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पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 14 / 48

यहेजकेल 14

1तब इस्राएल के कुछ प्राचीन मेरे पास आए और मेरे सामने बैठ गए।

2और यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचाः

3“हे मनुष्य की सन्तान, इन मनुष्यों ने अपनी मूर्तियां अपने हृदयों में स्थापित की हैं और अपनी दुष्टता की ठोकर ठीक अपने सम्मुख रखी है। फिर क्या ये मुझसे कुछ भी पूछने पाएंगे?

4इसलिए उनसे कह कि प्रभु यहोवा यों कहता हैः इस्राएल का कोई भी जन जो अपने हृदय में अपनी मूर्तियां स्थापित करे और अपनी आंखों के ठीक सामने अपने अधर्म की ठोकर रखे और तब नबी के पास आए, तो मैं यहोवा उसकी बहुत-सी मूर्तियों के अनुसार ही उसे उत्तर दूंगा,

5जिससे इस्राएल के उन घरानों के हृदयों पर पुनः अधिकार करूं जो अपनी सब मूर्तियों के कारण मुझसे विमुख हो गए है।

6“इसलिए इस्राएल के घराने से कह कि प्रभु यहोवा याें कहता हैः पश्चात्ताप करके अपनी मूर्तियों से अलग हो जाओ और सब घृणित वस्तुओं से अपना मुंह मोड़ लो।

7इस्राएल के घराने का कोई भी व्यक्ति अथवा कोई प्रवासी जो इस्राएल में रहता हो और जो मुझ से अलग हो जाए और अपने हृदय में मूर्तियां स्थापित करे, अपने अधर्म की ठोकर अपने मुख के ठीक सामने रखे और फिर अपने विषय में मेरी इच्छा जानने के लिए नबी के समीप आए, तो मैं यहोवा स्वयं उसे उत्तर दूंगा।

8मैं उस मनुष्य से अपना मुख मोड़ लूंगा, मैं उसे उपमा और कहावत ठहराऊंगा, और उसे अपने लोगों में से मिटा दूंगा। तब तुम जान लोगे कि मैं ही यहोवा हू।

9परन्तु यदि नबी कुछ बोलने को विवश हुआ, तो उसे विवश करने वाला मैं यहोवा ही हूं, और मैं उसके विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाऊंगा और उसे अपनी प्रजा इस्राएल में से नष्ट करूंगा।

10वे अपने ही अधर्म का दण्ड पाएंगे। जैसा खोजी का वैसा नबी का भी अधर्म होगा,

11जिससे इस्राएल का घराना मेरे मार्ग से फिर भटक कर अपने पाप के कारण भ्रष्ट न हो जाए। इस प्रकार वे मेरी प्रजा और मैं उनका परमेश्वर बना रहूंगा। यहोवा की यही वाणी है।”

12तब यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा;

13“हे मनुष्य की सन्तान, यदि कोई देश विश्वासघात करके मेरे विरुद्ध पाप करे और मैं उसके विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाकर उसकी रोटी की आपूर्ति बन्द कर दूं, उसमें अकाल भेज दूं, और उसमें के पशु और मनुष्य दोनों को नष्ट कर दूं,

14तब चाहे नूह, दानिय्येल और अय्यूब ये तीनों व्यक्ति उनके मध्य होते, तो वे अपनी धार्मिकता से केवल अपने आपको ही बचा पाते, यहोवा की यही वाणी है।

15यदि मैं देश में वन-पशुओं को भेज देता जो उसे निर्जन कर देते और वह ऐसा उजाड़ हो जाता कि उन जन्तुओं के कारण उसमें से होकर कोई न जा पाता,

16और तब चाहे ये तीनों व्यक्ति उसमें होते फिर भी प्रभु यहोवा की यह वाणी है कि मेरे जीवन की शपथ, ये भी अपने पुत्रों और पुत्रियों को न बचा पाते। केवल ये ही बच पाते, परन्तु देश उजाड़ हो जाता।

17अथवा यदि मैं यह कहकर उस देश पर तलवार चलवाता कि इस देश पर तलवार चले और मनुष्यों तथा पशुओं दोनों को इसमें से मिटा डाले,

18तब चाहे ये तीनों व्यक्ति उसमें होते फिर भी प्रभु यहोवा की यह वाणी है कि मेरे जीवन की शपथ, वे भी अपने पुत्रों और पुत्रियों को न बचा पाते। केवल ये ही बच पाते।

19फिर यदि मैं उसी देश पर महामारी भेजता और अपने क्रोध में मनुष्य तथा पशुओं को उसमें से नष्ट करने के लिए रक्तपात करता,

20तब चाहे नूह, दानिय्येल और अय्यूब उसमें होते, प्रभु यहोवा की यह वाणी है कि, मेरे जीवन की शपथ, वे न तो अपने पुत्रों और न पुत्रियों को बचा पाते। वे अपनी धार्मिकता से केवल अपने आपको ही बचा पाते।”

21क्योंकि प्रभु यहोवा याें कहता है, “फिर यह कितना अधिक भयानक होगा जब मैं यरूशलेम पर अपने चारों भयंकर दण्ड भेजूंगाः अर्थात् तलवार, अकाल, हिंसक पशु और महामारी, कि मनुष्य और पशु सब उसमें से नष्ट हो जाए।

22फिर भी देखो, उसमें से कुछ पुत्र-पुत्रियां बच निकलेंगे। देखो, वे तुम्हारे पास पहुंचाए जाएंगे और तुम उनके आचरण और कार्य देखोगे; तब तुम उस विपत्ति को और उस सबको जो मैंने यरूशलेम पर डाला है देखकर शान्ति पाओगे।

23उनके आचरण और कार्य देखकर तुम शान्ति पाओगे, क्योंकि तुम जान जाओगे कि जो कुछ मैंने किया, व्यर्थ नहीं किया,” प्रभु यहोवा की यही वाणी है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)