पुराना नियम · 2 शमूएल · अध्याय 22 / 24
2 शमूएल 22
1दाऊद ने यहोवा के सामने इस गीत के वचनों को उस दिन गाया जब यहोवा ने उसको उसके सब शत्रुओं और शाऊल के हाथों से छुटकारा दिया।
2उसने कहा, “यहोवा मेरी चट्टान, मेरा गढ़ और मेरा छुड़ानेवाला है,
3मेरा परमेश्वर, मेरी चट्टान जिसमें मैं शरण लेता हू। वह मेरी ढाल, मेरे उद्धार का सींग, मेरा दृढ़ गढ़ और मेरा शरणस्थान है। हे मेरे उद्धारकर्ता, तू ही मुझे हिंसा से बचाता है।
4मैं यहोवा को, जो स्तुति के योग्य है, पुकारता हूं, और मैं अपने शत्रुओं से छुड़ाया जाता हू।
5क्योंकि मृत्यु की लहरों ने मुझे घेर लिया, विनाश की प्रचण्ड धाराओं ने मुझे घबरा दिया,
6अधोलोक के बन्धनों ने मुझे चारों ओर से आ जकड़ा, और मृत्यु के फन्दे मेरे सामने आ पड़े।
7मैंने अपने संकट में यहोवा को पुकारा, हां, अपने परमेश्वर की दुहाई दी। उसने अपने मन्दिर में से मेरी आवाज़ सुनी, और मेरी दुहाई उसके कानों में पड़ी।
8तब पृथ्वी डोल गई और कांप उठी, आकाश की नेवें थरथराने लगीं, और हिल उठीं, क्योंकि वह क्रोधित हुआ था।
9उसके नथनों से धुआं निकल उठा, उसके मुंह से आग निकलकर भस्म करने लगी और उससे कोयले धधक उठे।
10ओर वह आकाश को नीचे झुका कर उतर आया, और उसके पैरों के नीचे गहन अन्धकार था।
11वह करूब पर सवार होकर उड़ा, वरन् पवन के पंखों पर प्रकट हुआ।
12उसने अन्धकार को, हां, जल भरे मेघों के समूह को, वरन् आकाश की काली घटाओं को अपने चारों ओर मण्डप बनाया।
13उसकी उपस्थिति के तेज से आग के अंगारे धधक उठे।
14यहोवा आकाश से गरजा, और परमप्रधान ने अपनी वाणी सुनाई।
15उसने तीर चला-चलाकर उन्हें तितर- बितर किया, और बिजली भी गिरा-गिराकर उनको खदेड़ दिया,
16तब यहोवा की डांट से और उसके नथनों की श्वास के झोंके से सागर के तल दिखाई दिए, जगत की नींव उघाड़ दी गई।
17उसने सर्वाच्च स्थान से हाथ बढ़ाकर मुझे थाम लिया, उसने मुझे अथाह जल में से खींच लिया।
18उसने मेरे बलवन्त शत्रु से, और उनसे जो मुझसे घृणा करते थे। मुझे छुड़ा लिया, क्योंकि वे मुझसे अधिक सामर्थी थे।
19मेरी विपत्ति के दिन वे मुझ पर टूट पड़े, परन्तु यहोवा मेरा आश्रय था।
20उसने मुझे निकालकर चौड़े स्थान में पहुंचाया, उसने मुझे छुड़ाया, क्येंकि वह मुझसे प्रसन्न था।
21यहोवा ने मेरी धार्मिकता के अनुसार मुझे प्रतिफल दिया है, मेरे हाथों की शुद्धता के अनुसार ही बदला दिया है।
22क्योंकि मैं यहोवा के मार्गों पर चलता रहा और अपने परमेश्वर के विरुद्ध मैंने दुष्टता का व्यवहार नहीं किया है।
23क्योंकि उसके सारे नियम मेरे सम्मुख थे, और मैं उसकी विधियों से नहीं हटा।
24मैं उसके सम्मुख निर्दोष बना रहा, और अधर्म के कार्यों; से दूर रहा।
25इसलिए यहोवा ने मेरी धार्मिकता के अनुसार मुझे बदला दिया - हां, उसकी दृष्टि में मेरी शुद्धता के अनुसार।
26दयालु के प्रति तूू अपने को दयालु दिखाता, खरे के प्रति तू अपने को खरा दिखाता है,
27शुद्ध के प्रति तू अपने को शुद्ध दिखाता है और टेढ़े के प्रति तू चतुर बनता है।
28क्योंकि तू दीन लोगों को तो बचाता है, परन्तु तेरी आंखें घमण्डियों पर लगी रहती हैं जिनको तू नीचा कर देता है।
29क्योंकि हे यहोवा, तू मेरा दीपक है, हां, यहोवा मेरे अन्धियारे को उजियाला कर देता है।
30क्योंकि तेरी सहायता से मैं सेना पर धावा कर सकता हूं, अपने परमेश्वर की सहायता से शहरपनाह को लांघ सकता हू।
31परमेश्वर का मार्ग तो सिद्ध है, यहोवा का वचन ताया हुआ है। जो उसमें शरण लेते हैं उन सबकी वह ढाल है।
32यहोवा को छोड़ कौन परमेश्वर है? हमारे परमेश्वर को छोड़ और कौन चट्टान है?
