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नया नियम · प्रेरितों के काम · अध्याय 15 / 28

प्रेरितों के काम 15

1कुछ लोग यहूदिया से आ कर भाइयों को सिखाने लगे, ‘‘जब तक मूसा की रीति के अनुसार तुम्हारा ख़तना न हो, तुम उद्धार नहीं पा सकते।”

2जब पौलुस और बरनाबास का उनके साथा मतभेद तथा वादविवाद हुआ तब भाइयों ने यह निश्चय किया कि पौलुस, बरनाबास तथा उनमें से कुछ अन्य लोग इस समस्या के सम्बन्ध में प्रेरितों और प्राचीनों के पास यरूशलेम जाए।

3अतः कलीसिया से विदाई पाकर वे फीनीके और सामरिया होते हुए सब भाइयों को ग़ैरयहूदियों के हृदय-परिवर्तन का विस्तारपूर्वक समाचार सुना-सुनाकर अत्यन्त आनन्द पहुंचा रहे थे।

4जब वे यरूशलेम पहुंचे तो उनका स्वागत कलीसिया, प्रेरितों तथा प्राचीनों द्वारा किया गया। तब उन्होंने वह सब कुछ कह सुनाया जो परमेश्वर ने उनके साथ किया था।

5परन्तु फरीसी पन्थ के कुछ विश्वासियों ने खड़े होकर उनसे कहा, ‘‘उनका ख़तना कराना तथा उन्हें मूसा की व्यवस्था को पालन करने का आदेश देना आवश्यक है।

6प्रेरित तथा प्राचीन इस विषय पर विचार करने के लिए एकत्रित हुए।

7जब बहुत वाद-विवाद हो चुका, तब पतरस ने खड़े होकर उनसे कहा, ‘‘भाइयो, तुम जानते हो कि बहुत दिनों पूर्व परमेश्वर ने तुम में से मुझे चुना कि ग़ैरयहूदी लोग मेरे मुंह से सुसमाचार का वचन सुनें और विश्वास करे।

8और परमेश्वर ने, जो हृदय को जानता है, हमारी ही तरह उन्हें भी पवित्र आत्मा देकर उनके पक्ष में गवाही दी।

9इस प्रकार विश्वास के द्वारा उनके हृदय को शुद्ध करके उसने हम में और उनमें कोई अन्तर नहीं रखा।

10अतः चेलों की गर्दन पर ऐसा जुआ रख कर जिसे न तो हमारे पूर्वज और न ही हम उठा सके हैं, अब क्यों परमेश्वर की परीक्षा करते हो?

11परन्तु हमें निश्चय है कि प्रभु यीशु के अनुग्रह से हमारा उद्धार उसी प्रकार हुआ है जिस प्रकार उनका।”

12तब सारी भीड़ चुपचाप बरनाबास और पौलुस द्वारा यह विवरण सुनने लगी कि परमेश्वर ने उनके द्वारा ग़ैरयहूदियों में कैसे कैसे अद्भुत चिह्न दिखाए और आशचर्यकर्म किए।

13जब वे बोल चुके तो याकूब ने उत्तर दिया, ‘‘भाइयो, मेरी सुनो!

14शमौन ने बताया है कि परमेश्वर ने अपने नाम के लिए बहुत दिनों पूर्व ग़ैरयहूदियों में से एक प्रजा को कैसे चुन लिया।

15इस बात से नबियों के वचन भी मिलते हैं जैसा कि लिखा है,

16‘इन बातों के पश्चात् मैं लौटूँगा, और मैं दाऊद के गिरे हूए तम्बू को फिर से खड़ा करूंगा, और उसके खण्डहरों का पुनर्निर्माण करूंगा, और मैं उसका जीर्णोद्धार करूंगा,

17जिससे कि शेज लोग भी और सब ग़ैरयहूदी भी जो मेरे नाम के कहलाते हैं, प्रभु की खोज करें-

18यह वही प्रभु कहता है जो प्राचीनकाल से इन बातों को प्रकट करता आया है।’

19अतः मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि हम उन्हें दुख न दें जो ग़ैरयहूदियों में से परमेश्वर की ओर फिरते है।

