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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 26 / 34

व्यवस्थाविवरण 26

1“फिर ऐसा हो कि जब तू उस देश में प्रवेश करे जिसे तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उत्तराधिकार में दे रहा है और तू उसको अधिकार में करके उसमें रहने लगे,

2तब जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसकी भूमि की सब प्रकार की पहली उपज जो तुम घर लाओगे उसमें से कुछ-कुछ लेकर टोकरी में रखना और उस स्थान पर ले जाना जिसे तेरा परमेश्वर यहोवा अपना नाम बनाए रखने के लिए चुन लेगा।

3उन दिनों जो याजक हो उसके पास तू जाकर कहना, ‘मैं आज के दिन अपने परमेश्वर यहोवा के सामने यह घोषित करता हूं कि जिस देश को देने के लिए यहोवा ने हमारे पूर्वजों से शपथ खाई थी उसमें मैंने प्रवेश कर लिया है।’

4तब याजक तेरे हाथ से टोकरी को लेकर तेरे परमेश्वर यहोवा की वेदी के सामने रख दे।

5तब तू अपने परमेश्वर यहोवा के सामने यह कहना, ‘मेरा पिता भ्रमणशील अरामी था। उसने अपने छोटे-से परिवार के साथ मिस्र जाकर वहां प्रवास किया। परन्तु वहां उससे एक महान, सामर्थी तथा बहुसंख्यक जाति उत्पन्न हुई।

6तब मिस्रियों ने हमारे साथ कठोरता का व्यवहार किया, हमें दुख दिया तथा हमसे कठिन सेवा ली।

7तब हमने अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा की दुहाई दी, और यहोवा ने हमारी सुनकर हमारे संकट, हमारे परिश्रम और हमारे ऊपर हो रहे अत्याचार को देखा।

8फिर यहोवा अपने सामर्थी हाथ तथा बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा भयानक आतंक, चिह्नों तथा चमत्कारों के साथ हमको मिस्र से निकाल ले आया,

9और उस स्थान में पहुँचाकर उसने यह देश दे दिया है जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती है।

10और अब देख, हे यहोवा, जो भूमि तूने मुझे दी है उसकी पहली उपज मैं लाया हू।’ फिर इसे तू अपने परमेश्वर यहोवा के सामने रख देना तथा अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना करना।

11तब जितनी भली वस्तुएं तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझको तथा तेरे परिवार को दी हैं, उन सब के लिए तू, लेवीय और अपने मध्य रहने वाले परदेशी के साथ मिलकर आनन्द मनाना।

12“जब तू तीसरे वर्ष, अर्थात् दशमांश देने के वर्ष में, अपनी सब प्रकार की बढ़तियों का दशमांश निकाल चुके तो उसे लेवीय, परदेशी, अनाथ और विधवा को देना कि वे तेरे फाटकों के भीतर खाकर तृप्त हो।

13तब तुम अपने परमेश्वर यहोवा के सामने कहना, ‘जो-जो आज्ञा तूने मुझे दी हैं उन सब के अनुसार मैंने पवित्र भाग को अपने घर से अलग करके लेवीय, परदेशी, अनाथ तथा विधवा को दे दिया है। मैंने तेरी किसी भी आज्ञा को न तो टाला है और न विस्मृत किया है।

14उस भाग में से मैंने न तो अपने शोक के समय कुछ खाया है, न तो कोई वस्तु मैंने अशुद्धता की दशा में निकाली है, और न किसी मृतक के लिए कुछ दिया है। मैंने अपने परमेश्वर यहोवा की सुनी है। जो-जो आज्ञा तूने मुझे दी हैं, उन सबके अनुसार मैंने किया है।

15तू अपने पवित्र निवासस्थान स्वर्ग में से दृष्टि करके अपनी प्रजा इस्राएल को आशीष दे-अपनी उस शपथ के अनुसार जो तूने हमारे पूर्वजों से खाई थी इस भूमि को अर्थात् इस देश को जिसमें दूध और मधु की धाराएं बहती हैं, आशीषित कर।’

16“आज के दिन तेरा परमेश्वर यहोवा इन विधियों और नियमों के पालन करने की तुझे आज्ञा देता है। अतः तू अपने सारे मन और सारे प्राण से इनका पालन करने में चौकसी करना।

17आज तूने यहोवा को अपना परमेश्वर घोषित किया है, और यह कि तू उसके मार्गों पर चलेगा तथा उसकी विधियों, आज्ञाओं और नियमों को मानेगा, तथा उसकी सुनेगा।

18यहोवा ने भी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार आज तुझे अपनी प्रजा, वरन् अनमोल सम्पत्ति कहा है, और कि तू उसकी सब आज्ञाओं को माना करे,

19और यह भी कि जितनी जातियां उसने बनाई हैं उन सबमें वह तुझे ही अधिक प्रशंसा, प्रसिद्धि और सम्मान प्रदान करेगा, और तू उसके कहे अनुसार अपने परमेश्वर यहोवा के लिए पवित्र प्रजा ठहरे।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)