नया नियम · प्रेरितों के काम · अध्याय 5 / 28
प्रेरितों के काम 5
1परन्तु हनन्याह नामक एक व्यक्ति ने और उसकी पत्नी सफीरा ने कुछ भूमि बेच कर,
2उसके मूल्य में से कुछ अपने लिए रख छोड़ा-उसकी पत्नी को तो इसकी पूर्ण जानकारी थी-तब उसका कुछ भाग लाकर हनन्याह ने प्रेरितों के चरणों पर रख दिया।
3परन्तु पतरस ने कहा, ‘‘हनन्याह, शैतान ने तेरे मन में यह बात क्यों डाली कि तू पवित्र आत्मा से झूठ बोले और भूमि के मूल्य में से कुछ बचाकर रख ले?
4जब कि वह बिकी न थी तो क्या तेरी न थी? और बिक जाने के बाद भी क्या वह तेरे ही अधिकार में न थी? तू ने अपने मन में ऐसा करने का विचार क्यों किया? तू ने मनुष्यों से नहीं, परन्तु परमेश्वर से झूठ बोला है।”
5इन -शब्दों को सुनते ही हनन्याह गिर पड़ा और उसने दम तोड़ दिया और सब सुननेवालों पर बहुत भय छा गया।
6तब जवानों ने उठकर उसके -शव को कपड़े में लपेटा और बाहर ले जाकर उसे दप़फ़ना दिया।
7लगभग तीन घण्टे बीत जाने के पश्चात्, उसकी पत्नी इस घटना के विषय में कुछ न जानते हुए भीतर आई।
8तब पतरस ने उस से कहा, “मुझे बता कि क्या तू ने भूमि इतने ही में बेची थी?” उसने कहा, “हाँ, इतने में ही।”
9तब पतरस ने उस से कहा, “यह क्या बात है कि तुम दोनों ने साथ मिलकर प्रभु के आत्मा की परीक्षा करने की ठानी? देख, तेरे पति को दप़फ़नाने वालों के पैरों की आहट द्वार तक आ पहुंची है, वे तुझे भी बाहर ले जाएंगे।”
10वह तुरन्त उसके पैर के पास गिर पड़ी और उसने भी दम तोड़ दिया। जवानों ने भीतर आकर उसे भी मरा पाया, और बाहर ले जाकर उसके पति के पास दप़फ़ना दिया।
11इस से समस्त कलीसिया तथा सब सुनने वालों पर बड़ा भय छा गया।
12प्रेरितों के द्वारा लोगों के मध्य बहुत-से चिह्न और अद्भुत कार्य हो रहे थे; और वे सब एकचित्त होकर सुलैमान के ओसारे में एकत्रित हुआ करते थे।
13परन्तु औरों में से किसी को उनमें सम्मिलित होने का साहस नहीं हुआ; फिर भी लोग उनकी बड़ी प्रशंसा करते थे।
14प्रभु पर विश्वास करने वाले पुरफ़जों और स्त्रियों की भीड़ की भीड़ उनमें निरन्तर मिलती जा रही थी;
15यहाँ तक कि लोग बीमारों को भी सड़कों पर ला-लाकर चारपाइयों और बिछौनों पर लिटा दिया करते थे कि जब पतरस उधर से निकले तो कम से कम उसकी छाया ही उनमें से किसी पर पड़ जाए।
16यरूशलेम के आस-पास के नगरों से भी बहुत लोग बीमारों तथा दुष्टात्माओं से पीड़ित लोगों को लाया करते थे और वे सब बीमार चंगे हो जाते थे।
17परन्तु महायाजक और उस के सब सहयोगी अर्थात् सदूकियों के सम्प्रदाय के लोग उठ खड़े हुए, और ईर्ष्या से भरकर
18उन्होंने प्रेरितों को पकड़ा और उन्हें बन्दीगृह में डाल दिया।
19परन्तु रात में प्रभु के एक स्वर्गदूत ने बन्दीगृह का द्वार खोल दिया और उन्हें बाहर लाकर कहा,
20‘‘जाओ, मन्दिर में खड़े होकर लोगों को इस जीवन का सम्पूर्ण सन्देश सुनाओ।”
21यह सुनकर वे भोर होते ही मन्दिर में गए और उपदेश देने लगे। परन्तु जब महायाजक तथा उसके सहयोगी आए तो उन्होंने सभा बुलाई, अर्थात इस्राएल के प्राचीनों की महासभा, और उन्हें बन्दीगृह से ले आने का आदेश भेजा।
22परन्तु जो अधिकारी वहाँ गए, उन्होंने बन्दीगृह में उन्हें नहीं पाया और लौट कर समाचार दिया,
23‘‘हमने बन्दीगृह को अत्यन्त सुरक्षित रूप से बन्द किया हुआ तथा सिपाहियों को द्वार पर खड़े पाया। परन्तु जब हमने खोलकर देखा तो भीतर कोई न मिला।”
24जब मन्दिर के सिपाहियों के कप्तान ने तथा मुख्य याजकों ने ये बातें सुनीं तो वे अत्यधिक चिन्ता में पड़ गए कि अब क्या होगा।
25परन्तु किसी ने आकर उन्हें समाचार दिया, ‘‘देखो, जिन लोगों को तुमने बन्दीगृह में डाल दिया था, वे मन्दिर में खड़े होकर लोगों को उपदेश दे रहे हैं!”
