित्र करती है?

20इसलिए जो शपथ खाता है वह वेदी और उस पर रखी भेंट दोनों ही की शपथ खाता है।

21जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह मन्दिर व उसमें रहने वाले परमेश्वर की भी शपथ खाता है,

22और जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्वर के सिंहासन और उस पर बैठने वाले दोनों की शपथ खाता है।

23“हे पाखण्डी शास्त्रियों-फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने, सौंफ और जीरे का दसवां अंश तो देते हो, परन्तु व्यवस्था की गंभीर बातों अर्थात् न्याय, दया और विश्वास की उपेक्षा करते हो, परन्तु चाहिए था कि इन बातों को करते हुए अन्य बातों की भी उपेक्षा न करते।

24हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो!

25“हे पाखण्डी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को बाहर से तो मांजते हो, परन्तु भीतर से वे हर प्रकार की लूट और असंयम से भरे हुए है।

26हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज जिससे कि वे बाहर से भी स्वच्छ हो जाए।

27“हे पाखण्डी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूने से पुती हुई व़फ़बरों के समान हो जो बाहर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सारी अशुद्धता से भरी पड़ी है।

28इसी प्रकार तुम भी बाहर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर पाखण्ड और अधर्म से भरे हुए हो।

29“हे पाखण्डी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम नबियों की कब्रें तो बनाते और धर्मियों के स्मारक सजाते हो,

30और कहते हो, ‘यदि हम अपने पूर्वजों के समय में होते तो नबियों की हत्या में साझीदार न होते।’

31फलतः तुम अपने विरुद्ध साक्षी देते हो कि नबियों के हत्यारों की सन्तान हो।

32अतः तुम अपने पूर्वजों के पाप का घड़ा भर दो।

33हे सांपों, हे करैतों के बच्चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे?

34इसलिए देखो, मैं तुम्हारे लिए नबियों और ज्ञानियों और शास्त्रियों को भेज रहा हूँ। तुम उनमें से कुछ की हत्या करोगे और कुछ को क्रूस पर चढ़ाओगे, फिर कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और नगर-नगर सताते फिरोगे

35कि जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह तुम्हारे सिर पर पड़े, अर्थात् धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच मार डाला था।

36मैं तुमसे सच कहता हूँ, ये सब बातें इस पीढ़ी के सिर पर पड़ेंगी।

37“हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू नबियों को मार डालता है और जो तेरे पास भेजे जाते हैं, उनका पथराव करता है। मैंने कितनी ही बार चाहा कि जैसे मुर्गी बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बच्चों को इकट्ठा करूं, परन्तु तुमने न चाहा।

38देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिए उजाड़ छोड़ा जाता है।

39क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि अब से तुम मुझे तब तक नहीं देखोगे जब तक यह न कहोगेः ‘धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है’।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)