पुराना नियम · एस्तेर · अध्याय 9 / 10
एस्तेर 9
1बारहवें महीने अर्थात् अदार माह के तेरहवें दिन, जब राजाज्ञा और नियम कार्यान्वित किए जाने वाले थे और जब यहूदियों के शत्रु उन पर प्रबल होने की आशा रखते थे तभी उनकी आशा के विपरीत, यहूदी उन पर प्रबल हो गए।
2क्षयर्ष राजा के सब प्रान्तों में यहूदी अपने-अपने नगरों में एकत्र हो गए, कि जो कोई उनकी हानि करने का प्रयास करे, उस पर हाथ उठाए। और कोई उनके सामने टिक न सका, क्योंकि समस्त जातियों पर उनका भय छा गया था।
3प्रान्तों के सब उच्चाधिकारियों, अधिपतियों, प्रधानों और राजा के कर्मचारियों ने भी यहूदियों की सहायता की, क्योंकि उनके मन में मोर्दकै का भय समा गया था।
4राजभवन में तो मोर्दकै का बड़ा प्रभाव था। उसकी ख्याति समस्त प्रान्तों में फैल गई, और इस पुरुष मोर्दकै की प्रतिष्ठा बढ़ती चली गई।
5इस प्रकार यहूदियों ने अपने सब शत्रुआेंं को तलवार से मारा और घात करके नाश कर दिया और अपने बैरियों के साथ जो चाहा वही किया।
6और राजधानी शूशन में यहूदियों ने पांच सौ पुरुषों को घात करके नाश किया,
7और उन्होंने पर्शन्दाता, दल्पोन अस्पाता,
8पोराता, अदल्या, अरीदाता,
9पर्मशता, अरीसै, अरीदै, और वैजाता,
10अर्थात् हम्मदाता के पुत्र यहूदियों के शत्रु हामान के दसों पुत्रों को मार डाला, परन्तु उनके धन को नहीं लूटा।
11उस दिन राजधानी शूशन में यहूदियों द्वारा मारे गए पुरुषों की संख्या राजा को बताई गई।
12तब राजा ने एस्तेर रानी से पूछा, “यहूदियों ने राजधानी शूशन में पांच सौ पुरुषों और हामान के दसों पुत्रों का वध कर दिया है। राजा के दूसरे प्रान्तों में उन्होंने न जाने और क्या िकया होगा। अब तेरा क्या निवेदन है? वह भी पूरा किया जाएगा। तू और क्या चाहती है? वह भी किया जाएगा।”
13तब एस्तेर ने कहा, “यदि राजा को स्वीकार हो, तो शूशन के यहूदियों को आज की राजाज्ञा के अनुसार कल भी करने दिया जाए, और हामान के दसों पुत्र फांसी के खम्भों पर लटकाए जाए।”
14अतः राजा ने आज्ञा दी कि ऐसा ही किया जाए। शूशन में एक राजाज्ञा निकाली गई, और हामान के दसों पुत्रों को फांसी पर लटकाया गया।
15और अदार माह के चौदहवें दिन भी शूशन के यहूदी एकत्रित हुए, और उन्होंने शूशन में तीन सौ पुरुषों को घात किया, पर लूट के माल पर हाथ नहीं लगाया।
16राज्य के अन्य प्रान्तों में रहनेवाले शेष यहूदी अपने प्राण की सुरक्षा और अपने शत्रुओं से विश्राम पाने के लिए एकत्रित हुए, और उन्होंने अपने बैरियों में से पचहत्तर हज़ार को मार डाला, परन्तु लूट पर हाथ न लगाया।
17यह अदार महीने के तेरहवें दिन किया गया, और चौदहवें दिन उन्होंने विश्राम करके भोज और उल्लास का दिन मनाया।
18परन्तु शूशन के रहने वाले यहूदी उसी महीने के तेरहवें और चौदहवें दोनों दिन एकत्र हुए, और उन्होंने पन्द्रहवें दिन विश्राम करके भोज और उल्लास का दिन मनाया