33परमेश्वर मेरा दृढ़ गढ़ है, वह निर्दोष को अपने मार्ग में स्थिर करता है।
34वह मेरे पैरों को हरिणी के पैरों के समान बनाता है, और मुझे मेरे ऊंचे स्थानों पर स्थिर कर देता है।
35वह मेरे हाथों को युद्ध की कला सिखाता है जिससे मेरी बांहें कांसे के धनुष को भी झुका देती है।
36तूने मुझे अपने उद्धार की ढाल भी दी है, और तेरी सहायता मुझे महान् बनाती है।
37मेरे कदम रखने के स्थानों को तू चौड़ा करता है और मेरे पैर फिसलते नही।
38मैंने अपने शत्रुओं का पीछा करके उनको नाश किया, और तब तक न लौटा जब तक उनका अन्त न कर डाला।
39मैंने उनको निगल लिया, और उन्हें ऐसा मारा कि वे फिर न उठ सके, वे मेरे पैरों के नीचे गिर पड़े।
40क्योंकि तूने युद्ध के लिए मेरी कमर सामर्थ्य से कसी है। जो मेरे विरुद्ध उठ खड़े हुए थे, उनको तूने मेरे वश में कर दिया।
41तू ने मेरे शत्रुओं की पीठ मेरी ओर फिरवा दी, और जो मुझसे घृणा करते थे उनको मैंने मिटा डाला।
42उन्होंने प्रतीक्षा की पर बचाने वाला कोई न था- हां, यहोवा की भी, पर उसने उन्हें उत्तर न दिया।
43तब मैंने उन्हें कूट-कूटकर भूमि की धूल के समान कर दिया, मैंने उन्हें गली-कूचों की कीचड़ के समान कुचल कर रौंद डाला।
44तूने मुझे प्रजा के आक्रमणों से छुड़ाया। तूने मुझे जाति जाति का प्रधान बनाए रखा है; जिस प्रजा को मैं जानता भी न था वह मेरी सेवा करती है।
45विदेशी दब कर मेरे अधीन हो जाते हैं, ज्योंही वे मेरा शब्द सुनते, वे मेरी आज्ञापालन करते है।
46विदेशियों का साहस चला जाता है, और वे अपने किलों में से कांपते हुए निकल आते है।
47यहोवा जीवित है, मेरी चट्टान धन्य हो! परमेश्वर की जो मेरे उद्धार की चट्टान है बड़ाई हो,
48हां, परमेश्वर की, जो मेरा बदला चुकाता है और देश-देश के लोगों को मेरे वश में कर देता है।
49वह मेरे शत्रुओं से मुझे छुड़ाता है; निःसन्देह जो मेरे विरुद्ध उठ खड़े होते हैं, तू मुझे उनसे भी ऊंचा उठाता है। तू मुझे क्रूर व्यक्ति के हाथों से बचाता है।
50इसलिए, हे यहोवा, मैं देश-देश के लोगों में तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की स्तुति के भजन गाऊंगा।
51वह अपने नियुक्त किए हुए राजा को महान् छुटकारा देता है, और अपने अभिषिक्त अर्थात् दाऊद और उसके वंश पर युगानुयुग करुणा करता रहेगा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)