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पुराना नियम · 2 राजा · अध्याय 4 / 25

2 राजा 4

1नबियों के चेलों की पत्नियों में से एक स्त्री ने एलीशा से दुहाई देकर कहा, “तेरा दास मेरा पति मर गया है, और तू जानता है कि तेरा दास यहोवा का भय मानता था। अब साहूकार मेरे दोनों बच्चों को अपने दास बनाने के लिए लेने आया है”।

2एलीशा ने उससे कहा, “मैं तेरे लिए क्या करूं? मुझे बता, तेरे पास घर में क्या है?” उसने कहा, “तेरी दासी के घर में एक पात्र में तेल के अतिरिक्त कुछ नहीं है।”

3तब उसने कहा, “घर-घर जाकर अपने सब पड़ोसियों से अपने लिए खाली बर्तन मँाग ला, थोड़े-से बर्तन न लाना।

4फिर तू अपने पुत्रों के साथ भीतर जाना और द्वार बन्द करके इन सब बर्तनों में तेल उंडेलना, और जो भर जाएं उन्हें एक ओर रखते जाना।”

5अतः वह उसके पास से गई और अपने पुत्रों के साथ घर जाकर उसने द्वार बन्द किया। तब वे उसके पास बर्तन लाते गए और वह उंडेलती गई।

6और ऐसा हुआ कि जब सब बर्तन भर गए, उसने अपने पुत्र से कहा, “मेरे पास और बर्तन ला।” और पुत्र ने उससे कहा, “अब कोई और बर्तन नहीं रहा।” तब तेल रुक गया।

7फिर उसने जाकर परमेश्वर के जन को बतलाया। और उसने कहा, “जा, तेल बेच कर कर्ज चुका दे, और जो रह जाए उससे तू और तेरे पुत्र निर्वाह कर सकते है।”

8एक दिन एलीशा शूनेम को गया। वहां एक प्रतिष्ठित महिला रहती थी। उसने उससे भोजन करने के लिए आग्रह किया। अतः जब कभी वह वहां से निकलता तो भोजन करने के लिए वहां रुक जाता था।

9उस स्त्री ने अपने पति से कहा, “देख, यह जो हमारे यहां से होकर बहुधा आया जाया करता है, वह मुझे परमेश्वर का पवित्र जन लगता है।

10हम उसके लिए ऊपर एक पक्का, छोटा कमरा बनाएं और वहां उसके लिए पलंग, मेज, कुर्सी, और दीवट रख दें जिससे कि जब भी वह हमारे यहां आए, वहां ठहर सके।”

11एक दिन वह वहां आया, और उसने ऊपरी कक्ष में जाकर विश्राम किया।

12तब उसने अपने सेवक गेहजी से कहा, “इस शूनेमिन को बुला ला।” जब उसने उसे बुलाया तो वह आकर उसके सामने खड़ी हो गई।

13तब उसने गेहजी से कहा, “अब उससे कहः देख, तूने हमारा बड़ा ध्यान रखा। अब मैं तेरे लिए क्या करूं? क्या तू चाहती है कि राजा या सेनाध्यक्ष से तेरी सिफारिश की जाए?” उसने उत्तर दिया “मैं तो अपने ही लोगों के मध्य रहती हू।”

14फिर उसने कहा, “तब इसके लिए क्या किया जाए?” गेहजी ने कहा, “वास्तव में, इसके कोई पुत्र नहीं है और इसका पति वृद्ध है।”

15उसने कहा, “स्त्री को बुला।” जब उसने बुलाया तो वह द्वार पर आ खड़ी हुई।

16तब उसने कहा, “अगले वर्ष इसी ट्टतु में तू एक पुत्र को छाती से लगाएगी।” स्त्री ने कहा, “नहीं मेरे प्रभु, हे परमेश्वर के जन, अपनी दासी से झूठ न बोल।”

17जैसा कि एलीशा ने कहा था, वह स्त्री गर्भवती हुई और अगले वर्ष उसी ट्टतु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया।

18जब बालक बड़ा हो गया तो एक दिन वह अपने पिता के पास कटनी करने वालों के निकट गया।

19फिर वह अपने पिता से कहने लगा, “मेरा सिर! हाय, मेरा सिर!” उसने अपने सेवक से कहा, “इसे इसकी माता के पास ले जा।”

20जब वह उसे उसकी माता के पास ले गया, तो वह उसकी गोद में दोपहर तक बैठा रहा, तब उसकी मृत्यु हो गई।

21फिर वह ऊपर गई और उसे परमेश्वर के जन की शय्या पर लिटाकर तथा द्वार बन्द करके बाहर चली गई।

22तब उसने अपने पति को पुकारकर कहा, “एक सेवक और एक गदहे को मेरे पास भेज दे कि मैं परमेश्वर के जन के पास शीघ्र जाकर लौट आऊ।”

23और उसने कहा, “आज तू उसके पास क्यों जाना चाहती है? आज न तो नया चांद और न सब्त का दिन है।” उसने उत्तर दिया, “कुशल ही होगा।”

