Loading account

नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 13 / 16

1 कुरिन्थियों 13

1यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की भाषाएं बोलूं पर प्रेम न रखूं तो मैं ठनठनाती घन्टी और झनझनाती झांझ हूँ।

2यदि मुझे नबूवत करने का वरदान प्राप्त हो और मैं सब भेदों तथा सब प्रकार के ज्ञान को जानूं, और यदि मुझे यहां तक पूर्ण विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूँ, पर प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।

3यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिलाने के लिए दान कर दूं, और अपनी देह जलाने के लिए सौंप दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नही।

4प्रेम धैर्यवान है, प्रेम दयालु है और वह ईर्ष्या नहीं करता। प्रेम डींग नहीं मारता, अहंकार नहीं करता,

5अभद्र व्यवहार नहीं करता, अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुराई का लेखा नहीं रखता,

6अधर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है।

7सब बातें सहता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धैर्य रखता है।

8प्रेम कभी मिटता नही। नबूवतें हों तो समाप्त हो जाएंगी, भाषाएं हों तो जाती रहेंगी; और ज्ञान हो तो लुप्त हो जाएगा।

9क्योंकि हमारा ज्ञान अधूरा है और हमारी नबूवतें अधूरी है।

10परन्तु जब सर्व-सिद्ध आएगा तो अधूरापन मिट जाएगा।

11जब मैं बालक था तो बालक के समान बोलता, बालक के समान सोचता और बालक के समान समझता था, परन्तु जब सयाना हुआ तब बालकपन की बातें छोड़ दी।

12अभी तो हमें दर्पण में धुंधला-सा दिखाई पड़ता है, परन्तु उस समय आमने-सामने देखेंगे; इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है, परन्तु उस समय पूर्ण रूप से जानूंगा, जैसा मैं स्वयं भी पूर्ण रूप से जाना गया हू।

13पर अब विश्वास, आशा, प्रेम, ये तीनों स्थायी हैं, परन्तु इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)