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पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 27 / 40

निर्गमन 27

1“फिर तू वेदी को बबूल की लकड़ी की बनाना। वह पांच हाथ लम्बी और पांच हाथ चौड़ी हो। इस प्रकार वेदी वर्गाकार हो। उसकी ऊँचाई तीन हाथ हो।

2उसके चारों कोनों पर चार सींग बनाना, और उसके सींग उसके साथ एक ही टुकड़े से बनाए जाए। तब तू उसको कांसे से मढ़ना।

3और उसकी राख उठाने के लिए पात्र, उसके बेलचे, उसके तसले, उसके कांटे, और अंगीठियां आदि सब सामान कांसे का बनाना।

4तू उसके लिए कांसे की जाली की एक झँझरी बनाना, और झँझरी के चारों कोनों पर कांसे के चार कड़े लगाना।

5और उसको वेदी के चारों कगारों के नीचे ऐसे लगाना कि जाली वेदी की आधी ऊँचाई तक पहुँचे।

6तू वेदी के लिए बबूल की लकड़ी के डंडे बनाना, और उसको कांसे से मढ़ना।

7वे डंडे कड़ों में इस प्रकार डाले जाएं कि जब वेदी उठाकर ले जाई जाए तब डंडे वेदी के दोनों ओर रहे।

8वेदी को तख़्तों से खोखली बनाना। जैसी वह तुझे पर्वत पर दिखाई गई थी वैसी ही बनाई जाए।

9“फिर तू निवासस्थान के आंगन को बनाना। आंगन की दक्षिणी ओर महीन मलमल के परदे हों, जिनकी लम्बाई सौ हाथ की हो।

10उनके लिए बीस खम्भे हों, और उनके लिए कांसे के बीस खांचे हो। खम्भों के कुण्डे और उनकी पट्टियां चांदी की हो।

11इसी प्रकार उत्तर की ओर के लिए सौ हाथ लम्बा परदा हो, तथा उसके बीस खम्भे और कांसे के बीस खांचे हो। खम्भों के कुण्डे और उनकी पट्टियां चांदी की हो।

12“फिर पश्चिम की ओर आंगन की चौड़ाई के लिए पचास हाथ के परदे हों, और उनके दस खम्भे और खांचे भी दस हो।

13पूर्व की ओर आंगन की चौड़ाई पचास हाथ हो।

14आंगन के द्वार की एक ओर पन्द्रह हाथ के परदे, और उनके तीन खम्भे और तीन खांचे हो।

15दूसरी ओर भी पन्द्रह हाथ के परदे, तथा उनके तीन खम्भे और तीन खांचे हो।

16“आंगन के द्वार के लिए बीस हाथ के परदे हाें जो नीले, बैंजनी और लाल कपड़े और बटी हुई महीन मलमल से कढ़ाई करके बनाए गए हो। उसके लिए चार खम्भे और उनके चार खांचे हो।

17आंगन के चारों ओर के सब खम्भे चांदी की पट्टियों से जुड़े हुए हों, तथा उनके कुण्डे चांदी के, और खांचे कांसे के हो।

18आंगन की लम्बाई सौ हाथ, और चौड़ाई सब जगह पचास हाथ की हो। उसके परदे की ऊँचाई पांच हाथ की हो तथा वह महीन मलमल से बना हो। खम्भों के खांचे कांसे के हो।

19“निवासस्थान की भिन्न-भिन्न सेवाओं में काम आने वाले सब पात्र और उसके सब खूंटे और आंगन के सब खूंटे कांसे के हो।

20“तब तू इस्राएलियों को आज्ञा देना कि वे तेरे पास जैतून का शुद्ध तेल जो कूट कर निकाला गया है दीवट के लिए ले आएं, जिससे दीपक निरन्तर जलता रहे।

21मिलाप वाले तम्बू में उस परदे के बाहर जो साक्षीपत्र के सामने है, हारून और उसके पुत्र दीपकों को यहोवा के सामने संध्या से प्रातः तक जलते हुए रखे। यह विधि इस्राएलियों के लिए पीढ़ी-से-पीढ़ी तक सदैव बनी रहेगी।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)