पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 37 / 40
निर्गमन 37
1फिर बसलेल ने बबूल की लकड़ी का सन्दूक बनाया; उसकी लम्बाई ढाई हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ, और उसकी ऊंचाई डेढ़ हाथ थी।
2और उसने उसे भीतर बाहर चोखे सोने से मढ़ दिया और इसके चारों ओर सोने की गोट लगाई।
3और उसके चारों पायों पर लगाने के लिए उसने सोने के चार कड़े ढाले, दो कड़े उसके एक ओर लगे और और दो कड़े उसके दूसरी ओर लगे।
4फिर उसने बबूल के डंडे बनाए और उन्हें सोने से मढ़ा।
5और सन्दूक को उठाने के लिए उसने डंडों को उसके दोनों ओर वाले कड़ों में डाला।
6फिर उसने ढाई हाथ लम्बे और डेढ़ हाथ चौड़े प्रायश्चित्त के ढक्कन को चोखे सोने से बनाया।
7उसने सोने के दो करूब बनाए, उसने उन्हें प्रायश्चित्त के ढकने के दोनों सिरों पर गढ़कर बनाया।
8एक करूब एक सिरे पर और दूसरा करूब दूसरे सिरे पर; दोनों ओर के करूब और प्रायश्चित्त का ढकना एक ही टुकड़े से बने थे।
9और करूबों के पंख ऊपर की ओर फैले हुए थे। उन पंखों से प्रायश्चित्त का ढकना ढँपा हुआ था और उनके मुख आमने-सामने थे; करूबों के मुख प्रायश्चित्त के ढकने की ओर थे।
10फिर उसने दो हाथ लम्बी, एक हाथ चौड़ी, और डेढ़ हाथ ऊँची बबूल की लकड़ी की मेज बनाई।
11और उसे चोखे सोने से मढ़ा, और उसके चारों ओर सोने की मढ़ी हुई एक किनारी लगाई।
12और उसने उसके लिए चार अंगुल चौड़ी एक पटरी बनाई। और उसके चारों ओर की पटरी के लिए सोने की ढली हुई किनारी बनाई।
13और उसने उसके लिए सोने के चार कड़े ढाले और उन कड़ों को चारों कोनों पर लगाया जो उसके चारों पायों पर थे।
14ये कड़े पटरी के पास थे; ये मेज उठाने के डंडों के लिए थे।
15और उसने मेज उठाने के डंडे बबूल की लकड़ी से बनाए और उन्हें सोने से मढ़ा।
16और उसने मेज़ पर का सामान अर्थात् इसके परात, तवे, धूपदान, और तर्पण के लिए कटोरे चोखे सोने के बनाए।
17फिर उसने दीपदान को चोखे सोने से बनाया। उसने दीपदान को गढ़कर बनाया; इसका आधार और इसकी डंडी, इसकी कटोरियां, इसकी कलियां और इसके फूल सब एक ही टुकड़े के बने।
18और दीवट के दोनों ओर से छः शाखाएं निकली। उसके एक ओर से तीन शाखाएं और दूसरी ओर से तीन शाखाएं निकली।
19एक डाली में बादाम के फूल के समान तीन कटोरियां, एक गांठ और एक फूल बना; दीवट से निकली सभी छः शाखाएं ऐसी ही बनी।
20दीवट की डंडी में बादाम के फूल के समान अपनी गांठो और फूलों सहित चार कटोरियां बनी।
21और दीवट से निकली हुई छहों डालियों में से दो-दो डालियों के नीचे एक-एक गांठ थी।
22कलियां और डालियां सब इसी के साथ एक ही टुकड़े से बनीं; पूरा दीवट चोखे सोने का और एक ही टुकड़े से गढ़ा हुआ था।
23और उसने दीवट के सातों दीपक और गुलतराश और गुलदान चोखे सोने के बनाए।
24उसने इसे और इसके सब सामान को किक्कार भर चोखे सोने से बनाया।
25फिर उसने धूप-वेदी को बबूल की लकड़ी से बनाया। उसकी लम्बाई एक हाथ और चौड़ाई एक हाथ थी; वह चौकोर थी और उसकी ऊँचाई दो हाथ थी और उसके सींग उसी के साथ एक ही टुकड़े के बने थे।
26और उसने इसके ऊपरी भाग, और चारों ओर इसके सींगों सहित सम्पूर्ण वेदी को चोखे सोने से मढ़ा और उसके चारों ओर सोने की किनारी बनाई।
27और उस किनारी के नीचे उसके दोनों ओर-विपरीत दिशा में-उसने सोने के दो कड़े बनाए जो उसको उठाने वाले डंडों के लिए थे।
28और डण्डों को उसने बबूल की लकड़ी का बनाया और उन्हें सोने से मढ़ा।
29और उसने अभिषेक का पवित्र तेल तथा मसालों का शुद्ध और सुगन्धित धूप ऐसे बनाया जैसे गन्धी बनाता है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)