पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 38 / 40
निर्गमन 38
1तब उसने बबूल की लकड़ी की पांच हाथ लम्बी, पांच हाथ चौड़ी वर्गाकार होमबलि के लिए वेदी बनाई और उसकी ऊँचाई तीन हाथ थी।
2और उसने उसके चारों कोनों पर चार सींग बनाए, सींग तथा वेदी तो एक ही टुकड़े के बने थे, और उसने उसको कांसे से मढ़ा
3उसने वेदी के सारे सामान को अर्थात् हांडियों, बेलचों, तसलों, सलाखों और करछों को बनाया। उसके सारे पात्र उसने कांसे के बनाए।
4और उसने वेदी के लिए उसके चारों किनारे की कंगनी के नीचे कांसे की जाली की ऐसी झंझरी बनाई कि वह नीचे से वेदी की ऊँचाई के मध्य तक पहुँचती थी।
5उसने कांसे की झंझरी के चारों कोनों पर डंडों के लिए चार कड़े ढाले।
6उसने डंडों को बबूल की लकड़ी का बनाया और उन्हें कांसे से मढ़ा।
7और उसने डंडों को वेदी के दोनों ओर के कड़ों में इसे उठाने के लिए डाल दिया। वेदी को उसने तख़्तों से खोखला बनाया।
8इसके अतिरिक्त मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सेवा करने वाली महिलाओं के दर्पणों के कांसे से उसने हौदी और उसका खांचा बनाया।
9तब उसने आंगन बनाया। और दक्षिण की ओर के लिए, आंगन के परदे बटे हुए महीन मलमल के थे, जिसकी लम्बाई एक सौ हाथ थी।
10उनके लिए बीस खम्भे, और कांसे के बीस खांचे और खम्भों की घुण्डियां और जोड़ने की पट्टियां, चांदी की बनीं थी।
11उत्तर की ओर के लिए भी सौ हाथ लम्बे परदे बने; और उनके लिए भी बीस खम्भे और कांसे के बीस खांचे, और खम्भों की घुण्डियां और जोड़ने की पट्टियां, चांदी की बनी थी।
12पश्चिम की ओर के लिए सब परदे मिलाकर पचास हाथ लम्बे थे, जिनके दस खम्भे और दस ही खांचे थे। और खम्भों की घुण्डियां, और जोड़ने की पट्टियां चांदी की थी।
13और पूर्व की ओर के लिए भी पचास हाथ लम्बे परदे थे।
14उसके द्वार की एक ओर के लिए पन्द्रह हाथ लम्बे परदे बने, और उनके लिए तीन खम्भे और तीन खांचे थे;
15इसी प्रकार दूसरी ओर के लिए भी परदे बने। आंगन के द्वार के दोनों ओर पन्द्रह-पन्द्रह हाथ लम्बे परदे थे, और उनके लिए तीन-तीन खम्भे और तीन-तीन खांचे भी थे।
16अांगन के चारोें ओर के सब परदे बटे हुए महीन मलमल के बने हुए थे।
17खम्भों के खांचे कांसे के, और घुण्डियां और पट्टियां चांदी की बनी थीं और उनके ऊपरी सिरे चांदी से मढ़े हुए थे, और आंगन के सब खम्भे चांदी की पट्टियों से जुड़ गए थे।
18अांगन के द्वार के परदे पर कढ़ाई की गई थी, और वह नीले, बैंजनी तथा लाल रंग के कपड़े का, और बटी हुई महीन मलमल का बना हुआ था। उसकी लम्बाई बीस हाथ और उसकी ऊँचाई अांगन की कनात की ऊँचाई के अनुसार पांच हाथ थी।
19उनके लिए चार खम्भे और उनके चार खांचे कांसे के थे; उनकी घुण्डियां चांदी की थीं और उनके ऊपरी सिरे चांदी से मढ़े हुए थे और उनकी पट्टियां चांदी की बनी थी।
20निवासस्थान तथा आंगन के चारों ओर के सब खूंटे कांसे के बने हुए थे।
21निवासस्थान अर्थात् साक्षी-पत्र के तम्बू का समान जो लेवियों की सेवा के लिए बना था और जिसकी गिनती मूसा की आज्ञानुसार हारून याजक के पुत्र ईतामार के द्वारा हुई थी, उसका परिमाण यह है।
22जिस-जिस वस्तु के बनाने की आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, उसको बसलेल ने बनाया। वह ऊरी का पुत्र, हूर का पोता और यहूदा के गोत्र का था।
23और उसके साथ दान के गोत्र का अहीसामाक का पुत्र ओहोलीआब था जो खुदाई करने, काढ़ने और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपड़ों पर तथा महीन मलमल पर कढ़ाई करने वाला निपुण कारीगर था।
24पवित्रस्थान के सारे काम में जो सोना, अर्थात् जो भेंट का सोना लगा वह उनतीस किक्कार और पवित्रस्थान के शेकेल के अनुसार सात सौ तीस शेकेल था।
25मण्डली के गिने हुए लोगों की भेेंट की चांदी पवित्रस्थान के शेकेल के अनुसार एक सौ किक्कार, और एक हजार सात सौ पछत्तर शेकेल थी।
26जितने बीस वर्ष और उससे अधिक आयु के थे, जो गिनती में छः लाख तीन हजार पांच सौ पचास पुरुष थे, उनसे एक बेका प्रति व्यक्ति अर्थात् पवित्रस्थान के शेकेल के अनुसार आधा शेकेल मिला।
27और वह सौ किक्कार चांदी पवित्रस्थान के खांचों और बीच वाले परदे के खांचे के ढालने के काम आई; सौ किक्कार से सौ खांचे बने, अर्थात एक-एक खांचा एक किक्कार का बना।
28और शेष एक हजार सात सौ पछत्तर शेकेल से उसने खम्भों की घुण्डियां बनाईं और खम्भों के ऊपरी भाग मढ़े, और उनकी पट्टियां भी बनाईं।
29भेंट का कांसा सत्तर किक्कार और दो हजार चार सौ शेकेल था।
30उसने उससे मिलापवाले तम्बू के द्वार की कुर्सियां और कांसे की वेदी, उसकी कांसे की झंझरी, और वेदी के सारे पात्र,
31और आंगन के चारों ओर के खांचे तथा आंगन के द्वार के खांचे, और निवासस्थान के तथा आंगन के चारों ओर के खूंटे भी बनाए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)