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पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 20 / 36

2 इतिहास 20

1इसके बाद ऐसा हुआ कि मोआबी और अम्मोनी कुछ मूनियों के साथ मिलकर यहोशापात से युद्ध करने आए।

2तब कुछ लोगों ने आकर यहोशापात को बताया, “समुद्र पार अर्थात् सीरिया देश से एक बड़ी भीड़ तुझ पर चढ़ाई करने आ रही है और देख, वह हसासोन-तामार अर्थात् एनगदी में है।”

3तब यहोशापात डर गया और उसने यहोवा की खोज में अपना ध्यान लगाया, और उसने पूरे यहूदा में उपवास रखने की घोषणा करवाई।

4अतः यहूदा के लोग यहोवा से सहायता पाने के लिए एकत्र हुए, वे यहूदा के सभी नगरों से यहोवा की दुहाई देने आए।

5तब यहोशापात यहोवा के भवन में नए आंगन के सामने यहूदियों और यरूशलेम-वासियों की सभा में खड़ा हुआ,

6और उसने कहा, “हे हमारे पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा, क्या तू स्वर्ग में परमेश्वर नहीं है? और क्या तू जाति-जाति के सब राज्यों पर प्रभुता नहीं करता? तेरे हाथ में तो ऐसा बल और पराक्रम है कि तेरा सामना कोई नहीं कर सकता।

7हे हमारे परमेश्वर, क्या तूने इस देश के निवासियों को अपनी प्रजा इस्राएल के सामने से निकालकर इसे अपने मित्र इब्राहीम को सदा के लिए नहीं दे दिया?

8और उन्होंने इसमें बस कर इसमें तेरे नाम का एक पवित्रस्थान यह कहकर बनाया, कि

9यदि कोई विपत्ति हम पर आ पड़े, अर्थात् तलवार, दण्ड, महामारी या अकाल, तो हम इस भवन और तेरे सामने-क्योंकि तेरा नाम तो इस भवन में है-खड़े होकर अपने क्लेश में तुझे पुकारेंगे और तू सुनकर हमें बचाएगा।

10और अब देख, तूने इस्राएलियों को जब वे मिस्र देश से निकल रहे थे, अम्मोनी, मोआबी और सेईर पहाड़ी के लोगों पर आक्रमण नहीं करने दिया, वरन् इस्राएलियों ने उनकी ओर से हट कर उन्हें नष्ट न किया,

11देख, वे अब कैसा बदला दे रहे हैं कि हमें उस निज भाग से जिसे तूने हमें उत्तराधिकार में दिया है, निकालने आए है।

12हे हमारे परमेश्वर, क्या तू उनको दण्ड न देगा? क्योंकि हम इस बड़ी भीड़ के सामने जो हम पर चढ़ाई करने आ रही है, निर्बल हैं, और हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करें परन्तु हमारी आंखें तो तेरी ओर लगी है।”

13और यहूदा के सब लोग अपने-अपने शिशुओं, पत्नियों और बच्चों सहित यहोवा के सामने खड़े थे।

14तब सभा के मध्य आसाप के वंश में से यहजीएल नामक एक लेवीय पर यहोवा का आत्मा उतरा। वह मत्तन्याह का पुत्र था जो यीएल का पुत्र, जो बनायाह का पुत्र, जो जकर्याह का पुत्र था।

15और उसने कहा, “हे यहूदा और यरूशलेम के समस्त निवासियों और हे राजा यहोशापात, सुनो! यहोवा तुमसे यों कहता हैः तुम इस बड़ी भीड़ के कारण मत डरो और तुम्हारा मन कच्चा न हो क्योंकि युद्ध तुम्हारा नहीं, परमेश्वर का है।

16कल उनका सामना करने के लिए नीचे उतर जाना। देखो, वे सीस की चढ़ाई पर से चढ़ आएंगे, और तुम्हें घाटी के सिरे पर यरूएल के जंगल के सामने मिलेंगे।

17यहां तुम्हें लड़ना न होगा। हे यहूदा और हे यरूशलेम, ठहरे रहना और खड़े रहकर यहोवा की ओर से अपना छुटकारा देखना। मत डरो, और तुम्हारा मन कच्चा न हो। कल उनका सामना करने के लिए जाना क्योंकि यहोवा तुम्हारे साथ रहेगा।”

18तब यहोशापात सिर झुकाकर भूमि पर गिरा और यहूदा और यरूशलेम के समस्त निवासियों ने यहोवा के सामने गिरकर यहोवा को दण्डवत् किया।

19और कहातियों और कोरह-वंशियों में से लेवीय लोग इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की स्तुति अत्यन्त ऊंचे स्वर से करने के लिए खड़े हुए।

