पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 3 / 48
यहेजकेल 3
1तब उसने मुझसे कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, जो कुछ तुझे मिले उसे खा ले, इस पुस्तक को खा ले और जाकर इस्राएल के घराने से बातें कर।”
2अतः मैंने मुंह खोला और उसने मुझे वह पुस्तक खिला दी।
3उसने मुझसे कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, यह पुस्तक जो मैं तुझे दे रहा हूं उससे अपना पेट भर ले।” तब मैंने उसे खा लिया और वह मेरे मुंह में मधु-सी मीठी लगी।
4तब उसने मुझसे कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, इस्राएल के घराने के पास जा और उन्हें मेरे वचन सुना।
5क्याेंकि तुझे ऐसे लोगों के पास नहीं भेजा जा रहा है जिनकी बोली तुझे समझ में न आए अथवा जिनकी भाषा कठिन हो परन्तु तुझे इस्राएल के घराने के पास भेजा जा रहा है।
6और न उन बहुत सी जातियों के पास जिनकी बोली तेरी समझ से परे और भाषा कठिन है तथा जिनके वचनों को तू नहीं समझता। परन्तु मैंने तुझे उन्हीं के पास भेजा है जो तेरी बातें सुने।
7फिर भी इस्राएल का घराना तेरी बात न सुनेगा, क्योंकि वह मेरी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है। निःसंदेह, इस्राएल का सम्पूर्ण घराना हठी और कठोर मन का है।
8देख, मैंने तेरा मुख उनके मुखों के समान ढीठ और तेरे माथे को उनके माथों के समान हठीला कर दिया।
9मैंने तेरे माथे को कड़े पत्थर अर्थात् चकमक से भी अधिक कड़ा बनाया है यघपि वे विद्रोही घराना हैं, उनसे भयभीत न होना और न उनके सामने घबराना।”
10उसने मुझसे यह भी कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, जो बातें मैं तुझसे कहूं उन्हें ध्यान से सुन और अपने मन में रख।
11और उन निर्वासितों के पास जा जो तेरे भाई-बन्धु हैं और उनसे बातें कर और कह, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है,’ फिर चाहे वे सुनें या न सुने।”
12तब आत्मा ने मुझे ऊपर उठाया और मैंने अपने पीछे एक बड़ी गड़गड़ाहट की यह आवाज सुनीः “यहोवा के निवासस्थान में उसकी महिमा धन्य हो।”
13और मैंने उन जीवित प्राणियों के एक-दूसरे का स्पर्श करने वाले पंखों के साथ पहियों की आवाज अर्थात् एक बड़ी गड़गड़ाहट सुनी।
14तब आत्मा मुझे ऊपर उठाकर दूर ले गया; और मैं अपनी आत्मा के रोष में कटुता से भरकर निकल पड़ा, और यहोवा का शक्तिशाली हाथ मुझ पर था।
15तब मैं उन निर्वासितों के पास आया जो कबार नदी के समीप तेल-अबीब में रहते थे, और जहां वे रहते थे वहां मैं उनके मध्य सात दिन तक व्याकुल होकर बैठा रहा।
16सात दिन के पश्चात् ऐसा हुआ कि यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचाः
17“हे मनुष्य की सन्तान, मैंने तुझे इस्राएल के घराने का पहरेदार नियुक्त किया है। जब भी तू मेरे मुख का वचन सुने तो उन्हें मेरी ओर से चेतावनी देना।
18जब मैं दुष्ट से कहूं, ‘तू निश्चय मरेगा, और तू उसे चेतावनी न दे या उस दुष्ट को उसकी दुष्टता से सचेत करने के लिए उससे न कहे, जिससे वह जीवित रहे, तो वह दुष्ट तो अपने अधर्म में मरेगा ही, परन्तु उसके खून का लेखा मैं तुझी से लूंगा।
19परन्तु यदि तू दुष्ट को चिताए और वह अपनी दुष्टता और अपने कुटिल मार्ग से न फिरे तो वह अपने अधर्म में मरेगा, परन्तु तू अपने आपको बचा लेगा।
20फिर जब धर्मी अपनी धार्मिकता से भटक कर अधर्म करे और मैं उसके मार्गों में रुकावट डालूं तो वह निःसंदेह मरेगा। इसलिए कि तूने उसे चेतावनी नहीं दी वह अपने पापों में मर जाएगा और उसके धार्मिकता के कार्य जो उसने किए हों उनका स्मरण नहीं किया जाएगा, परन्तु उसके खून का लेखा मैं तुझी से लूंगा।
21फिर भी यदि तू धर्मी को चिताए कि पाप न करे, और वह पाप न करे, तो वह चेतावनी पर ध्यान देने के कारण निश्चय जीवित रहेगा, और तू अपने आपको बचा लेगा’।”
22वहां यहोवा का हाथ मुझ पर था, और उसने मुझसे कहा, “उठकर बाहर मैदान में निकल जा और वहां मैं तुझसे बातें करूंगा।”
23अतः मैं उठकर बाहर मैदान में निकल गया; और देखो, यहोवा की ऐसी महिमा वहां प्रकट थी जैसी मैंने कबार नदी के तट पर देखी थी, और मैं मुंह के बल गिर पड़ा।
24तब आत्मा ने मुझमें समा कर मुझे पैरों पर खड़ा किया, और उसने मुझसे बातें कीं और कहा, “जा और अपने घर का द्वार बन्द करके भीतर बैठा रह।
25हे मनुष्य की सन्तान, तुझे तो लोग रस्सियों से जकड़कर बान्धेंगे जिससे तू उनके मध्य न जा सके।
26इसके अतिरिक्त मैं तेरी जीभ तेरे तालू से चिपका दूंगा जिससे तू गूंगा हो जाएगा और उनको डांटने वाला न रहेगा, क्योंकि वे तो विद्रोही घराने के है।
27परन्तु जब मैं तुझसे बातें करूंगा, तो मैं तेरा मुंह खोल दूंगा और तू उनसे कहेगा, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है’ फिर जो सुनना चाहे वह सुने, और जो सुनना न चाहे न सुने, क्योंकि वे तो विद्रोही घराने के हैं ही।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)