पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 26 / 40
निर्गमन 26
1“और तू निवासस्थान के लिए दस परदे बनाना; ये बटे हुए महीन मलमल से बुने हुए नीले, बैंजनी, और लाल रंग के कपड़ों के हों, और इनमें किसी कुशल कारीगर से करूबों की कढ़ाई करवाना।
2प्रत्येक परदे की लम्बाई अट्ठाइस हाथ, और चौड़ाई चार हाथ हो। सभी परदे एक ही नाप के हो।
3पांच परदे एक दूसरे से जुड़े हुए हों! और शेष पांच परदे भी एक दूसरे से जुड़े हुए हों;
4और पहले जुड़े हुए पांच परदों के छोर में नीले रंग के फन्दे डलवाना, और इसी प्रकार दूसरे जुड़े हुए परदे के छोर में भी नीले रंग के फन्दे डलवाना।
5तू एक परदे में पचास फन्दे लगाना, और दूसरे जुड़े हुए परदे के छोर में भी पचास फन्दे लगाना। ये फन्दे एक दूसरे के आमने-सामने हो।
6और तू सोने के पचास आंकड़े बनवाकर इन परदों को इन्हीं आंकड़ों से जोड़ देना, जिससे कि निवासस्थान मिलकर एक हो जाए।
7“फिर तू बकरी के बालों से ग्यारह परदे बनाना जो निवासस्थान के ऊपर तम्बू का काम दे।
8प्रत्येक परदे की लम्बाई तीस हाथ और चौड़ाई चार हाथ हो; वे ग्यारह परदे एक ही नाप के हो।
9और तू पांच परदों को परस्पर जोड़ना, फिर छः परदे अलग जोड़ना और छठवें परदे को तम्बू के सामने मोड़कर दोहरा कर देना।
10और तू पचास फन्दे पहले जोड़े के परदे के छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा बनाना, और पचास ही फन्दे दूसरे जोड़े के परदे के छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा, बनाना।
11तू कांसे के पचास आंकड़े बनाना, और उन्हें फन्दों में पहनाकर तम्बू को ऐसा जोड़ देना कि वह मिलकर एक बन जाए।
12तम्बू के परदों का लटका हुआ अर्थात् वह आधा भाग जो बचा रहता है, निवासस्थान की पिछली ओर लटका रहे।
13तम्बू के परदों की बची हुई लम्बाई में से निवासस्थान को ढ़कने के लिए एक हाथ इधर और एक हाथ उधर उसकी दोनों ओर लटकता रहे।
14और तम्बू को ढांपने के लिए मेढ़ों की खालों से जो लाल रंग से रंगी हुई हों, आवरण बनाना। उसके ऊपर सुइसों की खालों का भी एक ओढ़ना बनाना।
15“फिर तू निवासस्थान के लिए बबूल की लकड़ी के तख्ते बनाना जिससे वह खड़ा किया जा सके।
16और प्रत्येक तख़्ते की लम्बाई दस हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ हो।
17प्रत्येक तख़्ते को परस्पर जोड़ने के लिए दो-दो चूलें हों, निवासस्थान के सभी तख़्ते इसी प्रकार बनाए जाए।
18और तू निवासस्थान के लिए तख़्ते बनानाः दक्षिणी भाग के लिए बीस तख़्ते।
19और इन बीस तख्तों में नीचे की ओर चांदी के चालीस खाने बनाना, अर्थात् प्रत्येक तख़्ते में चूलों के लिए दो-दो खाने हो।
20निवासस्थान की दूसरी ओर, उत्तरी भाग के लिए बीस तख़्ते बनाना,
21और उनके लिए भी चांदी के चालीस खाने बनाए जाएं, अर्थात् एक-एक तख़्ते में दो-दो खांचे हो।
22निवासस्थान के पिछले भाग अर्थात् पश्चिमी भाग के लिए छः तख़्ते बनाना।
23तू निवासस्थान के पिछले भाग में कोनों के लिए दो तख़्ते बनाना।
24ये नीचे से दो-दो भाग के हों, और दोनों भाग ऊपर के छोर तक पहले कड़े से जोड़े जाए। दोनों तख़्ते इसी ढंग से जोड़े जाएं, दोनों कोनों के लिए ये तख़्ते हो।
25और आठ तख़्ते हों और उनमें चांदी के सोलह खांचे हो। अर्थात् एक-एक तख़्ते के नीचे दो-दो खांचे हो।
26“फिर तू बबूल की लकड़ी के बेंड़ें बनवाना अर्थात् निवासस्थान की एक ओर के तख्तों के लिए पांच,
27और निवासस्थान की दूसरी ओर के तख़्तों के लिए पांच बेंड़े और निवास के पीछे पश्चिमी भाग के लिए पांच बेंडे।
28बीच का बेंड़ा जो तख़्तों के बीच में हो वह निवासस्थान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचे।
29तू तख़्तों को सोने से मढ़ना और बेंड़ों के खांचों के लिए सोने के कड़े बनाना, और बेंड़ें भी सोने से मढ़ना।
30तब तू निवासस्थान को उसी रूप के अनुसार खड़ा करना जैसा तुझे पर्वत पर दिखाया गया है।
31“तू नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपड़ों और बटे हुए महीन मलमल का एक परदा बनाना जिस पर कुशल कारीगर द्वारा करूब काढ़ा गया हो।
32तू उसे सोने से मढ़े हुए बबूल के चार खम्भों पर लटकाना, उनके कड़े भी सोने के हों और ये चांदी के चार खांचों पर खड़े हो।
33और परदे को अँकड़ियों के नीचे से लटकाना और साक्षी के सन्दूक को वहीं परदे के भीतर ले जाना, और यह परदा तुम्हारे लिए पवित्रस्थान को परमपवित्रस्थान से अलग रखे।
34तू परमपवित्रस्थान में साक्षीपत्र के सन्दूक के ऊपर प्रायश्चित्त के ढकने को रखना।
35उस परदे के बाहर निवासस्थान के उत्तरी भाग में मेज को रखना, और उसके दक्षिणी भाग में मेज के सामने दीवट को रखना।
36“तू तम्बू के द्वार के लिए नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपड़े से और बटे हुए महीन मलमल से बुनकर एक परदा बनाना।
37तू इस परदे के लिए बबूल के पांच खम्भे बनाना और उनको सोने से मढ़ना। उनके कड़े भी सोने के हों और उनके लिए कांसे के पांच खांचे ढालकर बनाना।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)