20परन्तु उन्हें लिख भेजें कि वे मूर्तियों की अशुद्धताओं से, व्यभिचार से और गला घोंटे पशुओं के मांस से और लहू से दूर रहे।

21क्योंकि प्राचीनकाल से नगर-नगर में मूसा की व्यवस्था के प्रचार करने वाले होते आए हैं, और प्रत्येक सब्त के दिन आराधनालयों में वही पढ़ी जाती है।”

22जब पूरी कलीसिया सहित प्रेरितों तथा प्राचीनों को यह उचित जान पड़ा कि अपने मध्य में से कुछ मनुष्यों को चुनकर, अर्थात् बरसब्बा कहलाने वाले यहूदा तथा सीलास को जो भाइयों में प्रमुख थे, उन्हें पौलुस तथा बरनाबास के साथ अन्ताकिया भेजे।

23उन्होंने उनके हाथ यह पत्र भेजाः ‘‘प्रेरितों तथा उन भाइयों की ओर से जो प्राचीन हैं अन्ताकिया, सीरिया और किलिकिया के भाइयों को जो ग़ैरयहूदियों में से हैं, नमस्कार।

24जब से हमने सुना कि हम में से कुछ ने हमारे आदेश बिना अपनी बातों से तुम्हें घबरा दिया और तुम्हारे मन को अस्थिर कर दिया है,

25एक मत होकर हम को यह उचित जान पड़ा कि अपने प्रिय बरनाबास तथा पौलुस के साथ कुछ व्यक्तियों को चुनकर तुम्हारे पास भेजे।

26ये ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम के लिए अपने प्राण जोखिम में डाले है।

27इसलिए हमने यहूदा और सीलास को भेजा है, जो स्वयं भी अपने मुंह से इन सारी बातों का समाचार देंगे।

28क्योंकि पवित्र आत्मा तथा हमको यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों को छोड़ तुम पर और कोई बोझ न डालें:

29कि तुम मूर्तियों पर बलिदान चढ़ाई गई वस्तुओं से, लहू से, गला घोंटे हुओं के मांस से, तथा व्यभिचार से परे रहो। इनसे बचे रहो तो तुम्हारा भला होगा। -शेज शुभ।”

30वे सब विदा होकर अन्ताकिया गए और वहां सभा बुलाकर उनको वह पत्र दिया।

31जब वे पत्र पढ़ चुके तो उस से प्रोत्साहन पाकर अति आनन्दित हुए।

32यहूदा और सीलास ने भी स्वयं नबी होने के नाते भाइयों को लम्बा उपदेश देकर प्रोत्साहित और दृढ़ किया।

33कुछ दिन वहां रहने के पश्चात् भाइयों ने शान्तिपूर्वक उनके भेजने वालों के पास उन्हें विदा किया।

34परन्तु सीलास को वहां रहना अच्छा लगा।

35पौलुस तथा बरनाबास भी अन्ताकिया में रह गए, और अन्य बहुत लोगों के साथ वे भी प्रभु के वचन की शिक्षा देते और उसका प्रचार करते रहे।

36कुछ दिनों पश्चात् पौलुस ने बरनाबास से कहा, ‘‘जिन जिन नगरों में हमने प्रभु का वचन सुनाया था, आओ वहां लौट कर भाइयों को देखें कि वे कैसे है।”

37बरनाबास अपने साथ मरकुस कहलाने वाले यूहन्ना को भी ले जाने का इच्छुक था।

38परन्तु पौलुस इस बात पर अड़ा रहा कि हम उस व्यक्ति को जिसने पंफूलिया से हमारा साथ छोड़ दिया था और जो हमारे साथ काम पर नहीं गया था, अपने साथ न ले जाए।

39इस पर उनके मध्य ऐसा बड़ा मतभेद उठ खड़ा हुआ कि वे एक दूसरे से अलग हो गए, और बरनाबास मरकुस को लेकर जलमार्ग से साइप्रस चला गया।

40परन्तु पौलुस ने सीलास को चुन लिया और भाइयों द्वारा प्रभु के अनुग्रह में सौंपे जाकर वह वहां से चल दिया।

41और सीरिया तथा किलिकिया में फिरता हुआ कलीसियाओं को स्थिर करता रहा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)