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नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 14 / 16

1 कुरिन्थियों 14

1प्रेम का पीछा करो और आत्मिक वरदानों की धुन में रहो, विशेषकर यह कि तुम भविष्यद्वाणी करो।

2क्योंकि जो अन्य भाषा में बोलता है वह मनुष्यों से नहीं परन्तु परमेश्वर से बातें करता है, क्योंकि उसकी कोई नहीं समझता, परन्तु वह आत्मा में भेद की बातें बोलता है।

3परन्तु जो भविष्यद्वाणी करता है वह आत्मिक उन्नति, उपदेश तथा सान्त्वना देने के लिए मनुष्यों से बोलता है।

4जो अन्य भाषा में बोलता है वह अपनी ही उन्नति करता है, परन्तु जो भविष्यद्वाणी करता है वह कलीसिया की उन्नति करता है।

5अब मैं चाहता तो हूं कि तुम सब अन्य भाषाएं बोलते, परन्तु इस से भी बढ़कर यह कि तुम भविष्यद्वाणी करो, क्योंकि जो भविष्यद्वाणी करता है, वह उस से भी बढ़कर है जो अन्य भाषाओं में बोलता तो है, पर अनुवाद नहीं कर सकता कि कलीसिया की उन्नति हो।

6भाइयो, यदि मैं तुम्हारे पास आकर अन्य भाषाओं में बोलूं तो मुझ से तुम्हें क्या लाभ होगा जब तक कि मैं प्रकाशन अथवा ज्ञान या नबूवत या शिक्षा की बातें न बोलूूं?

7इसी प्रकार निर्जीव वस्तुएं भी जिनसे ध्वनि निकलती है-चाहे बांसुरी या वीणा-यदि इनके स्वरों में अन्तर न हो, तो यह कैसे ज्ञात होगा कि बांसुरी या वीणा पर क्या बजाया जा रहा है?

8यदि तुरही से अस्पष्ट ध्वनि निकले तो कौन युद्ध के लिए तैयारी करेगा?

9इसी प्रकार तुम भी, यदि जीभ से साफ-साफ न बोलो तो जो बोला गया वह कैसे समझा जाएगा? तुम तो हवा से बातें करने वाले ठहरोगे।

10इस संसार में न जाने कितने प्रकार की भाषाएं हैं, उनमें से कोई भी अर्थहीन नही।

11यदि मैं किसी भाषा का अर्थ न जानूं तो मैं बोलने वाले के लिए अजनबी तथा बोलने वाला मेरी दृष्टि में अजनबी ठहरेगा।

12इसी प्रकार तुम भी, जब कि आत्मिक वरदानों की धुन में हो, कलीसिया की उन्नति के लिए भरपूर होने का प्रयत्न करो।

13इसलिए जो अन्य भाषा बोलने वाला हो, वह प्रार्थना करे कि अनुवाद भी कर सके।

14क्योंकि यदि मैं अन्य भाषा में प्रार्थना करूं तब मेरी आत्मा तो प्रार्थना करती है, परन्तु मेरी बुद्धि काम नहीं देती।

15तो हम क्या करें? मैं आत्मा में प्रार्थना करूंगा, और बुद्धि से भी प्रार्थना करूंगा। मैं आत्मा से गाऊंगा, और बुद्धि से भी गाऊंगा।

16अन्यथा यदि तू आत्मा में ही धन्यवाद करे तो वहां उपस्थित अनजान व्यक्ति मेरे धन्यवाद पर ‘आमीन’ कैसे कहेगा, क्योंकि वह तो नहीं जानता कि तू क्या कहता है?

