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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 20 / 31

नीतिवचन 20

1दाखरस हँसी उड़ाने वाला और मदिरा उपद्रव मचाने वाली है। जो कोई उससे मतवाला होता है, वह बुद्धिमान नही।

2राजा का भय सिंह की दहाड़ के समान होता है, जो उसको भड़काता है, वह अपने प्राण से हाथ धोता है।

3लड़ाई-झगड़े से दूर रहना मनुष्य के लिए आदर की बात है, परन्तु मूर्ख तो झगड़ा ही करेगा।

4आलसी मनुष्य मौसम आने पर हल नहीं जोतता, अतः फसल के समय वह भीख मांगता है पर कुछ नहीं पाता।

5मनुष्य के हृदय के उद्देश्य गहरे जल के समान हैं, परन्तु समझदार मनुष्य उसे खींच निकालता है।

6अनेक लोग अपनी विश्वसनीयता का प्रचार तो करते हैं, परन्तु विश्वसनीय मनुष्य कौन पा सकता है?

7धर्मी जो खराई से चलता है- उसके पश्चात् उसकी सन्तान क्या ही धन्य होती है!

8जो राजा न्याय-सिंहासन पर बैठता है, वह अपनी आँखों से सब बुराई को छांट निकालता है।

9कौन कह सकता है, “मैंने अपना हृदय शुद्ध कर लिया है, मैं अपने पाप से शुद्ध हो चुका हूं”?

10घटिया तौल और घटिया माप- इन दोनों से यहोवा को घृणा है।

11लड़का भी अपने कार्यों से, अर्थात् शुद्ध और उचित चाल-चलन से जाना जाता है।

12सुनने के लिए कान और देखने के लिए आँख- इन दोनों को यहोवा ने बनाया है।

13नींद से प्रेम न रख, ऐसा न हो कि तू दरिद्र हो जाएः अपनी आँखें खोल तो तू रोटी से तृप्त होगा।

14खरीददार कहता है, “ठीक नहीं, ठीक नहीं,” पर चले जाने के बाद अपने सौदे पर शेखी मारता है।

15सोना और मूंगा तो बहुत हैं, परन्तु ज्ञान भरे होंठ और भी मूल्यवान होते है।

16अजनबी की जमानत लेने वाले का वस्त्र रख ले। विदेशियों की जमानत लेने वाले को ही बन्धक रख ले।

17छल-कपट से प्राप्त रोटी मनुष्य को मीठी लगती है, पर बाद में उसका मुंह कंकड़ से भर जाता है।

18सम्मति के द्वारा ही योजना बना, और बुद्धि से अगुवाई लेकर ही युद्ध कर।

19जो मनुष्य निन्दा करता फिरता है, वह भेद खोल देता है, अतः बकवादी की संगति न करना।

20जो अपने पिता या अपनी माता को कोसता है, उसका दीपक अंधकार के समय बुझ जाएगा।

21जो मीरास आरम्भ में जल्दबाजी से प्राप्त होती है, अन्त में उस पर आशीष नहीं होगी।

22मत कहना, “मैं बुराई का बदला लूंगा।” यहोवा की प्रतीक्षा कर और वह तेरा उद्धार करेगा।

23घटिया बाट यहोवा को घिनौने लगते हैं, और छल का तराजू अच्छा नहीं होता।

24मनुष्य के कदम यहोवा ही निश्चित करता है, तब मनुष्य कैसे अपना मार्ग समझ सकता है?

25मनुष्य के लिए उतावली से कहना, “यह पवित्र है,” और मन्नत मानने के बाद पूछ-ताछ करना, फंदा है।

26बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटक कर अलग करता है, और दांवने का पहिया उन पर चलाता है।

27मनुष्य की आत्मा यहोवा का दीपक है, जो मनुष्य के भीतरी भागों को खोजकर जांचता है।

28निष्ठा और सच्चाई राजा को सुरक्षित रखते हैं, और वह अपने सिंहासन को धार्मिकता से बनाए रखता है।

29जवानों की महिमा उनका बल है, और बूढ़ों का गौरव उनके पके बाल है।

30कोड़ों के घाव से बुराई दूर होती है, और ताड़ना से अन्तःकरण शुद्ध होता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)