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पुराना नियम · एस्तेर · अध्याय 8 / 10

एस्तेर 8

1उस दिन राजा क्षयर्ष ने यहूदियों के शत्रु हामान का घर एस्तेर रानी को दे दिया और मोर्दकै तो राजा के सम्मुख उपस्थित हुआ, क्योंकि एस्तेर ने यह प्रकट कर दिया था कि मोर्दकै का मुझसे क्या सम्बन्ध है।

2और राजा ने अपनी वह अंगूठी जो उसने हामान से ले ली थी उतारकर मोर्दकै को दे दी। एस्तेर ने हामान का घर मोर्दकै के हाथ में सौंप दिया।

3तब एस्तेर ने राजा से फिर बातें की। वह उसके पैरों पर गिरकर रोई और गिड़गिड़ाकर उससे निवेदन करने लगी कि अगागी हामान की बुरी युक्ति और यहूदियों के विरोध में उसका रचा हुआ षड्यन्त्र निरस्त किया जाए।

4राजा ने सोने का राजदण्ड एस्तेर की ओर बढ़ाया, तब एस्तेर उठकर राजा के सम्मुख खड़ी हुई।

5तब उसने कहा, “यदि राजा को यह स्वीकार हो, और यदि मुझ पर राजा की कृपा-दृष्टि हुई है, और राजा को उचित जान पड़े, और राजा मुझसे प्रसन्न है तो जो चिट्ठियां अगागी हम्मदाता के पुत्र हामान ने राजा के सब प्रान्तों के यहूदियों को नष्ट करने की युक्ति करके भेजी थी; उनको रद्द करने के लिए चिट्ठियां लिखी जाए।

6क्योंकि मेरी जाति पर जो संकट आ पड़ेगा उसे मैं कैसे देख सकूंगी, और अपने कुटुम्बियों का सर्वनाश कैसे सह सकूंगी?”

7तब राजा क्षयर्ष ने रानी एस्तेर और यहूदी मोर्दकै से कहा, “देख, मैंने तो हामान का घर एस्तेर को दे दिया है, और हामान को फांसी पर लटका दिया गया है, क्योंकि उसने यहूदियों पर हाथ उठाया था।

8अतः तुम अपनी समझ के अनुसार जो ठीक हो राजा के नाम से वही यहूदियों को लिखो, और उसपर राजा की अंगूठी की छाप लगाओ, क्योंकि जो राजाज्ञा राजा के नाम से लिखी जाती है उस पर राजा की अंगूठी की छाप लगा दी जाती है, वह रद्द नहीं की जा सकती।”

9अतः उसी समय अर्थात् सीवान नाम के तीसरे महीने के तेइसवें दिन राजा के लिपिक बुलाए गए, और जिस-जिस बात की आज्ञा मोर्दकै ने उन्हें दी उसे भारतवर्ष से कूश तक के एक सौ सत्ताइस प्रान्तों के यहूदियों, अधिपतियों, राज्यपालों और उच्चाधिकारियों को प्रत्येक प्रान्त की लिपि में और प्रत्येक देश के लोगों की भाषा में तथा यहूदियों को भी उनकी लिपि और उनकी भाषा में लिख दी गईं।

10और उसने राजा क्षयर्ष के नाम से पत्र लिखे और उन पर राजा की अंगूठी की छाप लगाई, और राजकीय घुड़साल के तीव्रगामी घोड़ों पर सवार हरकारों को पत्र देकर भेज दिया।

11इनमें राजा ने प्रत्येक नगर में रहने वाले यहूदियों को अधिकार दिया कि वे संगठित होकर अपनी रक्षा करें, और यदि किसी जाति या प्रान्त की सेना उन पर या उनके बच्चों और स्त्रियों पर आक्रमण करे तो वे उनको नष्ट करें, उनका वध करें और उनका सर्वनाश करके उन्हें लूट लें,

12और यह सब राजा क्षयर्ष के समस्त प्रान्तों में केवल एक ही दिन अर्थात् अदार नाम के बारहवें महीने के तेरहवें दिन किया जाए।

13प्रत्येक प्रान्त के लिए जारी की जाने वाली राजाज्ञा की प्रतियां समस्त जातियों में प्रसारित की गईं कि यहूदी उस दिन अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए तैयार रहे।

14राजा की आज्ञा से प्रभावित हरकारे शीघ्रता से राजसी घोड़ों पर सवार होकर चल पड़े। यह राजाज्ञा शूशन गढ़ में दी गई।

15तब मोर्दकै नीले और श्वेत रंग के राजकीय वस्त्र धारण किए और सिर पर सोने का बड़ा मुकुट पहने, और महीन बैंजनी मलमल की चादर ओढ़े हुए राजा के सामने से बाहर चला गया, तथा शूशन नगर ने जय-जयकार किया और आनन्द मनाया।

16यहूदी लोग आनन्द, हर्ष और प्रसन्नता से भर गए और उनका आदर हुआ।

17प्रान्त-प्रान्त और नगर-नगर में जहां कहीं राजाज्ञा और नियम पहुंचे, यहूदियों को बड़ा हर्ष और उल्लास हुआ। उन्होंने भोज किया और आनन्द मनाया। उस देश की जातियों में से बहुत से लोग यहूदी बन गए, क्योंकि उन पर यहूदियों का भय छा गया था।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)