17तू तो भली-भांति धन्यवाद देता है, परन्तु उस से दूसरे की उन्नति नहीं होती।

18मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं तुम सब से बढ़कर अन्य-अन्य भाषाओं में बोलता हूँ।

19फिर भी कलीसिया में अन्य भाषा में दस हज़ार शब्दों की अपेक्षा अपनी बुद्धि से पांच शब्द ही बोलना उत्तम समझता हूं कि दूसरों को भी शिक्षा दे सकूँ।

20भाइयो, अपनी समझ में बच्चे न बनो। वैसे बुराई में तो शिशु बने रहो, परन्तु समझ में सयाने हो जाओ।

21व्यवस्था में लिखा है कि प्रभु कहता है, ‘‘मैं विदेशी भाषा बोलने वाले तथा विदेशियों के होठों से इस जाति से बातें करूंगा, फिर भी ये मेरी नहीं सुनेंगे।’’

22अतः अन्य भाषाएं विश्वासियों के लिए नहीं पर अविश्वासियों के लिए चिह्न है। परन्तु भविष्यद्वाणी अविश्वासियों के लिए नहीं पर विश्वासियों के लिए चिह्न है।

23यदि सारी कलीसिया एक स्थान पर एकत्रित हो और सब अन्य भाषाओं में बोलें तथा अनजान या अविश्वासी मनुष्य भीतर आ जाएं, तो क्या वे यह न कहेंगे कि तुम पागल हो?

24परन्तु यदि सब नबूवत करें तथा कोई अविश्वासी या अनजान व्यक्ति प्रवेश करे तो सबके द्वारा वह कायल किया जाएगा और परखा जाएगा,

25उसके हृदय के भेद प्रकट हो जाएंगे, तब वह मुंह के बल गिरकर परमेश्वर की आराधना करेगा और मान लेगा कि सचमुच परमेश्वर तुम्हारे मध्य है।

26भाइयो, फिर क्या करना चाहिए? जब तुुम एकत्रित होते हो तो प्रत्येक के मन में भजन या उपदेश या प्रकाशन या अन्य भाषा या अन्य भाषा का अनुवाद होता है। सब कुछ आत्मिक उन्नति के लिए होना चाहिए।

27यदि कोई अन्य भाषा में बोले तो दो या अधिक से अधिक तीन जन क्रम से बोलें, तथा एक व्यक्ति अनुवाद करे।

28परन्तु यदि अनुवादक न हो तो वह कलीसिया में चुप रहे, तथा अपने आप से और परमेश्वर से बोले।

29नबियों में से दो या तीन बोलें, तथा अन्य लोग परखे।

30परन्तु यदि बैठे हुओं में से किसी अन्य पर ईशवरीय प्रकाशन हो तो पहला चुप हो जाए।

31क्योंकि तुम सब एक-एक करके नबूवत कर सकते हो, जिस से सब सीखें और सब को शान्ति मिले।

32नबियों की आत्माएं नबियों के वश में रहती हैं,

33क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं परन्तु शान्ति का परमेश्वर है, जैसा कि पवित्र लोगों की सब कलीसियाओं में है।

34स्त्रियां कलीसियाओं में चुप रहें, क्योंकि उन्हें बोलने की अनुमति नहीं है। वे अधीनता से रहें जैसा कि व्यवस्था भी कहती है।

35यदि वे कुछ सीखना चाहती हैं तो घर में अपने-अपने पति से पूछें, क्योंकि स्त्री के लिए कलीसिया में बोलना अनुचित है।

36क्या परमेश्वर का वचन सब से पहले तुम्हीं से निकला? अथवा क्या वह केवल तुम्हीं तक पहुंचा है?

37यदि कोई व्यक्ति समझता है कि वह नबी या आत्मिक जन है, तो वह जान ले कि जो कुछ मैं तुम्हें लिख रहा हूं वह प्रभु की आज्ञा है।

38परन्तु यदि कोई इसको न माने तो उसकी भी न मानी जाए।

39इसलिए मेेरे भाइयो, नबूवत करने की धुन में रहो परन्तु अन्य भाषाएं बोलने वालों को मत रोको।

40फिर भी सब बातें उचित रीति से और क्रमानुसार की जाए।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)