Loading account

नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 12 / 16

1 कुरिन्थियों 12

1हे भाइयो, मैं नहीं चाहता कि आत्मिक वरदानों के विषय में तुम अनभिज्ञ रहो।

2तुम्हें मालूम है कि जब तुम अन्यजाति थे तब गूंगी मूर्तियों की ओर जिस प्रकार भटकाए जाते थे उसी प्रकार चलते थे।

3इसलिए मैं तुम्हें बताए देता हूं कि परमेश्वर के आत्मा के द्वारा कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं कहता कि “यीशु शापित है” और न पवित्र आत्मा के बिना कोई यह कह सकता है कि “यीशु प्रभु है।”

4वरदान तो विभिन्न प्रकार के हैं, पर आत्मा एक ही है।

5और सेवाएं भी कई प्रकार की हैं, परन्तु प्रभु एक ही है।

6प्रभावशाली कार्य भी अनेक प्रकार के हैं, परन्तु परमेश्वर एक ही है जो सब में सब कुछ करता है।

7परन्तु प्रत्येक को सब की भलाई के लिए आत्मिक वरदान दिया जाता है।

8क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि का वचन और दूसरे को उसी आत्मा के द्वारा ज्ञान का वचन दिया जाता है।

9किसी को उसी आत्मा से विश्वास का तथा किसी और को उसी एक आत्मा से चंगा करने का वरदान दिया जाता है,

10फिर किसी को सामर्थ्य के कार्याें की शक्ति और किसी को नबूवत करने, किसी को आत्माओं की परख, किसी को भिन्न भिन्न प्रकार की भाषाएं बोलने, और किसी को भाषाओं का अर्थ बताने का वरदान दिया जाता है।

11परन्तु वही एक आत्मा ये सब कार्य करवाता है और अपने इच्छानुसार जिसे जो चाहता है अलग-अलग बांट देता है।

12क्योंकि जिस प्रकार देह तो एक है और उसके कई अंग हैं, और देह के सब अंग यघपि अनेक हैं तो भी वे एक ही देह हैं, इसी प्रकार मसीह भी है।

13क्योंकि हम सब ने, चाहे यहूदी हों या यूनानी, दास हों या स्वतन्त्र, एक ही आत्मा द्वारा एक देह होने के लिए बपतिस्मा पाया, और हमें एक ही आत्मा पिलाया गया।

14क्योंकि देह तो एक अंग का नहीं पर अनेक अंगों का समूह है।

15यदि पैर कहे, ‘‘मैं हाथ नहीं, इसलिए मैं देह का अंग नहीं,’’ तो क्या वह इस कारण देह का अंग नहीं?

16यदि कान कहे, ‘‘मैं आंख नहीं, इसलिए मैं देह का अंग नहीं,’’ तो क्या वह इस कारण देह का अंग नहीं?

17यदि पूरी देह आंख ही होती, तब सुनना कहां होता? और यदि सारी देह से सुनना ही होता तो सूंघना कहां होता?

18परन्तु परमेश्वर ने सब अंगों को अपनी इच्छा के अनुसार एक-एक करके देह में रखा है।

19और यदि वे सब के सब एक ही अंग होते तो देह कहां होती?

20अंग तो अनेक हैं, परन्तु देह एक है।

21आंख, हाथ से नहीं कह सकती कि मुझे तेरी आवश्यकता नहीं; न सिर, पांव से कि मुझे तुम्हारी आवश्यकता नही।

22इसके विपरीत, देह के वे अंग जो निर्बल प्रतीत होते हैं और भी अधिक आवश्यक हैं,

23और देह के जिन अंगों को हम कम आदर के योग्य समझते हैं उन्ही को अधिक आदर देते हैं, और हमारे शोभाहीन अंग अत्यधिक शोभनीय हो जाते हैं,

24जबकि हमारे शोभनीय अंगों को इसकी आवश्यकता नहीं होती। परन्तु परमेश्वर ने हमारी देह को ऐसा बनाया है कि दीन-हीन अंगों को अधिक आदर मिले,

25कि देह में कोई फूट न पड़े, परन्तु सब अंग अपने समान एक दूसरे की चिन्ता करे।

26और यदि एक अंग दुख पाता है तो उसके साथ सब अंग दुख पाते हैं, और यदि एक अंग सम्मानित होता है तो सब अंग उसके साथ आनन्दित होते है।

27इसी प्रकार तुम मसीह की देह हो और एक-एक करके उसके अंग हो,

28और परमेश्वर ने कलीसिया में प्रथम प्रेरित, द्वितीय नबी, तृतीय शिक्षक, फिर सामर्थ्य के कार्य करने वाले, चंगा करने के वरदान वाले, परोपकारी, प्रबन्धक, तथा अन्य-अन्य भाषाएं बोलने वालों को नियुक्त किया है।

29क्या सब प्रेरित हैं? क्या सब नबी हैं? क्या सब शिक्षक हैं? क्या सब सामर्थ्य के काम करने वाले हैं?

30क्या सब को चंगा करने का वरदान मिला है? क्या सब अन्य-अन्य भाषाएं बोलते हैं? क्या सब उनका अर्थ बताते हैं?

31तुम बड़े से बड़े वरदान की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें सब से उत्तम मार्ग दर्शाता हूँ।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)