पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 29 / 40
निर्गमन 29
1“अब उन्हें याजकीय सेवा के निमित्त पवित्र करने के लिए जो तुम्हें करना है वह यह हैः एक निर्दोष बछड़ा और दो निर्दाेष मेढ़े लेना।
2तथा अख़मीरी रोटी और तेल से सने हुए अख़मीरी फुलके तथा तेल चुपड़ी हुई अख़मीरी चपातियां लेना; ये सब गेहूँ के मैदे से बनाना।
3फिर उन्हें एक टोकरी में रखकर बछड़े और दोनों मेढ़ों के साथ टोकरी को प्रस्तुत करना।
4तब हारून और उसके पुत्रों को मिलापवाले तम्बू के द्वार के समीप लाकर जल से नहलाना।
5तब वस्त्र लेकर हारून को अंगरखा और एपोद का चोगा पहनाना तथा एपोद और सीनाबन्द बांधना और एपोद का निपुणता से बना हुआ कमरबन्द बांधना;
6और उसके सिर पर पगड़ी बांधना तथा पगड़ी पर पवित्र मुकुट रखना।
7तब अभिषेक का तेल लेना और उसके सिर पर उंडेलना और उसका अभिषेक करना।
8फिर उसके पुत्रों को भी लाकर उन्हें अंगरखे पहनाना,
9तथा उनकी अर्थात् हारून और उसके पुत्रों की कमर में पटुका बांधना, और सिर पर टोपियां रखना जिससे याजक पद पर इस विधि द्वारा उनका अधिकार निरन्तर बना रहे। इस प्रकार हारून और उसके पुत्रों का अभिषेक करना।
10“तब तू बछड़े को मिलापवाले तम्बू के सामने लाना और हारून और उसके पुत्र बछड़े के सिर पर अपने हाथ रखे।
11तब बछड़े को यहोवा के सामने मिलापवाले तम्बू के द्वार पर वध करना।
12और बछड़े के लहू में से कुछ लेकर वेदी के सीगों पर अपनी उंगली से लगाना तथा बचा हुआ सारा लहू वेदी के पायों पर उंडेल देना।
13और जो चरबी अँतड़ियों को ढँके रहती है, कलेजे के ऊपर की झिल्ली और चरबी सहित दोनों गुर्दों को वेदी पर अग्नि में अर्पित करना।
14परन्तु बछड़े का मांस, खाल और गोबर शिविर के बाहर आग में जलाना; यह पापबलि है।
15“तू मेढ़े को भी लेना, हारून और उसके पुत्र मेढ़े के सिर पर अपने हाथ रखे।
16तब तू उस मेढ़े को वध करना और उसका लहू लेकर वेदी पर चारों ओर छिड़कना।
17और मेढ़े के टुकड़े-टुकड़े काटना तथा उसकी अंतड़ियों और पैरों को धोना और उन्हें उसके टुकड़ों और उसके सिर के साथ रखना।
18तथा उस सम्पूर्ण मेढ़े को वेदी पर अग्नि में अर्पित करना; यह यहोवा के निमित्त होमबलि है; यह सुखदायक सुगन्ध है, यहोवा के निमित्त अग्निबलि है।
19“तब दूसरे मेढ़े को लेना, और मेढ़े के सिर पर हारून और उसके पुत्र अपने हाथ रखे।
20और तू उस मेढ़े का वध करना, उसका कुछ लहू लेकर हारून के दाहिने कान के सिरे पर लगाना तथा उसके पुत्रों के दाहिने कान के सिरों पर और उनके दाहिने हाथ के अंगूठों और दाहिने पैरों के अंगूठों पर लगाना तथा बचे हुए लहू को वेदी पर चारों ओर छिड़क देना।
21तब वेदी पर के कुछ लहू तथा अभिषेक के कुछ तेल को लेकर उसे हारून और उसके वस्त्रों पर छिड़कना। इसके साथ ही साथ उसके पुत्रों और उनके वस्त्रों पर भी छिड़कना। इस प्रकार वह और उसके वस्त्र पवित्र ठहरेंगे, और उसके पुत्र तथा पुत्रों के वस्त्र भी पवित्र ठहरेंगे,
22मेढ़े की चरबी और मोटी दुम और अँतड़ियों को ढँकने वाली चरबी तथा कलेजे को ढँकने वाली चरबी, और चरबी सहित दोनों गुर्दे तथा दाहिनी रान लेना-क्योंकि यह तो अभिषेक का मेढ़ा है-
23और अख़मीरी रोटी की टोकरी जो यहोवा के समक्ष रखी है उसमें से एक रोटी, और तेल से चुपड़ी एक रोटी और एक चपाती;
24इन सबको हारून और उसके पुत्रों के हाथों में रखकर हिलाया जाए। यह यहोवा के सामने हिलाई जाने की भेंट ठहरे।
