पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 11 / 34
व्यवस्थाविवरण 11
1“इसलिए तू अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम रखना, और उसके दायित्वों, उसकी विधियों, उसके नियमों, और उसकी आज्ञाओं का सदा पालन करना।
2आज जान लो कि मैं तुम्हारी सन्तान से यह नहीं कह रहा हूं जिन्होंने तुम्हारे परमेश्वर यहोवा को न तो जाना और न उसकी ताड़ना को देखा है अर्थात् उसकी महानता को, उसके सामर्थी हाथ को, और उसकी बढ़ाई हुई भुजा को,
3और उन अद्भुत चिह्नों और कार्यों को जो उसने मिस्र में मिस्र के राजा फि़रौन और उसके सम्पूर्ण देश के साथ किए;
4और उसने मिस्र की सेना, उसके घोड़ों तथा रथों के साथ क्या किया, अर्थात् जब वे तुम्हारा पीछा कर रहे थे, तब उसने किस प्रकार लाल समुद्र के जल को उनके ऊपर से बहा दिया, और यहोवा ने उनका कैसा सर्वनाश किया।
5तथा उसने इस स्थान में पहुंचने तक जंगल में तुम्हारे साथ क्या-क्या किया,
6तथा रूबेनी एलीआब के पुत्रों, दातान और अबीराम के साथ क्या-क्या किया जब इस्राएल के सामने धरती ने अपना मुंह खोलकर उनको, उनके परिवारों, उनके तम्बुओं, और उनके प्रत्येक जीवित प्राणी को निगल लिया-
7परन्तु तुमने अपनी ही आंखों से यहोवा के लिए किए हुए इन सब महान् कार्योर्ं को देखा है।
8“इसलिए जो-जो आज्ञा आज मैं तुमको दे रहा हूं उसे माना करना कि तुम सामर्थी होकर उस देश में जिसे अधिकार में करने के लिए तुम पार जाने वाले हो, प्रवेश करके उसे अपने अधिकार में कर लो,
9और उस देश में बहुत दिन रहने पाओ, जिसे तुम्हारे पूर्वजों और उनके वंशजों को देने की शपथ यहोवा ने उनसे खाई थी-ऐसा देश जिसमें दूध और मधु की धाराएं बहती है।
10क्योंकि जिस देश को अधिकार में करने के लिए तुम उसमें प्रवेश कर रहे हो वह मिस्र देश के समान नहीं है जिसमें से तुम आए हो। वहां तो तुम अपना बीज बोते तथा साग-सब्जी के खेत के समान उसे अपने ही पैरों से नालियां बनाकर सींचते थे।
11परन्तु जिस देश को अधिकार में करने के लिए तुम पार जाने वाले हो वह पहाड़ियों तथा तराइयों का देश है और आकाश की वर्षा से सिंचता है।
12वह ऐसा देश है जिसकी देखभाल तुम्हारा परमेश्वर यहोवा करता है। वर्ष के आरम्भ से अन्त तक उस पर तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि निरन्तर लगी रहती है।
13“यदि तुम मेरी आज्ञाओं को जिन्हें मैं आज तुम्हें देता हूं आज्ञाकारी मन से सुनो अर्थात् अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम करो तथा अपने सारे हृदय से और सारे मन से उसकी उपासना करो,
14तब ‘मैं तुम्हारे देश के लिए वर्षा, हां, प्रथम और अन्तिम वर्षा उनकी अपनी-अपनी ट्टतु में भेजूंगा जिससे तुम अपना अन्न, अपना नया दाखमधु और तेल जमा कर सको।
15और मैं तुम्हारे पशुओं के लिए तुम्हारे खेतों में घास उगाऊॅंगा, और तुम भोजन-वस्तु खाकर तृप्त होओगे।’
16सावधान, ऐसा न हो कि तुम्हारे मन धोखा खाएं, और तुम बहक कर पराए देवताओं की पूजा और उनकी उपासना करने लगो।
17और यहोवा का क्रोध तुम्हारे विरफ़द्ध भड़क उठे, तथा वह आकाश को बन्द कर दे जिससे वर्षा न हो, और भूमि अपनी उपज न दे, तथा तुम उस उत्तम देश से जो यहोवा तुम्हें देने वाला है शीघ्र नष्ट हो जाए।
18“इसलिए तुम मेरे इन वचनों को अपने हृदय और अपने प्राण में धारण करना, तथा उनको अपने हाथों पर चिह्न-स्वरूप बांधना, तथा वे तुम्हारी आंखों के बीच टीके का काम दे।
19तुम ये बातें अपने-अपने बच्चों को सिखाना। अपने घर में बैठे, मार्ग पर चलते और लेटते-उठते इन बातों की चर्चा किया करना,
20और तुम इनको अपने-अपने घर की चौखटों तथा फाटकों पर लिखना,
21जिससे जब तक पृथ्वी पर आकाश स्थिर है तुम्हारी और तुम्हारी सन्तान की आयु उस देश में बढ़े जिसको परमेश्वर ने तुम्हारे पूर्वजों को देने की शपथ खाई थी।
22यदि तुम इन सब आज्ञाओं को, जिनकी आज्ञा मैं तुम्हें दे रहा हूं, मानने में चौकसी करके उन्हें पूरी करो, अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम रखो, उसके सब मार्गोर्ं पर चलो तथा उससे लिपटे रहो,
23तो यहोवा इन सब जातियों को तुम्हारे सामने से निकल भगाएगा, तथा तुम अपने से बड़ी और सामर्थी जातियों पर अधिकार कर लोगे।
24जिस-जिस स्थान पर तुम्हारे पैर के तलवे पड़ें वह तुम्हारा हो जाएगा। तुम्हारी सीमा मरफ़स्थल से लेबनोन तक, तथा फरात महानद से पश्चिमी सागर तक होगी।
25कोई मनुष्य तुम्हारे सामने खड़ा नहीं रह सकेगा। उस देश में जहां-जहां तुम पैर रखोगे तुम्हारा परमेश्वर यहोवा अपने वचन के अनुसार तुम्हारे कारण आतंक और भय उत्पन्न करेगा।
26“देखो, मैं आज तुम्हारे सामने आशीष और शाप दोनों रखता हूं:
27यदि तुम अपने परमेश्वर यहोवा की उन आज्ञाओं को जो मैं आज तुम्हें देता हूं सुनो, तो तुम्हें आशीष मिलेगी,
28परन्तु यदि तुम अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं को न सुनो, और जिस मार्ग पर चलने की आज्ञा आज मैं तुम्हें देता हूं उस मार्ग को त्याग कर पराए देवताओं के पीछे चलने लगो जिनको तुम नहीं जानते तो तुम पर शाप पड़ेगा।
29तब ऐसा होगा कि जब तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुमको उस देश में पहुंचा दे जिसको अधिकार में करने के लिए तुम उसमें प्रवेश करने पर हो, तब तुम गिरिज्जीम पर्वत पर से आशीष, तथा एबाल पर्वत पर से शाप सुनाना।
30क्या वे यरदन के उस पार, सूर्यास्त की ओर पश्चिम के मार्ग में अराबा में निवास करने वाले कनानियों के देश में, गिलगाल के सामने मोरे के बांज वृक्षों के पास नहीं हैं?
31तुम तो यरदन पार करने वाले हो कि जाकर उस भूमि पर अधिकार करो जो तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हें देता है। तुम उस पर अधिकार करके उसमें निवास करो।
32अतः जिन विधियों और नियमों को आज मैं तुम्हारे सामने रखता हूं, उन्हें पूरा करने की चौकसी करना।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)