पुराना नियम · दानिय्येल · अध्याय 10 / 12
दानिय्येल 10
1फ़ारस देश के राजा कुस्रू के राज्य के तीसरे वर्ष में दानिय्येल पर जो बेलतशस्सर भी कहलाता था, एक संदेश प्रकट किया गया। वह संदेश सच था और महासंघर्ष से सम्बन्धित था। उसने इस संदेश पर विचार किया और दर्शन के भेद को समझ लिया।
2उन दिनों में मैं, दानिय्येल पूरे तीन सप्ताह तक शोक करता रहा था।
3उन तीन सप्ताहों के पूरे होने तक न तो मैंने स्वादिष्ट भोजन किया और न मांस और मदिरा अपने मुंह में डाला, और न तेल लगाया।
4फिर पहले माह के चौबीसवें दिन जब मैं बड़ी नदी अर्थात् हिद्देकेल नदी के तट पर था,
5मैंने आंखें उठाकर दृष्टि की और देखो, एक पुरफ़ष था जो मलमल का वस्र पहने और उफाज के चोखे सोने का कमरबन्द बांधे हुए खड़ा था।
6उसकी देह फिरोजा के समान, उसके मुंह की चमक बिजली जैसी, उसकी आंखें जलती हुई मशालों के समान, उसकी भुजाएं और पैर चमकाए हुए कांसे के समान थे और उसके वचनों की आवाज़ गर्जन-सी थी।
7यघपि मुझ दानिय्येल ने ही वह दर्शन देखा और मेरे संगी साथियों ने नहीं फिर भी वे अत्यन्त भयभीत होकर छिपने के लिए भाग गए।
8अतः मैं अकेला रह गया और उस बड़े दर्शन को देखता रहा इससे मेरे चेहरे की चमक मृत्यु के पीलेपन में बदल गई और मेरी शक्ति जाती रही।
9पर मैंने उसके वचनों की आवाज सुनी, और सुनते ही भूमि पर मुंह के बल गिरा और औंधे मुंह गहरी नींद में पड़ा रहा।
10और देखो, एक हाथ ने मुझे छूकर थरथराते हुए घुटनों और हथेलियों के बल बैठा दिया।
11और उसने मुझसे कहा, “हे परम प्रिय दानिय्येल, जो बात मैं तुझसे कहने वाला हूं उसे समझ ले। सीधा खड़ा हो जा, क्योंकि मैं तेरे पास भेजा गया हू।” और जब वह मुझसे ये बातें कह चुका तो मैं कांपते हुए खड़ा हो गया।
12तब उसने मुझसे कहा, “हे दानिय्येल मत डर, क्योंकि पहले ही दिन जब तूने परमेश्वर के सामने अपने आपको दीन करके समझने-बूझने के लिए मन लगाया, तेरे वचन सुन लिए गए और तेरे वचनों के कारण ही मैं आया हू।
13फ़ारस राज्य का प्रधान तो इक्कीस दिन तक मुझे रोके रहा, परन्तु मुख्य प्रधानों में से मीकाएल मेरी सहायता करने आया क्योंकि फ़ारस के राजाओं ने मुझे रोक रखा था।
14अब मैं इसलिए आया हूं कि तेरे लोगाें के साथ अन्त के दिनों में जो बीते उसकी तुझे समझ दूं, क्योंकि यह दर्शन भविष्य में पूरा होगा।
15जब वह मुझसे ये बातें कह चुका, तब मैं भूमि की ओर सिर झुकाए अवाक् रह गया।
16तब किसी ने जो मनुष्य समान था, मेरे होठों को छुआ, और मैं बोलने लगा। जो मेरे सामने खड़ा हुआ था, मैंने उससे कहा, “हे मेरे प्रभु, दर्शन के कारण व्यथा ने मुझे जकड़ लिया है और मुझमें कोई शक्ति नहीं रही।
17क्योंकि मेरे प्रभु का, मुझ जैसा सेवक, अपने प्रभु जैसे, किसी से बात कैसे करे, मुझमें न तो बल रह गया, न सांस ही रह गई है।”
18“तब उसने जो मनुष्य के समान था, मुझे पुनः छूकर बल दिया,
19और कहा, “हे परम प्रिय पुरफ़ष, मत डर। तुझे शान्ति मिले। दृढ़ होकर हियाव बांध!” उसके यह कहते ही मुझे बल मिला और मैंने कहा, “हे मेरे प्रभु, बोल, क्योंकि तूने मुझे बल दिया है।”
20तब उसने पूछा, “क्या तू जानता है कि मैं तेरे पास क्यों आया हूं? अब मैं फ़ारस के प्रधान से युद्ध करने के लिए लौटूंगा। मैं तो जाता हूं, और देख, यूनान का प्रधान आने वाला है।
21फिर भी सत्य की पुस्तक में जो कुछ लिखा है, वह मैं तुझे बताऊंगा। तेरे प्रधान मीकाएल को छोड़, उन प्रधानों के विरफ़द्ध मेरा साथ देने वाला कोई भी नही।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)