25और उन्हें उनके हाथों से लेकर वेदी पर धुएं में होमबलि करना जो यहोवा के सामने सुखदायक सुगन्ध ठहरे; यह यहोवा के लिए अग्निबलि है।
26“फिर हारून के अभिषेक के मेढ़े का सीना लेकर हिलाए जाने की भेंट के लिए यहोवा के सामने हिलाना; वह तेरा भाग ठहरेगा।
27हारून और उसके पुत्रों के अभिषेक के मेढ़े के हिलाए जाने वाली भेंट का सीना तथा उठाए जाने वाली भेंट की रान को पवित्र ठहराना।
28यह इस्राएल की सन्तान की ओर से सदैव के लिए हारून और उसके पुत्रों का भाग ठहरे, क्योंकि यह उठाए जाने की भेंट है, तथा यह इस्राएल की सन्तान की ओर से उनकी मेलबलियों में से, यहोवा के लिए उठाए जाने की भेंट ठहरेगी।
29“तथा हारून के पवित्र वस्त्र, उसके पश्चात् उसकी सन्तान के होंगे जिससे उन्हीं में उनका अभिषेक और संस्कार किया जाएगा।
30उसके पुत्रों में से एक जो उसके स्थान में याजक होगा, पवित्रस्थान में सेवा करने के लिए मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करने से पहले सात दिन तक उन वस्त्रों को पहना रहे।
31“अभिषेक के मेढ़े के मांस को लेकर पवित्रस्थान में उसे उबालना।
32हारून और उसके पुत्र मेढ़े का वह मांस तथा टोकरी की रोटी मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खाए।
33इस प्रकार वे उन वस्तुओं को खाएं जिनके द्वारा अभिषेक व पवित्र किये जाने के समय उनका प्रायश्चित्त किया गया था; परन्तु कोई अनअभिषिक्त जन उन्हें न खाए, वे तो पवित्र है।
34और यदि अभिषेक वाला कुछ मांस अथवा कुछ रोटी भोर तक बचा रहे तो उस बचे हुए को आग में जला देना; वह खाया न जाए, क्योंकि वह पवित्र है।
35“और तू हारून और उसके पुत्रों के साथ, जो कुछ मैंने आदेश दिया है उसके अनुसार करना तथा सात दिनों तक उनका अभिषेक इस विधि से करते रहना।
36प्रत्येक दिन प्रायश्चित्त के लिए पापबलि के निमित्त एक बछड़ा चढ़ाना तथा जब तू प्रायश्चित्त करे तो उसके लिए वेदी को शुद्ध करना, और उसे पवित्र करने के लिए उसका अभिषेक करना।
37सात दिन तक वेदी के लिए प्रायश्चित्त करके उसे पवित्र करना। तब वेदी परमपवित्र ठहरेगी, और जो कुछ वेदी को छू लेगा वह पवित्र हो जाएगा।
38“अब वेदी पर जो तुझे निरन्तर चढ़ाना है वह यह हैः प्रतिदिन एक-एक वर्ष के दो मेमने।
39एक मेमने को तो प्रातःकाल, और दूसरे मेमने को सायंकाल चढ़ाना;
40और एक मेमने के साथ हीन की चौथाई कूट के निकाले हुए तेल से सना हुआ एपा का दसवां भाग मैदा और अर्घ के लिए हीन की चौथाई दाखमधु देना।
41दूसरे मेमने को सांयकाल चढ़ाना; तथा उसके साथ प्रातः काल के समान अन्नबलि और अर्घ के निमित्त चढ़ाना जिससे वह यहोवा के लिए सुखदायक सुगन्ध और अग्निबलि ठहरे।
42तुम्हारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी यहोवा के सम्मुख मिलाप वाले तम्बू के द्वार पर होमबलि निरन्तर होती रहे। वहां मैं तुमसे मिलूँगा कि तुझसे बातें करूँ,
43और वहां मैं इस्राएलियों से भेंट करूँगा, तथा वह मेरी महिमा से पवित्र किया जाएगा।
44मैं मिलापवाले तम्बू और वेदी को पवित्र करूँगा तथा हारून और उसके पुत्रों को भी पवित्र करूंगा कि वे मेरे लिए याजकीय सेवा करे।
45मैं इस्राएल की सन्तान के मध्य निवास करूंगा और उनका परमेश्वर ठहरूंगा।
46और वे जान लेंगे कि मैं यहोवा उनका परमेश्वर हूं जो उनको मिस्र देश से बाहर ले आया कि उनके मध्य निवास करूं; मैं ही उनका परमेश्वर यहोवा हू।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)