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पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 32 / 36

2 इतिहास 32

1इन विश्वसनीय कार्यों के पश्चात् अश्शूर के राजा सन्हेरीब ने यहूदा पर आक्रमण करके गढ़ वाले नगरों को घेर लिया और उन्हें ले लेने की इच्छा की।

2जब हिजकिय्याह ने देखा कि सन्हेरीब आ गया है और यरूशलेम पर आक्रमण करना चाहता है,

3तो उसने अपने अधिकारियों और योद्धाओं से मिलकर नगर के बाहर के सोतों को पटवा देने का निर्णय किया और उन्होंने उसकी सहायता की।

4अतः बहुत-से लोगों ने एकत्र होकर सब झरनों और उस सोते को जो देश के मध्य से होकर बहता था यह कहकर पाट दिया, “अश्शूर के राजा यहां आकर क्यों बहुतायत से पानी पाएं?”

5फिर उसने हियाव बांधकर उस सम्पूर्ण शहरपनाह को जो टूटी पड़ी थी फिर से बनवाया और उस पर गुम्मट बनवाए तथा बाहर की ओर एक अन्य दीवार बनवाई और दाऊदनगर में मिल्लो को दृढ़ किया। उसने बड़ी संख्या में हथियार और ढालें भी बनवाईं।

6तब उसने प्रजा के ऊपर सैनिक अधिकारी नियुक्त किए और उन्हें नगर के फाटक के चौक पर एकत्र किया और यह कहकर प्रोत्साहित किया,

7“साहस रखो और दृढ़ रहो। अश्शूर के राजा और उस बड़ी भीड़ से जो उसके साथ है न तो तुम डरो और न निराश होओ, क्योंकि वह जो हमारे साथ है वह उससे बड़ा है जो उसके साथ है।

8उसके साथ तो मनुष्यों की भुजा मात्र ही है, परन्तु हमारी ओर से युद्ध करने और हमें सहायता देने को हमारा परमेश्वर यहोवा है।” और प्रजा के लोगों ने यहूदा के राजा हिजकिय्याह की बातों पर भरोसा किया।

9इसके बाद अश्शूर का राजा सन्हेरीब जो अपनी समस्त सेना सहित लाकीश को घेरे हुए था, उसने अपने कर्मचारियों को यरूशलेम में यहूदा के राजा हिजकिय्याह और उन सब यहूदियों के पास जो यरूशलेम में थे, यह कहने को भेजा,

10“अश्शूर का राजा सन्हेरीब यों कहता है कि तुम्हें किसका भरोसा है कि तुम घिरे हुए यरूशलेम में बैठे हो?

11क्या हिजकिय्याह यह कहकर कि हमारा परमेश्वर यहोवा अश्शूर के राजा से हमारा छुटकारा करेगा, तुम्हें भूखा-प्यासा मारने के लिए नहीं भरमा रहा है?

12क्या इसी हिजकिय्याह ने उसके ऊंचे स्थानों और वेदियों को दूर करके यहूदा और यरूशलेम से यह नहीं कहा, ‘तुम एक ही वेदी के सामने उपासना करना और उसी पर धूप जलाना?’

13क्या तुम नहीं जानते कि मैंने और मेरे पूर्वजों ने देश-देश के सब लोगों के साथ क्या-क्या किया? क्या देश देश की जातियों के देवता अपने-अपने देश को मेरे हाथ से बचा सके?

14जिन जातियों को मेरे पूर्वजों ने नष्ट कर दिया उनके सब देवताओं में कौन ऐसा निकला जो अपने लोगों को मेरे हाथ से बचा सका हो, फिर तुम्हारा परमेश्वर तुमको मेरे हाथ से कैसे बचा सकेगा?

15अब इस प्रकार हिजकिय्याह तुम्हें न तो धोखा देने पाए और न भरमाने पाए, और उन पर विश्वास मत करो, क्योंकि किसी जाति या राज्य का कोई देवता अपनी प्रजा को मेरे या मेरे पूर्वजों के हाथ से नहीं बचा सका है। तब फिर तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें मेरे हाथ से कैसे बचा पाएगा?”