20और वे बड़े सवेरे उठकर तकोआ के जंगल में गए और जब वे जा रहे थे तो यहोशापात ने खड़े होकर कहा, “हे यहूदा और यरूशलेम के निवासियों, मेरी सुनो! अपने परमेश्वर यहोवा पर विश्वास रखो तो स्थिर रहोगे। उसके नबियों पर भरोसा रखो और सफल हो जाओ।”

21तब उसने प्रजा के साथ सम्मति करके यहोवा की स्तुति गाने वालों को और ऐसे लोगों को नियुक्त किया जो पवित्र वस्त्र धारण करके सेना के आगे-आगे चलते हुए यह कहेंं, “यहोवा का धन्वाद करो क्योंकि उसकी करफ़णा सदा की है।”

22और जब वे गाने और स्तुति करने लगे तब यहोवा ने यहूदा पर चढ़ाई करने वाले उन अम्मोनियों, मोआबियों और सेईर की पहाड़ी के लोगों के विरफ़द्ध घात लगाने वालों को बैठा दिया। अतः वे मारे गए।

23क्योंकि अम्मोनियों और मोआबियों ने सेईर की पहाड़ी के निवासियों पर आक्रमण करके उनका विनाश किया। और जब वे सेईर के निवासियों का अन्त कर चुके तब उन्होंने आपस में एक दूसरे को नष्ट करने में हाथ बटाया।

24जब यहूदा के लोगों ने जंगल की चौकी पर पहुंच कर उस भीड़ को देखा, तो देखो, भूमि पर शव ही शव पड़े हुए थे और कोई नहीं बचा था।

25और जब यहोशापात और उसके लोग लूट बटोरने आए तो उन्हें वहां तरह-तरह का सामान, पोशाकें और बहुमूल्य वस्तुएं अर्थात् बहुत कुछ मिला जिसे उन्होंने बटोर लिया पर ले जा न सके। वहां लूट इतनी अधिक थी कि वे तीन दिन तक बटोरते रहे।

26चौथे दिन वे बराका की घाटी में इकट्ठे हुए और वहां उन्होंने यहोवा का धन्यवाद किया। और वह स्थान आज तक ‘बराका की घाटी’ कहलाता है।

27तब यहुदा और यरूशलेम के सब लोग अपने अगुवे यहोशापात की अगुवाई में आनन्द के साथ यरूशलेम को लौटे क्योंकि यहोवा ने उन्हें उनके शत्रुओं पर विजय का आनन्द दिलाया था।

28और वे सारंगियां, वीणाएं और तुरहियां बजाते हुए यरूशलेम में यहोवा के भवन आए।

29जब देश-देश के सब राज्यों के लोगों ने सुना कि इस्राएल के शत्रुओं से यहोवा ने युद्ध किया है तब उनके मन में परमेश्वर का भय समा गया।

30और यहोशापात के राज्य में शान्ति बनी रही, क्योंकि परमेश्वर ने उसको चारों ओर से विश्राम दिया।

31इस प्रकार यहोशापात ने यहूदा पर राज्य किया। वह पैतीस वर्ष की आयु मेंं राजा बना और पच्चीस वर्ष तक यरूशलेम में राज्य करता रहा। उसकी माता का नाम अजूबा था जो शिल्ही की बेटी थी।

32और वह अपने पिता आसा के मार्ग पर चला और उससे न हटा, अर्थात् जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है, वही करता रहा।

33फिर भी ऊंचे स्थान हटाए न गए। प्रजा के लोगों ने अब तक अपना मन अपने पूर्वजों के परमेश्वर की ओर न लगाया था।

34और देखों, यहोशापात के शेष कार्यों का विवरण आदि से अन्त तक हनानी के पुत्र येहू के इतिहास अर्थात् इस्राएल के राजाओं की पुस्तक में लिखा है।

35इसके बाद यहूदा के राजा यहोशापात ने इस्राएल के राजा अहज्याह से जो बड़ी दुष्टता करता था, सन्धि कर ली।

36उसने तर्शीश जाने के लिए जहाज बनवाने के लिए उससे सन्धि की और उन्होंने ऐसे जहाज एस्योन गेबेर में बनवाए।

37तब मारेशा-वासी दोदावाह के पुत्र एलीएजेर ने यहोशापात के विरफ़द्ध नबूवत की, “क्योंकि तूने अहज्याह से सन्धि की। इस कारण यहोवा ने तेरे कार्यों को नष्ट कर दिया है।” अतः जहाज टूट गए और तर्शीश को न जा सके।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)