पुराना नियम · सभोपदेशक · अध्याय 9 / 12
सभोपदेशक 9
1इन सब बातों पर मैंने मन लगाकर विचार किया है, और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि धर्मी मनुष्य, बुद्धिमान मनुष्य तथा उनके कार्य परमेश्वर के हाथ में है। मनुष्य के जीवन में कुछ भी हो सकता है, पर वह नहीं जानता कि प्रेम होगा या बैर।
2यह सबके लिए एक समान होता है। धर्मी और दुष्ट, भले, शुद्ध या अशुद्ध; बलिदान चढ़ाने वाला या बलिदान नहीं चढ़ाने वाला दोनों का एक ही परिणाम होता है, जैसे भले मनुष्य का वैसे ही पापी मनुष्य का, जैसे शपथ खाने वाले का वैसा ही शपथ से डरने वाले का।
3सूर्य के नीचे जो कुछ होता है उसमें यह बुराई है कि सब मनुष्यों का एक ही परिणाम है। इसके अतिरिक्त मनुष्यों के मन बुराई से भरे रहते हैं और उनके हृदय में जीवन-भर पागलपन समाया रहता है। बाद में वे मृतकों के पास चले जाते है।
4जो जीवितों के साथ रहता है उसके लिए आशा होती है; निश्चय जीवित कुत्ता मृतक सिंह से अधिक अच्छा है।
5क्योंकि जीवित जानते हैं कि वे मरेंगे; परन्तु मृतक कुछ भी नहीं जानते, और न उनके लिए आगे कोई और प्रतिफल है, क्योंकि उनका स्मरण भी जाता रहा।
6सचमुच उनका प्रेम, उनका बैर और उनका उत्साह सब नष्ट हो चुका है, और सूर्य के नीचे जो कुछ किया जाता है उसमें अब से उनका कोई भाग नहीं होगा।
7जा, अपनी रोटी आनन्द से खा, और प्रसन्न-मन से अपनी मदिरा पी, क्योंकि परमेश्वर तेरे कामों के लिए छूट दे चुका है।
8तेरे वस्त्र हर समय श्वेत रहें, और तेरे सिर पर तेल का अभाव न हो।
9अपने व्यर्थ जीवन में जो उसने सूर्य के नीचे तेरे लिये निर्धारित किए हैं, अपनी पत्नी के संग, जिससे तू प्रीति रखता है, जीवन का आनन्द ले, क्योंकि यही तेरे उस परिश्रम का प्रतिफल है जो तूने अपने जीवन में इस सूर्य के नीचे किया है।
10तेरे हाथों को जो कुछ भी करने को मिले, सचमुच, उसे अपने शक्ति-भर कर; क्योेंकि अधोलोक में जहां तू जा रहा है न कोई क्रियाकलाप है, न युक्ति, न बुद्धिमानी।
11सूर्य के नीचे मैंने यह भी देखा कि दौड़ में जीत तेज दौड़ने वाले को नहीं, युद्ध में विजय शूरवीर को नहीं, रोटी बुद्धिमान को नहीं, धन-सम्पत्ति समझदारों को नहीं और न अनुग्रह योग्यता-सम्पन्न को मिलता है; क्योंकि समय और संयोग सबको पार कर जाते है।
12फिर यह भी कि मनुष्य अपना समय नहीं जानताः जैसे मछलियां धोखे के जाल में, और पक्षी फंदे में फंस जाते हैं, वैसे ही मनुष्य ऐसे बुरे समय के फंदे में फंस जाते हैं जो उन पर अचानक आ पड़ता है।
13मैं सूर्य के नीचे यह बुद्धिमानी भी देखने पाया और इससे मैें बहुत प्रभावित हुआ।
14एक छोटा नगर था जिसमें मुट्ठी-भर लोग रहते थे। एक बड़े राजा ने आकर उसे घेर लिया, और उसके विरफ़द्ध विशाल मोर्चाबन्दी कर ली।
15परन्तु उसमें एक गरीब बुद्धिमान व्यक्ति पाया गया और उसने अपनी बुद्धिमानी से उस नगर को बचा लिया। फिर भी किसी ने उस गरीब को स्मरण नहीं किया।
16अतः मैंने कहा, “बुद्धि शक्ति से श्रेष्ठ है।” परन्तु गरीब मनुष्य की बुद्धि तुच्छ समझी जाती, और उसके वचनों पर ध्यान नहीं दिया जाता।
17शान्ति में सुने गए बुद्धिमान के वचन मूर्खों के मध्य शासक की चिल्लाहट से अधिक अच्छे है।
18युद्ध के अस्र-शस्रों से बुद्धि उत्तम है; परन्तु एक पापी बहुत से अच्छे कार्यों का विनाश कर देता है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)