16फिर उसके कर्मचारियों ने परमेश्वर यहोवा और उसके दास हिजकिय्याह के विरोध में और भी अधिक बातें कही।

17उसने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की निन्दा करते हुए और उसके विरोध में बोलते हुए ऐसे पत्र भी लिखे, “जिस प्रकार अन्य देशों की जातियों के देवता अपने लोगों को मेरे हाथ से न बचा सके, उसी प्रकार हिजकिय्याह का परमेश्वर भी अपने लोगों को मेरे हाथ से बचा नहीं सकेगा।”

18और उन्होंने इसे यहूदा की भाषा में जोर-जोर से पुकार कर यरूशलेम के उन लोगों को जो शहरपनाह पर थे यह कह सुनाया, कि वे उन्हें डरा कर घबरा दें जिससे कि वे नगर पर कब्जा कर ले।

19और उन्होंने यरूशलेम के परमेश्वर की ऐसी चर्चा की कि मानों वह पृथ्वी पर के लोगों के देवताओं के समान हो जो हाथों की कारीगरी है।

20परन्तु राजा हिजकिय्याह और आमोस के पुत्र यशायाह नबी ने इस विषय में प्रार्थना की और स्वर्ग की ओर दुहाई दी।

21तब यहोवा ने एक दूत को भेजा जिसने अश्शूर के राजा के हर एक शूरवीर, सेनापति और प्रधान को नष्ट किया। अतः वह लज्जित होकर अपने देश लौट गया। और जब उसने अपने देवता के मन्दिर में प्रवेश किया तो उसी के कुछ पुत्रों ने उसे तलवार से घात किया।

22इस प्रकार यहोवा ने हिजकिय्याह और यरूशलेम के सब निवासियों को अश्शूर के राजा सन्हेरीब के हाथों से और अन्य सब लोगों के हाथों से भी बचाया और चारों ओर उनकी अगुवाई की।

23तब बहुत लोग यरूशलेम में यहोवा के लिए भेंटें और यहूदा के राजा हिजकिय्याह के लिए बहुमूल्य उपहार लाने लगे; और इसके बाद वह सब जातियों की दृष्टि में महान् ठहरा।

24उन दिनों में हिजकिय्याह ऐसा बीमार पड़ा की मरने पर था। तब उसने यहोवा से प्रार्थना की और यहोवा ने उससे बातें करके उसे एक चिह्न दिया।

25परन्तु हिजकिय्याह ने अपने ऊपर किए गए उपकार का कोई बदला न दिया क्योंकि उसका मन फूल उठा था। इसलिए उस पर, यहूदा पर और यरूशलेम पर कोप भड़क उठा।

26फिर भी हिजकिय्याह और यरूशलेम के निवासी दोनों अपने मन के घमंड से पछता कर दीन हुए जिससे कि यहोवा का कोप हिजकिय्याह के दिनों में उन पर न भड़का।

27हिजकिय्याह को बहुत ही धन और सम्मान मिला और उसने अपने लिए चांदी, सोने, मणियों, सुगन्धित-द्रव्यों, ढालों, और सब प्रकार की अनमोल वस्तुओं के लिए कोषागार बनवाए।

28फिर उसने अन्न, दाखमधु तथा तेल के भंडार-गृह बनवाए और सब प्रकार के पशुओं तथा भेड़-बकरियों के लिए पशु-शालाएं बनवाईं।

29फिर उसने अपने लिए नगर बसाए और बहुत भेड़-बकरियां और गाय-बैल एकत्र कर लिए क्योंकि परमेश्वर ने उसे बहुत धन-सम्पत्ति दी थी।

30यह हिजकिय्याह ही था जिसने गीहोन सोते की ऊपरी धारा को बन्द करके उसे नीचे की ओर दाऊद नगर के पश्चिमी भाग तक पहुंचाया था। और हिजकिय्याह ने जो कुछ किया उसमें वह सफल हुआ।

31और जहां तक बेबीलोन के शासकों के दूतों का सम्बन्ध है जिन्हें उसने उस देश के अद्भुत कार्यों का पता लगाने के लिए भेजा था, परमेश्वर ने उसे इसलिए छोड़ दिया था कि उसे परखकर उसके मन का सारा भेद जान ले।

32हिजकिय्याह के शेष कार्य और उसके भक्ति के कार्य, देखो, वे सब आमोेस के पुत्र यशायाह नबी के दर्शन की पुस्तक और यहूदा और इस्राएल के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखे है।

33अतः हिजकिय्याह अपने पूर्वजों के साथ सो गया और उसे दाऊद की सन्तानों की कब्रों के ऊपरी भाग में मिट्टी दी गई; और यहूदा तथा यरूशलेम के सब निवासियों ने उसकी मृत्यु पर उसका सम्मान किया, और उसका पुत्र मनश्शे उसके स्थान पर राजा बना।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)