24तब उसने गदहे पर जीन कसकर सेवक से कहा, “हाँक और बढ़ा चल, और जब तक मैं न कहूं, मेरे लिए चाल धीमी न करना।”

25तब वह चलकर कर्मेल पर्वत पर परमेश्वर के जन के पास पहुँची। जब परमेश्वर के जन ने उसे दूर से देखा तो अपने सेवक गेहजी से कहा, “देख, वह शूनेमिन आ रही है।

26उससे भेंट करने दौड़ जा और पूछ, ‘तू कुशल से तो है? तेरा पति कुशल से तो है? तेरा बालक कुशल से तो है?” उसने उत्तर दिया, “कुशल है।”

27उसने पर्वत पर परमेश्वर के जन के पास पहुंचकर उसके पैर पकड़ लिए। उसे ढकेलकर हटाने के लिए गेहजी समीप आया, परन्तु परमेश्वर के जन ने कहा, “उसे छोड़ दे, क्योंकि उसका हृदय व्याकुल है, और यहोवा ने मुझसे यह बात छिपा रखी और मुझे नहीं बताई है।”

28तब उस स्त्री ने कहा, “क्या अपने प्रभु से मैंने पुत्र मांगा था? क्या मैंने कहा न था, कि मुझे धोखा न दे?”

29तब उसने गेहजी से कहा, “अपनी कमर बांध और मेरी लाठी अपने हाथ में ले और रवाना हो जा। यदि मार्ग में कोई मिले तो उसे नमस्कार न करना, यदि कोई तुझे नमस्कार करे तो उसे प्रत्युत्तर न देना; मेरी यह लाठी लड़के के मुख पर रख देना।”

30तब लड़के की माता ने कहा, “यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ, मैं तुझे नहीं छोड़ूंगी।” अतः वह उठकर स्त्री के साथ चल दिया।

31उनसे पहले पहुंचकर गेहजी ने लड़के के मुंह पर लाठी रखी, पर न तो कोई आव़ाज सुनाई दी और न कोई प्रतिक्रिया हुई। अतः वह उससे मिलने को लौटा और कहने लगा, “लड़का नहीं जागा।”

32जब एलीशा घर में आया, तो देखा, लड़का मरा हुआ मेरी शय्या पर पड़ा है।

33अतः उसने अकेले प्रवेश करके द्वार बन्द कर लिया और यहोवा से प्रार्थना की।

34तब वह चढ़कर लड़के पर लेट गया। उसने अपना मुंह उसके मुंह पर, आंखे उसकी आंखों पर, और हाथ उसके हाथ पर रख लिए और स्वयं उस पर पसर गया। इससे लड़के की देह गर्म हो गई।

35तब वह उठ कर घर में एक बार आगे-पीछे टहला, फिर चढ़कर उस पर पसर गया। तब लड़के ने सात बार छींका और आंखे खोल दी।

36और उसने गेहजी को बुलाकर कहा, “शूनेमिन को बुला।” उसने उसे बुलाया। जब वह उसके पास भीतर आई तो उसने कहा, “अपने पुत्र को उठा ले।”

37वह भीतर गई और उसके पैरों पर गिरकर उसने उसे दण्डवत् किया। फिर वह अपने पुत्र को उठाकर बाहर चली गई।

38जब एलीशा गिलगाल को लौटा, देश में अकाल फैला था। जबकि नबियों के चेले उसके सामने बैठे थे, उसने अपने सेवक से कहा, “बड़ा हंडा चढ़ाकर, नबियों के चेलों के लिए भोजन पका।”

39तब उनमें से कोई साग एकत्र करने के लिए जंगल में गया और एक जंगली लता पाकर उसमें से अपनी अंकवार भर जंगली कद्दू तोड़ ले आया। फिर आकर उसने उनको टुकड़े-टुकड़े करके हंडे में डाल दिया, क्योंकि किसी को मालूम नहीं था कि वे क्या है।

40तब उन्होंने लोगों के खाने के लिए उसमें से परोसा। और ऐसा हुआ कि जब वे खाने लगे तो चिल्ला उठे और कहने लगे, “हे परमेश्वर के जन, हंडे में मृत्यु है।” और वे उसे खा न सके।

41परन्तु उसने कहा, “आटा ले आओ।” तब उसने उसे हंडे में डालकर कहा, “उसे लोगों के लिए परोस दो कि वे खाए।” फिर हंडे में कोई हानिकर पदार्थ न रहा।

42तब कोई मनुष्य बाल-शालीशा से परमेश्वर के जन के लिए थैले में पहली उपज के फलों की रोटियां, जौ की बीस रोटियां तथा अनाज की ताजी बालें ले आया। उसने कहा, “इन्हें लोगों को दे कि वे खाए।”

43उसके सेवक ने कहा, “क्या मैं इसे सौ लोगों के लिए परोसूं?” परन्तु उसने कहा, “इन्हें लोगों को दे कि खाएं, क्योंकि यहोवा यों कहता हैः वे खाएंगे और बचा भी देंगे।”

44तब उसने उनके लिए परोसा और उन्होंने खाया, और यहोवा के वचन के अनुसार कुछ बच भी गया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)