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नया नियम · प्रेरितों के काम · अध्याय 11 / 28

प्रेरितों के काम 11

1फिर प्रेरितों तथा भाइयों ने जो सारे यहूदिया में थे सुना कि ग़ैरयहूदियों ने भी परमेश्वर का वचन ग्रहण कर लिया है।

2अतः जब पतरस यरूशलेम आया तो ख़तना किए हुए लोग उस से यह कहकर वाद-विवाद करने लगे,

3‘‘तू ने तो ख़तनारहित लोगों के यहाँ जाकर उनके साथ भोजन किया।”

4तब पतरस ने उन्हें क्रमानुसार सुनाना- समझाना आरम्भ किया,

5‘‘मैं याफा नगर में प्रार्थना कर रहा था। मैंने बेसुधि में एक दर्शन देखा कि एक बड़ी चादर के समान कोई वस्तु चारों कोनों से लटकी हुई आकाश से उतर रही है। वह ठीक मेरे पास आ गई,

6और जब मैंने उसको ध्यान से देखा तो उसमें पृथ्वी के चौपायों, वन-पशुओं और रेंगने वाले जन्तुओं और आकाश के पक्षियों को देखा।

7तब मुझे यह वाणी भी सुनाई दी, ‘पतरस, उठ! मार और खा।’

8परन्तु मैंने कहा, ‘हे प्रभु , कदापि नहीं! क्योंकि मेरे मुँह में कोई अपवित्र या अशुद्ध वस्तु कभी नहीं गई।’

9परन्तु दूसरी बार आकाश से एक वाणी हुई, ‘जिसे परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है उसे अशुद्ध मत कह।’

10तीन बार ऐसा ही हुआ, तब सब कुछ पुनः आकाश में उठा लिया गया।

11और देखो, ठीक उसी क्षण तीन व्यक्ति जो कैसरिया से मेरे पास भेजे गए थे उस घर के सामने आ खड़े हुए जहाँ हम ठहरे हुए थे।

12पवित्र आत्मा ने मुझ से कहा कि मैं बिना किसी संकोच के उनके साथ जाऊं और ये छः भाई भी मेरे साथ चले और हम उस मनुष्य के घर गए।

13उसने हमें बताया कि किस प्रकार उसने एक स्वर्गदूत को अपने घर में खड़े देखा और यह कहते सुना, ‘किसी को याफा भेजकर -शमौन को जो पतरस कहलाता है, यहाँ बुलवा ले।

14वह तुझे ऐसी बातें बताएगा जिनके द्वारा तू और तेरा सारा घराना उद्धार पाएगा।’

15और ज्योंही मैंने बोलना आरम्भ किया त्योंही पवित्र आत्मा उन पर भी उसी रीति से उतरा जिस प्रकार आरम्भ में हम पर उतरा था।

16तब प्रभु का वचन मुझे स्मरण आया जो वह कहा करता था, ‘यूहन्ना ने तो जल से बपतिस्मा दिया, परन्तु तुम पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाओगे।’

17अतः यदि परमेश्वर ने उन्हें भी वही वरदान दिया जो हमें प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने से प्राप्त हुआ था, तो मैं कौन था जो परमेश्वर को रोक सकता?”

18वे यह सुनकर चुप हो गए और परमेश्वर की महिमा करके कहने लगे, ‘‘तब तो परमेश्वर ने ग़ैरयहूदियों को भी जीवन के लिए मन-फिराव का वरदान दिया है।”

19अतः लोग उस क्लेश के कारण जो स्तिफनुस के सम्बन्ध में आरम्भ हुआ था तितर-बितर हो गए थे। वे चलते-चलते फीनीके, साइप्रस और अन्ताकिया पहुँचे तथा यहूदियों को छोड़ किसी और को वचन नहीं सुनाते थे।

20परन्तु उनमें से कुछ साइप्रसवासी और कुरेनी थे जो अन्ताकिया पहुंचकर यूनानियों को भी प्रभु यीशु का सुसमाचार सुनाने लगे।

21प्रभु का हाथ उन पर था, और बड़ी संख्या में लोग विश्वास करके प्रभु की ओर फिरे।

22जब उनकी चर्चा यरूशलेम की कलीसिया के कानों तक पहुंची तो उन्होंने बरनाबास को अन्ताकिया भेज दिया।

23जब उसने वहां पहुंच कर परमेश्वर के अनुग्रह को देखा तो वह आनन्दित हुआ तथा उन सब को प्रोत्साहित करने लगा कि वे सम्पूर्ण हृदय से प्रभु के प्रति विश्वासयोग्य बने रहे।

24क्योंकि वह एक भला मनुष्य था और पवित्र आत्मा तथा विश्वास से परिपूर्ण था। और बहुत-से लोग प्रभु के पास लाए गए।

25तब वह -शाऊल को ढूँढ़ने के लिए तरसुस गया।

26जब वह उसे मिल गया तो उसे अन्ताकिया ले आया। तब ऐसा हुआ कि वे पूरे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत-से लोगों को शिक्षा देते रहे। और चेले सब से पहिले अन्ताकिया में मसीही कहलाए।

27उन्हीं दिनों कुछ नबी यरूशलेम से अन्ताकिया आए।

28उनमें से अगबुस नामक एक व्यक्ति ने खड़े होकर पवित्र आत्मा की अगुवाई से बताया कि निश्चय ही सारे जगत में भयंकर अकाल पड़ेगा। और क्लौदियुस के शासन-काल में ऐसा ही हुआ।

29चेलों ने निर्णय किया कि प्रत्येक अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार यहूदिया में रहने वाले भाइयों के सहायतार्थ कुछ भेजे।

30उन्होंने ऐसा ही किया और बरनाबास तथा शाऊल के हाथ प्राचीनों के पास कुछ भेज दिया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)