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पुराना नियम · 2 शमूएल · अध्याय 18 / 24

2 शमूएल 18

1तब दाऊद ने अपने साथ के लोगों की गिनती की ओर सहस्रपति तथा शतपति नियुक्त किए।

2फिर दाऊद ने अपने लोगों की एक तिहाई को योआब के अधीन, और एक तिहाई को सरूयाह के पुत्र अबीशै अर्थात् योआब के भाई के अधीन, और तीसरी तिहाई को गती इत्तै के अधीन करके युद्ध करने के लिए भेज दिया। फिर राजा ने अपने लोगों से कहा, “निश्चय मैं स्वयं तुम्हारे साथ कूच करूंगा।”

3परन्तु लोगों ने कहा, “निस्सन्देह तू नहीं जाएगा। क्योंकि यदि हमें भागना भी पड़े तो वे हमारी कोई चिन्ता नहीं करेंगे, और यदि हम में से आधे भी मारे जाएं तो वे हमारे विषय में कोई चिन्ता नहीं करेंगे। परन्तु तू तो हमारे समान दस हज़ार के बराबर है, इसलिए अच्छा यह है कि तू नगर में से हमारी सहायता के लिए तैयार रहे।”

4राजा ने उनको उत्तर दिया, “तुमको जो अच्छा लगे वही मैं करूंगा।” अतः राजा फाटक की एक ओर खड़ा हो गया, और सब लोग सौ सौ और हज़ारझ़ार के दलों में निकल गए।

5राजा ने योआब, अबीशै और इत्तै को यह आज्ञा दी, “मेरे कारण उस जवान पुरुष अबशालोम के साथ कोमलता का व्यवहार करना।” जब राजा ने अबशालोम के विषय मेंं सेनापतियों को आज्ञा दी तब सब लोगों ने भी सुना।

6इस प्रकार लोग इस्राएल के विरुद्ध मैदान में निकल गए, और एप्रैम के जंगल में युद्ध हुआ।

7वहां दाऊद के लोगों के सामने इस्राएल के लोग पराजित हो गए, और उस दिन ऐसा बड़ा संहार हुआ कि बीस हज़ार लोग खेत हो गए,

8क्योंकि युद्ध उस सम्पूर्ण क्षेत्र में फैल गया था, और उस दिन तलवार से जितने लोग मारे गए उससे अधिक लोग जंगल का कौर बन गए।

9और संयोग से अबशालोम और दाऊद के लोगों का आमना-सामना हो गया। अबशालोम तो खच्चर पर सवार था, और खच्चर एक बड़े बांज वृक्ष की घनी डालियों के नीचे से गया। इससे उसका सिर उस वृक्ष में अटक गया जिससे वह आकाश और पृथ्वी के बीच अधर में लटका रह गया, पर जिस खच्चर पर वह बैठा था वह आगे निकल गया।

10किसी व्यक्ति ने इसे देख कर योआब को यह बताया, “देख, मैंने अबशालोम को एक बांज वृक्ष पर लटके देखा है।”

11योआब ने समाचार देने वाले से कहा, “जब तूने यह देखा तो उसे मारकर भूमि पर क्यों नहीं गिरा दिया? तब मैं तुझे चांदी के दस टुकड़े और एक कमरबन्द देता।”

12उस व्यक्ति ने योआब से कहा, “चाहे मेरे हाथ में चांदी के हज़ार टुकड़े भी दिए जाते फिर भी मैं राजा के पुत्र के विरुद्ध हाथ नही उठाता, क्योंकि हमारे सुनते राजा ने तुझको तथा अबीशै और इत्तै को आज्ञा दी थी, ‘सावधान, तुम में से कोई क्यों न हो उस जवान अबशालोम पर हाथ न उठाए।’

13यदि मैं छल से उसका प्राण लेता तो तू भी मेरा साथ न देता, क्योंकि राजा से तो कुछ छिपा नहीं रहता।”

14तब योआब ने कहा, “मैं यहां तेरे साथ यों ही ठहरा नहीं रह सकता।” अतः उसने हाथ में तीन भाले लिए और बांज वृक्ष पर जीवित लटके हुए अबशालोम के हृदय को छेद डाला।

15फिर योआब के हथियार ढोनेवाले दस जवानों ने अबशालोम को घेरकर मार डाला।

16इसके बाद योआब ने नरसिंगा फूंक दिया। तब लोग इस्राएल का पीछा करने से लौट आए, क्योंकि योआब ने लोगों को रोक लिया।

17फिर उन्होंने अबशालोम को ले जाकर वन के एक गहरे गड्हे में डाल दिया और उसके ऊपर पत्थरों का बड़ा ढेर लगा दिया। तब इस्राएल के सब लोग अपने-अपने तम्बू में भाग गए।