26तब सिपाहियों के साथ कप्तान गया और बिना बल प्रयोग किए उन्हें ले आया, क्योंकि इन्हें लोगों से यह भय था कि कहीं वे हम पर पथराव न करे।
27जब ये ले आए तो महासभा के सामने उन्हें खड़ा कर दिया। तब महायाजक ने उनसे पूछा,
28‘‘हमने तुम्हें कठोर आदेश दिया था कि तुम इस नाम से उपदेश न देना, फिर भी देखो, तुमने सारे यरूशलेम को अपने उपदेशों से भर दिया है, और तुम इस व्यक्ति की मृत्यु का लहू हमारे सिर पर मढ़ना चाहते हो।”
29परन्तु पतरस और प्रेरितों ने उत्तर दिया, ‘‘हमारे लिए मनुष्यों की अपेक्षा परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना आवश्यक है।
30हमारे पूर्वजों के परमेश्वर ने उस यीशु को जिला उठाया जिसे तुमने क्रूस पर लटका कर मार डाला था।
31उसी को परमेश्वर ने अपने दाहिने हाथ पर अति महान करके प्रभु और उद्धारकर्ता ठहराया कि इस्राएल को पश्चात्ताप् और पापों की क्षमा प्रदान करे।
32हम इन सब बातों के साक्षी हैं और वैसे ही पवित्र आत्मा भी जिसे परमेश्वर ने अपनी आज्ञा का पालन करने वालों को दिया है।”
33परन्तु जब उन्होंने सुना तो वे तिलमिला उठे और उन्हें मार डालना चाहा।
34परन्तु गमलिएल नामक एक फरीसी ने जो व्यवस्था का शिक्षक और सब लोगों में आदरणीय था, महासभा में खड़े होकर आदेश दिया कि इन लोगों को थोड़ी देर के लिए बाहर निकाल दिया जाए।
35और उसने उनसे कहा, ‘‘हे इस्राएलियो, तुम इन लोगों से जो कुछ करना चाहते हो उसे सोच समझकर करो।
36क्योंकि कुछ समय पहिले थियूदास यह दावा करते हुए उठ खड़ा हुआ था कि मैं भी कुछ हूँ; और लगभग चार सौ मनुष्य उसके पीछे चल पड़े। परन्तु वह मार डाला गया तथा उसके सब अनुयायी तितर-बितर हुए और उनसे कुछ बन न पड़ा।
37उस व्यक्ति के बाद जनगणना के दिनों में गलील निवासी यहूदा उठ खड़ा हुआ और उसने कुछ लोगों को अपनी ओर कर लिया। वह भी मिट गया और उसके सब अनुयायी तितर-बितर हो गए।
38अतः इस मामले में भी मैं तुुमसे कहता हूँ कि इन मनुष्यों से दूर रहो और इनसे कोई मतलब न रखो; क्योंकि यदि यह योजना या कार्य मनुष्यों की ओर से हो तो मिट जाएगा;
39परन्तु यदि यह परमेश्वर की ओर से है तो तुम उन्हें मिटा न सकोगे। कहीं ऐसा न हो कि तुम परमेश्वर से भी लड़नेवाले ठहरो!”
40उन्होंने उसकी सलाह मान ली और प्रेरितों को भीतर बुलाकर उन्हें कोड़े मारे। तब यह आदेश देकर उन्हें छोड़ दिया कि यीशु के नाम से बिल्कुल बात न करे।
41अतः वे महासभा के सामने से आनन्द मनाते हुए चल दिए कि उसके नाम के लिए वे अपमान सहने के योग्य तो ठहरे।
42वे प्रतिदिन मन्दिर में और घर-घर में शिक्षा देने तथा यह उपदेश करने में लगे रहे कि यीशु ही मसीह है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)