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पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 30 / 36

2 इतिहास 30

1फिर हिजकिय्याह ने सम्पूर्ण इस्राएल और यहूदा को संदेश भेजा और एप्रैम और मनश्शे को पत्र लिखे कि वे यहोवा के भवन में इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिए फसह का पर्व मनाने यरूशलेम को आए।

2क्योंकि राजा और उसके अधिकारियों और यरूशलेम की सम्पूर्ण मंडली ने यह निर्णय किया था कि फसह का पर्व दूसरे महीने में मनाया जाए।

3वे उस समय इस पर्व को नहीं मना सकते थे क्योंकि न तो याजकों ने अपने आपको पर्याप्त संख्या में पवित्र किया था, और न लोग यरूशलेम में इकट्ठे हुए थे।

4इस प्रकार यह बात राजा और सम्पूर्ण मंडली की दृष्टि में ठीक लगी।

5तब उन्होंने निर्णय किया कि बेर्शेबा से दान तक के सम्पूर्ण इस्राएल में यह घोषणा की जाए कि लोग इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिए फसह मनाने को यरूशलेम में आए। क्योंकि उन्होंने इसे इतनी बड़ी संख्या में नहीं मनाया था, जैसी निर्धारित थी।

6और राजा के आज्ञानुसार हरकारे सम्पूर्ण इस्राएल और यहूदा में, राजा और उसके अधिकारियों के आदेश-पत्र लेकर यह कहते हुए घूमे “हे इस्राएलियो, तुम जो अश्शूर के राजाओं के हाथ से बच गए हो, इब्राहीम, इसहाक और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो जिससे कि वह तुम लोगों की ओर फिरे।

7और अपने पूर्वजों और भाइयों के समान मत बनो जिन्होंने अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा से विश्वासघात किया था जिससे उसने उन्हें भय का कारण बना दिया जैसा कि तुम देखते हो।

8अपने पूर्वजों के समान हठ मत करो वरन् यहोवा के सम्मुख नम्र बन कर उसके पवित्रस्थान में प्रवेश करो जिसे उसने सदा के लिए पवित्र किया है, और अपने परमेश्वर की आराधना करो जिससे कि उसका भड़का हुआ कोप तुम पर से दूर हो जाए।

9यदि तुम यहोवा की ओर फिरोगे तो तुम्हारे भाई और लड़के-वाले उन लोगों की दृष्टि में जो उन्हें बन्धुवाई में ले गए हैं कृपा के पात्र होंगे और वे इस देश में लौट आएंगे। क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर अनुग्रहकारी और दयालु है! यदि तुम उसकी ओर फिरोगे तो वह अपना मुंह तुमसे न मोड़ेगा।”

10अतः हरकारे एप्रैम और मनश्शे देश के नगर-नगर में से होते हुए जबूलून तक गए परन्तु वहां उनकी निन्दा की गई और उन्हें ठट्ठों में उड़ाया गया।

11फिर भी आशेर, मनश्शे और जबूलून में से कुछ लोग दीन होकर यरूशलेम को आए।

12परमेश्वर के हाथ ने यहूदा के लोगों को एक मन कर दिया कि वे वही करें जिसकी आज्ञा राजा और उसके अधिकारियों ने यहोवा के वचन के अनुसार दी थी।

13दूसरे महीने में अख़मीरी रोटी का पर्व मनाने के लिए यरूशलेम में बहुत लोग आए और एक बड़ी सभा एकत्र हो गई।

14और उन्होंने उठकर उन वेदियों को हटा दिया जो यरूशलेम में थी। उन्होंने धूप जलाने कि सब वेदियों को भी हटाकर किद्रोन नाले में फेंक दिया।

15तब दूसरे महीने के चौदहवें दिन उन्होंने फसह के पशु वध किए। तब याजक और लेवीय लज्जित हुए और अपने आपको पवित्र करके यहोवा के भवन में होमबलि ले आए।

16और वे अपने नियम के अनुसार, अर्थात् परमेश्वर के जन मूसा की व्यवस्था के अनुसार अपने-अपने स्थान पर खड़़े हुए। फिर याजकों ने लहू को लेवियों के हाथ से लेकर छिड़क दिया।

17सभा में बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने आप को पवित्र न किया था, इसलिए लेवियों को सब अशुद्ध लोगों के लिए फसह के पशुओं को वध करने का अधिकार दिया गया कि वे उनको यहोवा के लिए पवित्र करे।

18क्योंकि बहुत से लोगों ने, यहां तक कि एप्रैम मनश्शे और इस्साकार और जबूलून में से भी बहुतों ने अपने आपको शुद्ध नहीं किया था, फिर भी वे फसह खाते तो थे पर निर्धारित रीति के अनुसार नही। क्योंकि हिजकिय्याह ने उनके लिए प्रार्थना की थी, “यहोवा जो भला है वह उन सब को क्षमा करे

19जिन्होंने अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा की खोज में मन लगाए हैं, चाहे वे पवित्रस्थान की विधि के अनुसार शुद्ध नहीं है।”

20अतः यहोवा ने हिजकिय्याह की सुनकर लोगों को चंगा किया।

21और यरूशलेम में उपस्थित इस्राएलियों ने सात दिन तक अख़मीरी रोटी का पर्व बड़े आनन्दपूर्वक मनाया। और लेवीय तथा याजक यहोवा के लिए जोर से बजने वाले बाजे-बजाकर दिन प्रतिदिन यहोवा की स्तुति करते रहे।

22तब जितने लेवियों ने यहोवा की सेवा में दक्षता प्रकट की उन सबकी हिजकिय्याह ने प्रशंसा की। अतः वे अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा के लिए मेलबलि चढ़ा-चढ़ाकर और धन्यवाद दे-देकर निर्धारित सात दिनों तक खाते रहे।

23तब सारी सभा ने निर्णय किया कि हम और सात दिन तक पर्व मनाए। अतः उन्होंने और सात दिनों तक आनन्द से पर्व मनाया।

24क्योेंकि यहूदा के राजा हिजकिय्याह ने सभा को एक हजार बछड़े और सात हजार भेड़-बकरियां दान दीं और अधिकारियों ने सभा को एक हजार बछड़े और दस हजार भेड़-बकरियां दान दी; और बहुत से याजकों ने अपने आपको पवित्र किया।

25तब याजकों और लेवियों सहित यहूदा की सारी सभा, और इस्राएल से आए हुओं की सारी सभा, जिसमें इस्राएल के परदेशी तथा यहूदा के निवासी भी थे, इन सभों ने आनन्द मनाया।

26अतः यरूशलेम में बड़ा उल्लास था, क्योंकि इस्राएल के राजा दाऊद के पुत्र सुलैमान के दिनों के बाद से यरूशलेम में ऐसा नहीं हुआ था।

27तब लेवीय याजकों ने उठकर प्रजा को आशीर्वाद दिया; और उनकी सुनी गई और उनकी प्रार्थनाएं परमेश्वर के पवित्रस्थान अर्थात् स्वर्ग तक पहुंची।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)