नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 7 / 16
1 कुरिन्थियों 7
1अब उन बातों के विषय में जो तुमने लिखीं, अच्छा तो यह है कि पुरुष, स्त्री को न छुए।
2परन्तु व्यभिचार से बचने के लिए प्रत्येक पुरष की अपनी पत्नी और प्रत्येक स्त्री का अपना पति हो।
3पति अपनी पत्नी के प्रति और इसी प्रकार पत्नी अपने पति के प्रति कर्तव्य निभाए।
4पत्नी को अपनी देह पर अधिकार नहीं, पर उसके पति को है; इसी प्रकार पति को अपनी देह पर अधिकार नहीं, पर उसकी पत्नी को है।
5एक दूसरे को इस अधिकार से वंचित न करो, पर केवल आपसी सहमति से कुछ समय तक के लिए अलग रहो कि प्रार्थना हेतु अवसर मिले, और फिर एक साथ हो जाओ, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे असंयम के कारण शैतान तुम्हारी परीक्षा करे।
6परन्तु मैं अनुमति के रूप में यह कहता हूँ, आदेश के रूप में नही।
7फिर भी मैं चाहता हूं कि सब मनुष्य ऐसे ही होें जैसा मैं स्वयं हू। परन्तु प्रत्येक को परमेश्वर की ओर से विशेेज वरदान मिला है, किसी को एक प्रकार का तो किसी को दूसरे प्रकार का।
8परन्तु मैं अविवाहितों और विधवाओं से कहता हूं कि उनके लिए ऐसा ही रहना अच्छा है, जैसा मैं हू।
9परन्तु यदि वे संयम न कर सकें तो विवाह कर लें, क्योंकि विवाह करना कामातुर रहने से उत्तम है।
10परन्तु विवाहितों को मैं नहीं, वरन् प्रभु यह आदेश देता है कि पत्नी अपने पति को न त्यागे।
11( परन्तु यदि वह त्याग भी दे, तो अविवाहित रहे, या पुनः अपने पति से मेल कर ले), और पति भी अपनी पत्नी को न त्यागे।
12शेज मनुष्यों से, प्रभु नहीं, वरन् मैं कहता हूं, कि यदि किसी भाई की पत्नी अविश्वासिनी हो और उसके साथ रहने को सहमत हो, तो वह उसे न त्यागे।
13यदि किसी स्त्री का पति अविश्वासी हो, और उसके साथ रहने को सहमत हो, तो वह पति को न त्यागे।
14क्योंकि अविश्वासी पति अपनी पत्नी के कारण पवित्र ठहरता है, और अविश्वासिनी पत्नी अपने विश्वासी पति के कारण पवित्र ठहरती है, अन्यथा तुम्हारे बाल-बच्चे अशुद्ध होते, परन्तु अब तो वे पवित्र है।
15यदि अविश्वासी अलग होता है तो उसे अलग होने दो। ऐसी परिस्थिति में कोई भाई या बहन बन्धन में नहीं है, परन्तु परमेश्वर ने हमें मेल-मिलाप के लिए बुलाया है।
16क्योंकि, हे पत्नी, तू क्या जानती है कि तू अपने पति का उद्धार करा लेगी? या हे पति, तू क्या जानता है कि तू अपनी पत्नी का उद्धार करा लेगा?
17प्रभु ने जैसा जिसको दिया है, और परमेश्वर ने जैसा जिसको बुलाया है, वह वैसा ही चले। मैं सब कलीसियाओं को यही आदेश देता हू।
18क्या कोई ख़तने की दशा में बुलाया गया है? वह ख़तनाहीन न बने। क्या कोई ख़तनाहीन दशा में बुलाया गया है? वह ख़तना न कराए?
