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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 30 / 34

व्यवस्थाविवरण 30

1“ अतः ऐसा होगा कि जब आशीष तथा शाप की ये सब बातें जो मैंने तेरे सामने प्रस्तुत की हैं तुझ पर आ जाएं और जिन सब जातियों के मध्य तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे निर्वासित किया हो वहां तू उनका स्मरण करे,

2और तू अपनी सन्तान सहित अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरे, और जिन बातों का आदेश मैं आज दे रहा हूं, उन सब के अनुसार अपने सारे मन और प्राण से उसकी सुने,

3तो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे तेरी बंधुवाई से लौटा ले आएगा तथा तुझ पर तरस खाकर उन सब जातियों में से पुनः एकत्रित करेगा जहां तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे तितर- बितर किया था।

4चाहे तेरे निष्कासित लोग पृथ्वी के छोर तक बिखरे हों फिर भी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे वहां से भी एकत्रित करके पुनः लौटा ले आएगा।

5और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उस देश में ले आएगा जो तेरे पूर्वजों के अधिकार में था तथा तू उसको अपने अधिकार में कर लेगा, वह तुझे तेरे पूर्वजों से अधिक समृद्ध करेगा तथा संख्या में बढ़ाएगा।

6फिर तेरा परमेश्वर यहोवा तेरा तथा तेरी सन्तान के मन का ख़तना करेगा कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण से प्रेम करे जिससे तू जीवित रहे।

7तब तेरा परमेश्वर यहोवा ये सब शाप तेरे शत्रुओं, तेरे सताने वालों तथा घृणा करने वालों पर डालेगा।

8तब तू फिर यहोवा की सुनेगा, और उसकी उन सब आज्ञाओं का पालन करेगा जिनका आदेश मैं आज दे रहा हू।

9और तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे हाथ के सब कार्यों, तेरी सन्तानों, तेरे मवेशियों तथा तेरी भूमि की उपज में तेरी भलाई के लिए बहुतायत की वृद्धि करेगा, क्योंकि यहोवा तेरी भलाई करने से वैसा ही आनन्दित होगा जैसा तेरे पूर्वजों से था

10यह तभी होगा यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की सुनकर उसकी उन आज्ञाओं तथा विधियों का पालन करे जो व्यवस्था की इस पुस्तक में लिखी गई हैं तथा अपने परमेश्वर यहोवा की ओर अपने सारे मन और प्राण से फिरे।

11“जो आज्ञा मैं आज तुझे देता हूं, वह न तो तेरे लिए बहुत कठिन है न तुझसे परे है।

12यह स्वर्ग में नहीं है कि तू कहे, ‘कौन स्वर्ग पर चढ़कर उसे हमारे लिए उतार लाएगा तथा हमें सुनाएगा कि हम उसका पालन करें?’

13न वह समुद्र-पार है कि तू कहे, ‘कौन समुद्र-पार जाकर उसे हमारे लिए लाएगा तथा हमें सुनाएगा कि हम उसका पालन करें?’

14परन्तु यह वचन तेरे अति निकट, वरन् तेरे मुंह तथा तेरे मन ही में है कि तू उसका पालन करे।

15“देख, आज मैंने तेरे सामने जीवन और समृद्धि तथा मृत्यु और विपत्ति रखी है।

16क्योंकि आज मैं तुझे आज्ञा देता हूं कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम करना, उसके मार्गों पर चलना तथा उसकी आज्ञाओं, उसकी विधियों और उसके नियमों को मानना कि तू जीवित रहे तथा फले-फूले, और तेरा परमेश्वर यहोवा उस देश में तुझे आशीष दे जिसे तू अधिकार में करने के लिए उसमें प्रवेश करने पर है।

17परन्तु यदि तेरा मन भटक जाए और तू आज्ञाकारी न रहे, और पराए देवताओं की ओर आकर्षित होकर उनकी आराधना और उपासना करने लग जाए,

18तो मैं आज तुझ को जता देता हूं कि तू निश्चय नष्ट हो जाएगा। जिस देश में प्रवेश करके तू उसे अपने अधिकार में करने के लिए यरदन पार करने पर है उस देश में बहुत दिन नहीे रहने पाएगा।

19आज मैं स्वर्ग तथा पृथ्वी को तुम्हारे विरफ़द्ध साक्षी ठहराता हूं कि मैंने तुम्हारे सामने जीवन तथा मृत्यु, और आशीष तथा शाप रखा है, अतः जीवन को चुन ले कि तू अपनी सन्तान सहित जीवित रहेः

20अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम करना, उसकी सुनना तथा उससे लिपटे रहना, क्योंकि यही तेरा जीवन और तेरे लिए दीर्घायु है कि तू उस देश में निवास करने पाए जिसे यहोवा ने तेरे पूर्वजों अर्थात् इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब को देने की शपथ खाई थी।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)