पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 2 / 48
यहेजकेल 2
1तब उसने मुझसे कहा, “हे मुनष्य की सन्तान अपने पैरों पर खड़ा हो कि मैं तुझसे बातें करू।”
2जैसे ही उसने मुझसे यह कहा, आत्मा ने मुझमें समाकर मुझे पैरों के बल खड़ा कर दिया; और मैंने उसको मुझसे कहते सुना।
3उसने मुझसे कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, मैं तुझे इस्राएलियों के पास, अर्थात् विद्रोह करने वाले लोगों के पास भेज रहा हूं, जिन्होंने मेरे विरुद्ध विद्रोह किया है; वे और उनके पूर्वज आज तक मेरे विरुद्ध अपराध करते आए है।
4और मैं तुझे उनके पास भेज रहा हूं जो कठोर और हठी सन्तान है। तू उनसे यह कहना, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है,’
5चाहे वे सुनें या न सुनें-क्याेंकि वे तो विद्रोही घराने के हैं, फिर भी वे जान लेंगे कि उनके मध्य एक नबी है।
6और हे मनुष्य की सन्तान, तू न तो उनसे और न उनकी बातों से डरना; चाहे कांटे और ऊंट-कंटारे तेरे आस-पास हों, और तुझे बिच्छुओं पर ही क्यों न बैठना पड़े, तू न तो उनके वचनों से डरना और न उनकी उपस्थिति से घबराना क्योंकि वे तो विद्रोही घराने के है।
7परन्तु तू उनसे मेरे वचन कहना, चाहे वे सुनें या न सुनें, क्योंकि वे तो विद्रोही है।
8“अब हे मनुष्य की सन्तान, जो कुछ मैं तुझसे कह रहा हूं उसे सुन! और तू उस विद्रोही घराने के समान न बन, अपना मुंह खोल और जो कुछ मैं तुझे दे रहा हूं उसे खा ले।”
9तब मैंने देखा कि मेरी ओर एक हाथ बढ़ा हुआ था; और देखो उसमें एक पुस्तक थी।
10जब उसने उसको मेरे सामने खोला तो उसमें दोनों ओर लिखा हुआ था। उसमें विलाप और शोक और दुख भरे वचन लिखे हुए थे।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)