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पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 28 / 31

1 शमूएल 28

1उन दिनों ऐसा हुआ कि पलिश्तियों ने इस्राएल के विरुद्ध युद्ध करने के लिए सेना छावनियों में एकत्रित की। तब आकीश ने दाऊद से कहा, “यह निश्चय जान कि तुझे अपने साथियों सहित मेरे साथ युद्ध में जाना पड़ेगा।”

2तब दाऊद ने आकीश से कहा, “बहुत अच्छा! तू जान लेगा कि तेरा दास क्या कर सकता है।” इस पर आकीश ने दाऊद से कहा, “ठीक! मैं तुझे जीवन-भर के लिए अपना अंग-रक्षक बनाता हू।”

3इस समय शमूएल की मृत्यु हो चुकी थी, और सम्पूर्ण इस्राएल ने उसके लिए शोक मनाया, और उसके नगर रामा में उसको मिट्टी दी गई थी। और शाऊल ने सब ओझों और भूत-सिद्धि करने वालों को देश से निकाल दिया थ।

4अतः पलिश्तियों ने शूनेम में एकत्र होकर छावनी डाली, और शाऊल ने इस्राएल के सब सैनिकों को एकत्र करके गिलबों में छावनी डाली।

5जब शाऊल ने पलिश्तियों की छावनी को देखा तब वह भयभीत हुआ, और उसका हृदय बहुत कांपने लगा।

6तब शाऊल ने यहोवा से पूछा, तो यहोवा ने उसे न तो स्वप्नों, न ऊरीम, न भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से कोई उत्तर दिया।

7तब शाऊल ने अपने कर्मचारियों से कहा, “मेरे लिए कोई भूत-सिद्धि करने वाली खोजो जिसके पास जाकर मैं पूछ सकूँ।” उसके कर्मचारियों ने कहा, “देख, एनदोर में भूत-सिद्धि करने वाली एक स्त्री रहती है।

8तब शाऊल ने दूसरा वस्त्र धारण कर भेष बदल लिया, और दो मनुष्यों को साथ लेकर रात को उस स्त्री के पास पहुँचा और उससे कहा, “मेरे लिए भूत-सिद्धि कर और जिस व्यक्ति का नाम लूँ उसको मेरे लिए बुला।”

9परन्तु उस स्त्री ने उससे कहा, “देख, तू तो जानता है कि शाऊल ने क्या किया है। उसने सब ओझाओं तथा भूत-सिद्धि करने वालों को देश से कैसे नष्ट कर दिया है। तब तू क्यों मेरे प्राण के लिए मृत्यु का फन्दा लगा रहा है?”

10तब शाऊल ने उस स्त्री से यहोवा के नाम से शपथ खाई, “यहोवा के जीवन की शपथ, इस बात के कारण तुझे कोई दण्ड नहीं दिया जाएगा।”

11तब स्त्री ने पूछा, “मैं तेरे लिए किसको बुलाऊँ?” उसने कहा, “मेरे लिए शमूएल को बुला।”

12जब स्त्री ने शमूएल को देखा तब वह जोर से चिल्ला उठी, और उस स्त्री ने शाऊल से कहा, “तू ने मुझे क्यों धोखा दिया? तू तो शाऊल है।”

13तब राजा ने उससे कहा, “मत डर! तू क्या देखती है?” स्त्री ने शाऊल से कहा, “मैं एक देवता को पृथ्वी में से ऊपर आते देखती हू।”

14फिर उसने पूछा, “उसका स्वरूप क्या है?” स्त्री ने उत्तर दिया, “एक वृद्ध मनुष्य ऊपर आ रहा है। वह चोगा पहने है।” तब शाऊल ने जान लिया कि वह शमूएल है। इस कारण उसने मुंह के बल भूमि पर गिरकर उसे दण्डवत् किया।

15तब शमूएल ने शाऊल से कहा, “तूने मुझे ऊपर बुलाकर क्यों सताया है?” और शाऊल ने उत्तर दिया, “मैं बड़े संकट में हूँ क्योंकि पलिश्ती मुझसे युद्ध कर रहे हैं, और परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है और अब वह न तो स्वप्नों द्वारा और न भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कोई उत्तर देता है। मैंने इसलिए तुझको बुलवाया है कि तू मुझ पर प्रकट करे कि मुझे क्या करना चाहिए।”

16शमूएल ने कहा, “जब यहोवा ने तुझे छोड़ दिया है और तेरा शत्रु बन गया है, तब तू मुझसे क्यों पूछता है?

17यहोवा ने तो अपने वचन के अनुसार किया है जो उसने मेरे द्वारा कहा था कि यहोवा ने राज्य को तेरे हाथ से छीनकर तेरे पड़ोसी दाऊद को दे दिया है।

18इसलिए कि तू ने यहोवा की आज्ञा नहीं मानी और अमालेक पर उसके भयंकर प्रकोप के अनुसार कार्य नहीं किया, यहोवा ने आज तुझसे ऐसा किया है।

19यहोवा तेरे साथ इस्राएल को भी पलिश्तियों के हाथ में कर देगा। इसलिए, तू और तेरे पुत्र कल मेरे साथ होंगे। यहोवा इस्राएल की सेना को निश्चय पलिश्तियों के हाथों में कर देगा।”

20शमूएल के ये वचन सुनते ही शाऊल भूमि पर चित्त गिर पड़ा और अत्यधिक भयभीत हो गया। उसने पूरे दिन और पूरी रात कुछ भी भोजन न किया था इस कारण उसमें कुछ भी बल न रह गया था।

21तब वह स्त्री शाऊल के पास आई। उसने देखा कि वह अत्यधिक भयभीत है। अतः उसने कहा, “देख, तेरी दासी ने तो तेरी आज्ञा मानी है, और अपने प्राण हथेली पर रखकर तेरे वचनों को सुना जो तूने मुझसे कहे।

22अब तू भी अपनी दासी के वचन सुन! मुझे तेरे सामने रोटी का एक टुकड़ा रखने दे कि तू खाए और मार्ग में जाने के लिए शक्ति पाए।”

23परन्तु उसने इनकार कर दिया, और कहा, “मैं नहीं खाऊँगा।” फिर भी उस स्त्री और उसके सेवकों ने उससे आग्रह किया। तब उसने मान लिया, और वह भूमि पर से उठकर खाट पर बैठ गया।

24स्त्री के घर में एक पला हुआ बछड़ा था जिसको उसने फुर्ती से मारा। फिर आटा लेकर गूँधा, और उससे अख़मीरी रोटियां बनाईं।

25फिर उसने शाऊल तथा उसके सेवकों को भोजन परोसा, और उन्होंने खाया। फिर वे उठकर रात ही को चले गए।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)