नया नियम · 2 कुरिन्थियों · अध्याय 12 / 13
2 कुरिन्थियों 12
1अब तो मुझे घमण्ड करना ही पड़ेगा। यघपि इस से कुछ लाभ नहीं, फिर भी प्रभु द्वारा दिए गए दर्शनों और प्रकाशनों में घमण्ड करूंगा।
2मैं मसीह में एक ऐसे मनुष्य को जानता हूं जो चौदह वर्ष पहिले-न जाने देह-सहित, न जाने देह-रहित, परमेश्वर ही जानता है-तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया।
3और मैं जानता हूं कि इस प्रकार यही मनुष्य-देह-सहित या देह-रहित मुझे नहीं मालूम, परमेश्वर जानता है-
4स्वर्गलोक में उठा लिया गया, और उसने ऐसी बातें सुनीं जो वर्णन से बाहर हैं, और जिन्हें मनुष्य को बोलने की अनुमति नही।
5ऐसे मनुष्य पर मैं घमण्ड करूंगा, परन्तु अपनी दुर्बलताओं को छोड़ अपने आप पर घमण्ड न करूंगा।
6यदि मैं घमण्ड करना चाहूं भी तो मूर्ख न ठहरूंगा, क्योंकि मैं सत्य ही कहूंगा। परन्तु मैं ऐसा नहीं करता जिस से कि कोई भी जैसा मुझ में देखता या मुझ से सुनता है उस से बढ़कर न समझे।
7प्रकाशनों की अधिकता के कारण मैं घमण्ड न करूं, इसलिए मेरी देह में एक कांटा चुभाया गया है, अर्थात् शैतान का एक दूत, कि वह मुझे दुख दे और घमण्ड करने से रोके रहे।
8मैंने इसके विजय में प्रभु से तीन बार प्रार्थना की कि यह मुझ से दूर हो जाए।
9और उसने मुझ से कहा, “मेरा अनुग्रह तेरे लिए पर्याप्त है, क्योंकि मेरा सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होता है।” अतः मैं सहर्ष अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा। जिससे कि मसीह का सामर्थ्य मुझमें निवास करे।
10इस कारण मैं मसीह के लिए निर्बलताओं, अपमानों, दुखों, सतावों और कठिनाइयों में प्रसन्न हूं, क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूं तभी सामर्थी होता हू।
11मैं मूर्ख बना। स्वयं तुम ही ने मुझे विवश किया। वास्तव में तुम्हें तो मेरी प्रशंसा करनी चाहिए थी। यघपि मैं कुछ भी नहीं, फिर भी उन महाप्रेरितों से किसी भी तरह कम नहीं हू।
12सच्चे प्रेरित केे लक्षण भी तुम्हारे मध्य में, चिह्नों, आश्चर्यकर्मोंं और चमत्कारों के साथ, बड़े धैर्य से प्रदर्शित किए गए।
13किस बात में तुम अन्य कलीसियाओं से तुच्छ समझे गए, सिवाय इसके कि मैं तुम पर भार न बना? मेरी इस भूल को क्षमा करो।
14अब तीसरी बार मैं तुम्हारे पास आने को तैयार हूं, और मैं तुम पर भार न बनूंगा, क्योंकि मैं तुम्हारी किसी वस्तु को नहीं, वरन् तुम्हें चाहता हू। क्योंकि बच्चों का यह उत्तरदायित्व नहीं कि माता-पिता के लिए धन बचा रखें, परन्तु माता-पिता बच्चों के लिए बचाते है।
15मैं बड़े हर्ष से तुम्हारी आत्माओं के लिए खर्च करूंगा और खर्च हो जाऊंगा। पर यदि मैं तुमसे अधिक प्रेम रखता हूं तो क्या मुझे कम प्रेम मिलना चाहिए?
16परन्तु माना कि मैंने तुम पर बोझ नहीं डाला। फिर भी मैं धूर्त हूं, न? मैंने धोखा देकर तुम्हें फँसा लिया!
17मैंने तुम्हारे पास जिनको भेजा था उनके द्वारा वास्तव में क्या तुमसे कोई अनुचित लाभ उठाया?
18मैंने तीतुस को और उसके साथ उस भाई को भी भेजा। क्या तीतुस ने तुमसे कोई अनुचित लाभ उठाया? क्या हमने भी उसी आत्मा के द्वारा आचरण नहीं किया और उन्हीं पद-चिह्नों पर न चले?
19इस समय तक तुम सोचते होगे कि हम तुम्हारे समक्ष अपने पक्ष का समर्थन कर रहे है। वास्तव में, परमेश्वर की उपस्थिति में, हम मसीह में बोलते रहे हैं, और हे प्रियो, यह सब तुम्हारी उन्नति के लिए ही है।
20जब मैं तुम्हारे पास आऊं तो मुझे डर है कि जैसा मैं चाहता हूं कहीं तुम्हें वैसा न पाऊं, और मैं भी वैसा न पाया जाऊं जैसा तुम चाहते हो, और ऐसा न हो कि तुम में कलह, ईर्ष्या, क्रोध, झगड़े, निन्दा, बकवाद, अहंकार और उपद्रव पाऊ।
21मुझे भय है, कहीं ऐसा न हो कि जब मैं फिर आऊं तो मेरा परमेश्वर मुझे तुम्हारे सामने दीन करे, और मैं उन बहुतों के लिए शोक करूं जिन्होंने पिछले दिनों में पाप किया और अपनी की हुई अशुद्धता, अनैतिकता और कामुकता से पश्चात्ताप नहीं किया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)