19इसी कारण गांवों में रहनेवाले यहूदी अदार के चौदहवें दिन आनन्द और भोज करके और एक दूसरे के यहां भोजन का कुछ हिस्सा पहुंचा कर उत्सव मनाते है।
20इन बातों का वृत्तान्त लिख कर मोर्दकै ने उन समस्त यहूदियों को जो राजा क्षयर्ष के सब प्रान्तों में क्या दूर और क्या पास रहते थे, चिट्ठियां भेजी।
21उसने उन्हें यह आदेश दिया कि वे प्रतिवर्ष अदार माह के चौदहवें और पन्द्रहवें दिन को पर्व मनाया करें,
22क्योंकि उन दिनों में यहूदियों ने अपने शत्रुओं से विश्राम पाया, और यह वही महीना था जब उनकी विपत्ति प्रसन्नता में और उनका शोक आनन्द में बदल गया था, अतः वे इन दिनों को भोज और आनन्द करने तथा एक दूसरे के यहां भोजन का कुछ हिस्सा पहुंचाने, और गरीबों को कुछ उपहार बांटने के दिन माने।
23और यहूदियों ने जैसा प्रारम्भ किया था, और जैसा मोर्दकै ने उनको लिखा था, वैसा ही करने का निश्चय किया।
24क्योंकि सब यहूदियों के शत्रु अर्थात् अगागी हम्मदाता के पुत्र हामान ने उन्हें नाश करने की युक्ति की थी, और उनके लिए ‘पूर’ अर्थात् चिट्ठियां डाली थीं कि उन्हें मिटा डाले और सत्यानाश करे।
25परन्तु जब यह बात राजा को मालूम हुई, तब उसने यह लिखित आज्ञा दी कि इसकी दुष्टता की युक्ति जो इसने यहूदियों के विरुद्ध की थी, इसी के सिर पर आ पड़े, और यह अपने पुत्रों सहित फांसी के खम्भे पर लटकाया जाए।
26इसलिए ये दिन ‘पूर’ के नाम पर ‘पूरीम’ कहलाए और इस पत्र के सब निर्देशों के कारण, और जो कुछ उन्होंने इस सम्बन्ध में स्वयं देखा था और उनके साथ जो कुछ हुआ था उसके कारण भी,
27यहूदियों ने अपने तथा अपनी सन्तान और उन सभों के लिए जो उनमें मिल गए थे, एक प्रथा ठहरा दी, जिससे कि वे नियमानुसार नियुक्त तिथि पर इन दो दिनों को प्रतिवर्ष अवश्य मनाएं,
28और ये दिन पीढ़ी-पीढ़ी, कुल-कुल, प्रान्त-प्रान्त और नगर-नगर में स्मरण किए और मनाए जाएं, और पूरीम के ये दिन यहूदियों में से कभी न मिटें और इनका स्मरण उनके वंश से जाता न रहे।
29तब अबीहैल की पुत्री रानी एस्तेर ने यहूदी मोर्दकै के साथ मिलकर पूरीम के सम्बन्ध में सम्पूर्ण अधिकार सहित लिखकर इस दूसरी चिट्ठी की पुष्टि कर दी।
30और उसने क्षयर्ष राजा के सभी एक सौ सत्ताइस प्रान्तों के समस्त यहूदियों को पत्र अर्थात् शान्ति और सत्यता का सन्देश लिख भेजा,
31कि जैसे यहूदी मोर्दकै और रानी एस्तेर ने उनके लिए ठहराया था, और जैसे उन्होंने अपने और अपनी सन्तान के लिए उपवास रखने और शोक मनाने के समय ठहराए थे, वे पूरीम के इन दिनों को नियम समय पर मनाया करे।
32और एस्तेर की आज्ञा से पूरीम के ये नियम ठहरा दिए गए और इन्हें पुस्तक में लिख लिया गया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)