19न ख़तना कुछ है और ख़तनारहित होना, परन्तु परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना ही मुख्य बात है।
20जो व्यक्ति जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में रहे।
21क्या तू दासता में बुलाया गया है? इसकी चिन्ता न कर; परन्तु यदि तू स्वतंत्र हो सके तो ऐसा ही कर।
22क्योंकि जो दासता की दशा में प्रभु में बुलाया गया है वह प्रभु का स्वतन्त्र जन है; इसी प्रकार जो स्वतन्त्रता की दशा में बुलाया गया है, वह मसीह का दास है।
23तुम दाम देकर मोल लिए गए हो, अतः मनुष्यों के दास न बनो।
24हे भाइयो, प्रत्येक मनुष्य जिस दशा में बुलाया गया, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे।
25अब कुंवारियों के सम्बन्ध में प्रभु की ओर से मुझे कोई आज्ञा नहीं मिली, परन्तु प्रभु की दया से विश्वासयोग्य होने के कारण, मैं अपनी सम्मति देता हू।
26मेरे विचार से वर्तमान कठिन परिस्थिति में पुरष के लिए यही अच्छा है कि वह जिस दशा में है उसी में रहे।
27क्या तेरे पास पत्नी है? तो उस से मुक्त होने का प्रत्यत्न न कर। क्या तेरे पास पत्नी नहीं? तो तू उसकी खोज न कर।
28परन्तु यदि तू विवाह करे तो पाप नहीं करता। यदि कुंवारी ब्याही जाए, तो पाप नहीं करती। फिर भी ऐसों को इस जीवन में कष्ट होगा, और मैं तुम्हें बचाना चाहता हू।
29परन्तु, हे भाइयो, मैं कहता हूं कि समय कम किया गया है, इसलिए अब से जिनकी पत्नी हों वे ऐसे रहें मानो कि उनकी पत्नी नहीं,
30और रोने वाले ऐसे हों मानो रोते नहीं, और आनन्द करने वाले ऐसे हों मानो आनन्द नहीं करते। और जो मोल लेते हैं वे ऐसे हों मानो उनके पास कुछ नहीं है।
31और संसार का उपभोग करने वाले ऐसे हों मानो वे उसमें लिप्त नहीं: क्योंकि इस संसार की रीति और व्यवहार बदलते जाते है।
32परन्तु मैं यह चाहता हूं कि तुम चिन्तामुक्त रहो। अविवाहित पुरष प्रभु की बातों की चिन्ता करता है कि वह प्रभु को कैसे प्रसन्न करे,
33पर विवाहित पुरष सांसारिक बातों की चिन्ता करता है कि अपनी पत्नी को कैसे प्रसन्न करे,
34और उसका ध्यान बंट जाता है। और जो अविवाहिता या कुंवारी है, उसे प्रभु की बातों की चिन्ता रहती है, कि वह देह और आत्मा दोनों में पवित्र हो; परन्तु जो विवाहिता है उसको सांसारिक बातें की चिन्ता रहती है, कि अपने पति को कैसे प्रसन्न रखे।
35मैं ये बातें तुम्हारे ही लाभ के लिए कहता हूं-तुम्हें रोकने के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि जो शोभनीय है वही हो और तुम्हारा मन प्रभु की सेवा में निर्विघ्न लगा रहे।
36यदि कोई समझता है कि वह अपनी कुंवारी कन्या के प्रति जिसकी यौवनावस्था समाप्त हो रही है, अनुचित व्यवहार कर रहा है, और वह यह भी अनुभव करता है कि उसका विवाह हो जाना चाहिए तो जैसा वह चाहता है, वैसा ही करे। वे ब्याह दिए जाएं, इसमें कोई पाप नही।
37जो किसी प्रकार के दबाव में न आकर अपने मन में दृढ़ रहता है और जिसे अपने इच्छानुसार कार्य करने का अधिकार है और उसने अपने मन में अपनी कुंवारी कन्या को अविवाहित रखने का निश्चय कर लिया है, वह अच्छा करता है।
38अतः जो अपनी कन्या का विवाह कर देता है वह अच्छा करता है, परन्तु जो विवाह नहीं करता वह और भी अच्छा करता है।
39जब तक किसी स्त्री का पति जीवित है तब तक वह उस से बंधी हुई है, परन्तु यदि उसका पति मर चुका है तो वह स्वतन्त्र है कि जिस से चाहे विवाह कर ले, परन्तु केवल प्रभु मे।
40पर मेरे विचार से जैसी वह है यदि वैसी ही रहे तो और भी धन्य है, और मैं समझता हूं कि मुझ में भी परमेश्वर का आत्मा है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)