18अबशालोम ने तो अपने जीते-जी एक स्तम्भ खड़ा कराया था जो राजा की तराई में है, क्योंकि उसने सोचा था, “मेरे नाम की यादगार के लिए कोई पुत्र नहीं है।” अतः उसने उस स्तम्भ का नाम अपने ही नाम पर रखा जो आज भी अबशालोम का स्तम्भ कहलाता है।

19तब सादोक के पुत्र अहीमास ने कहा, “मुझे दौड़कर राजा को यह समाचार पहुंचाने दे कि यहोवा ने उसको उसके शत्रुओं के हाथ से छुड़ा लिया है।”

20परन्तु योआब ने उससे कहा, “तू आज समाचार न दे, पर किसी दूसरे दिन समाचार दे देना। आज तो तू कोई समाचार न दे, क्योंकि राजा का पुत्र मर गया है।”

21तब योआब ने एक कूशी से कहा, “जा, जो कुछ तू ने देखा है वह राजा को बता दे।” अतः योआब को प्रणाम करके कूशी दौड़ गया।

22तब सादोक के पुत्र अहीमास ने योआब से पुनः कहा, “चाहे कुछ भी हो, मुझे भी कूशी के पीछे दौड़ जाने दे।” योआब ने कहा, “हे मेरे बेटे, जब तेरे समाचार का कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा तब तू क्यों दौड़ जाना चाहता है?”

23उसने उत्तर दिया, चाहे जो हो मैं तो दौडूंगा।” अतः उसने कहा, “दौड़।” तब अहीमास मैदान के मार्ग से दौड़ा और कूशी से आगे बढ़ गया।

24दाऊद तो दो फाटकों के बीच बैठा था। और पहरुआ फाटक की छत पर शहरपनाह के पास चढ़ गया। वहां से उसने आंख उठाकर दृष्टि की, और देखो, एक व्यक्ति अकेला दौड़ता आ रहा था।

25पहरुए ने पुकार कर राजा को बताया। तब राजा ने कहा, “यदि वह अकेला आ रहा है तो शुभ सन्देश बताने वाला होगा।” और वह समीप आता गया।

26इसके बाद पहरुए ने एक और पुरुष को दौड़ते देखा। अतः पहरुए ने द्वारपाल को पुकारकर उससे कहा, “देख, एक और पुरुष अकेला दौड़ा आता है।” और राजा ने कहा, “यह भी शुभ सन्देश लाता होगा।”

27तब पहरुए ने कहा, “मुझे पहले का दौड़ना सादोक के पुत्र अहीमास के दौड़ने के समान दिखाई देता है।” राजा ने कहा, “यह तो भला मनुष्य है, और भला समाचार लेकर आता होगा।”

28अहीमास ने पुकार कर राजा से कहा, “सब कुशल है।” और उसने राजा के आगे मुंह के बल गिरकर उसे दण्डवत् किया। फिर उसने कहा, “तेरा परमेश्वर यहोवा धन्य है जिसने उन लोगों को तेरे वश में कर दिया है जिन्होंने मेरे स्वामी राजा के विरुद्ध हाथ उठाए।”

29इस पर राजा ने पूछा, “क्या वह जवान अबशालोम सकुशल है?” तब अहीमास ने उत्तर दिया, “जब योआब ने राजा के सेवक, अर्थात् मुझे तेरे दास को भेजा, उस समय मैंने बड़ी हलचल देखी, पर मुझे मालूम नहीं पड़ा कि वहां क्या हुआ था।”

30राजा ने आज्ञा दी, “हटकर यहां खड़ा रह।” अतः वह हटकर खड़ा रहा।

31और देखो, कूशी भी पहुंच गया, और कूशी ने कहा, “मेरा स्वामी राजा शुभ समाचार सुने। यहोवा ने आज तुझे उन सब लोगों के हाथ से छुड़ा लिया है जो तेरे विरुद्ध उठे थे।”

32तब राजा ने कूशी से पूछा, “क्या वह जवान अबशालोम सकुशल है?” और कूशी ने उत्तर दिया, “मेरे स्वामी राजा के सब शत्रुओं, और बुराई के लिए जितने तेरे विरुद्ध खड़े होते हैं उन सब की दशा उस जवान की-सी हो।”

33तब राजा अति बेचैन हो गया, और फाटक के ऊपर के कमरे की ओर रोते-रोते चढ़ने लगा। और चढ़ते-चढ़ते वह यों कहता गयाः “हाय मेरे बेटे अबशालोम, मेरे बेटे, मेरे बेटे अबशालोम! काश, तेरे बदले मैं मर गया होता! हाय अबशालोम, मेरे बेटे, मेरे बेटे!”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)